गर्मी की प्रचंडता से ज्यादा चर्चा में है तीव्रता... इतनी तेज क्यों आई, क्या इसका पेड़ों के डेटा से कनेक्शन है?

इस बार गर्मी की तीव्रता पर ज्यादा चर्चा है. अप्रैल के अंत में ही देश के कई हिस्सों में भारी गर्मी पड़ रही है. लोग पेड़ों की कमी को इसका कारण बता रहे हैं. लेकिन UN रिपोर्ट के अनुसार भारत पिछले वर्षों में वन क्षेत्र बढ़ाने वाले टॉप देशों में शामिल है. दुनिया की तुलना में भारत कम गर्म हुआ है (0.5-1°C प्रति दशक). पेड़ लगाना अब भी जरूरी है.

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भयानक गर्मी में छायादार पेड़ बहुत राहत देते हैं. साथ ही प्रदूषण कम करते हैं. (Photo: ITG) भयानक गर्मी में छायादार पेड़ बहुत राहत देते हैं. साथ ही प्रदूषण कम करते हैं. (Photo: ITG)

ऋचीक मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 28 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 11:43 AM IST

अप्रैल 2026 के आखिरी दिनों में भारत के कई इलाकों में गर्मी ने रिकॉर्ड तोड़ दिया है. लोग इस बार गर्मी की तीव्रता पर ज्यादा चर्चा कर रहे हैं. सिर्फ ये नहीं कि गर्मी ज्यादा है, बल्कि यह कि इतनी तेजी और इतना पहले क्यों आई है. कई लोग इसे पेड़ों की कमी और जंगलों के कम होने से जोड़ रहे हैं. 

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सोशल मीडिया पर बहस छिड़ी हुई है कि भारत में हर व्यक्ति के पास सिर्फ 28 पेड़ हैं जबकि दुनिया में औसतन 422 पेड़ हैं. तो क्या सच में पेड़ों की कमी ही इस साल की अचानक तेज गर्मी की वजह है? 

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भारत में शुरुआती और तीव्र गर्मी का प्रकोप

इस साल अप्रैल के अंत में ही देश के मध्य और उत्तर-पश्चिमी हिस्सों में भारी गर्मी पड़ रही है. दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और विदर्भ जैसे इलाकों में तापमान 42 से 47 डिग्री तक पहुंच गया है. भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने कई दिनों तक हीटवेव की चेतावनी जारी की है. 

लोग कह रहे हैं कि गर्मी की तीव्रता पहले से ज्यादा लग रही है. दिन में तेज धूप के साथ रातें भी गर्म हो रही हैं, जिससे लोगों को राहत नहीं मिल रही. कई विशेषज्ञ कहते हैं कि शहरी इलाकों में कंक्रीट और कम पेड़ होने से स्थानीय स्तर पर गर्मी और बढ़ जाती है. लेकिन क्या पूरी समस्या सिर्फ पेड़ों की कमी से है?

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पेड़ों की संख्या पर बहस

सोशल मीडिया पर एक बात बहुत जोर-शोर से चल रही है - भारत में प्रति व्यक्ति सिर्फ 28 पेड़ हैं जबकि दुनिया का औसत 422 है. यह आंकड़ा पुराना है लेकिन फिर भी लोग इसे बार-बार दोहरा रहे हैं. आलोचक कहते हैं कि जंगलों की कटाई और शहरीकरण के कारण पेड़ कम हो गए हैं, इसलिए गर्मी ज्यादा पड़ रही है. 

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वे दावा करते हैं कि कम पेड़ होने से गर्मी को सोखने वाला प्राकृतिक सिस्टम कमजोर हो गया है. इससे गर्मी की तीव्रता बढ़ गई है. लेकिन क्या यह पूरी सच्चाई है? आइए सरकारी और अंतरराष्ट्रीय आंकड़ों को भी देखें. 

वन क्षेत्र बढ़ने के आंकड़े क्या कहते हैं?

UN की Global Forest Resources Assessment (GFRA) 2025 रिपोर्ट के अनुसार भारत ने दुनिया में वन क्षेत्र बढ़ाने में तीसरा स्थान हासिल किया है. भारत कुल वन क्षेत्र में दुनिया में नौवें नंबर पर पहुंच गया है. भारत में वन और पेड़ों का कवरेज हाल के वर्षों में बढ़ा है. 

भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक वन और ट्री कवर कुल भूमि का 25.17% है. पिछले कुछ सालों में भारत ने वन क्षेत्र बढ़ाने में अच्छा काम किया है. हालांकि कुछ पुराने घने जंगल कम घने हुए हैं, लेकिन कुल मिलाकर नेट गेन पॉजिटिव है. यह सिर्फ भारत का अपना डेटा नहीं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र के सैटेलाइट आधारित आंकड़े हैं.

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भारत गर्मी में क्यों कम प्रभावित रहा है?

दुनिया भर में हर देश का औसत तापमान पिछले कई दशकों में 1 से 1.5 डिग्री प्रति दशक बढ़ा है. लेकिन भारत में यह बढ़ोतरी सिर्फ 0.5 से 1 डिग्री प्रति दशक रही है. यानी भारत ग्लोबल वार्मिंग में दुनिया के कई देशों की तुलना में कम गर्म हुआ है. यह वैज्ञानिक तथ्य है जिसे जलवायु वैज्ञानिक भी मानते हैं. इसके साथ ही भारत ने पिछले दस-पंद्रह सालों में शहरों में ट्री कवर बढ़ाया है. जंगलों की रक्षा की है. पर्यावरण संरक्षण के काम किए हैं.

वन्य जीव संरक्षण और पर्यावरण प्रयास

भारत ने सिर्फ पेड़ लगाने तक सीमित नहीं रहकर वन्य जीवों की सुरक्षा भी की है. एशियाटिक शेर, गैंडे, बाघ और कई पक्षी-जानवरों की संख्या बढ़ी है. यह उपलब्धि कई विकसित देशों से बेहतर है जहां बढ़ती आबादी वाले जानवरों को मार दिया जाता है.  

इस साल अप्रैल में आई तेज गर्मी की तीव्रता कई कारणों से है – प्राकृतिक मौसम चक्र, शहरी गर्मी और ग्लोबल वार्मिंग का असर. पेड़ों की कमी निश्चित रूप से एक समस्या है, लेकिन यह पूरी सच्चाई नहीं है. भारत ने वन क्षेत्र बढ़ाने और पर्यावरण संरक्षण में अच्छी प्रगति की है. 

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अगर हम और ज्यादा पेड़ लगाएं, शहरों में छाया बढ़ाएं और जंगलों की बेहतर देखभाल करें तो भविष्य में गर्मी से निपटना आसान हो सकता है. फिलहाल वैज्ञानिक आंकड़े बताते हैं कि भारत गर्मी के मामले में दुनिया के कई देशों से बेहतर स्थिति में है, लेकिन हमें और मेहनत करने की जरूरत है.

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