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Gift Deed या Will: बच्चों के नाम घर अभी कर दें या बाद के लिए छोड़ें? जानें, किसमें है ज्यादा फायदा

माता-पिता अपने घर को बच्चों के नाम गिफ्ट डीड के जरिए ट्रांसफर कर सकते हैं या वसीयत बनाकर अपनी मृत्यु के बाद संपत्ति देने का फैसला कर सकते हैं. दोनों तरीकों में मालिकाना हक, रजिस्ट्रेशन, टैक्स और कानूनी अधिकारों को लेकर अंतर है.

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जानिए घर बच्चों के नाम करने से पहले किन बातों का ध्यान रखना जरूरी है. ( Photo: ITG)
जानिए घर बच्चों के नाम करने से पहले किन बातों का ध्यान रखना जरूरी है. ( Photo: ITG)

घर खरीदना किसी भी व्यक्ति के जीवन की बड़ी उपलब्धियों में से एक होता है. लोग अपनी पूरी जिंदगी की कमाई लगाकर घर बनाते हैं, ताकि बुढ़ापे में उन्हें परेशानी न हो और उनके बच्चों का भविष्य भी सुरक्षित रहे. लेकिन जब बात इस घर को बच्चों के नाम करने की आती है, तो अक्सर एक सवाल उठता है कि प्रॉपर्टी बच्चों के नाम अभी कर देनी चाहिए या अपनी वसीयत (Will) बनाकर छोड़ देनी चाहिए? भारत में इसके लिए दो आम तरीके हैं. पहला है गिफ्ट डीड (Gift Deed), जिसके जरिए आप अपनी संपत्ति किसी दूसरे व्यक्ति को उपहार के रूप में ट्रांसफर कर सकते हैं. दूसरा है वसीयत (Will), जिसमें आप लिखकर तय करते हैं कि आपकी मृत्यु के बाद आपकी संपत्ति किसे मिलेगी.

दोनों तरीकों के अपने फायदे और नुकसान हैं. इनका असर सिर्फ संपत्ति के मालिकाना हक पर ही नहीं, बल्कि भविष्य में लगने वाले टैक्स, प्रॉपर्टी बेचने और परिवार के बीच होने वाले विवादों पर भी पड़ सकता है.

1. गिफ्ट डीड क्या होती है?
गिफ्ट डीड एक कानूनी दस्तावेज है, जिसके जरिए कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति किसी दूसरे व्यक्ति को बिना पैसे लिए दे सकता है. उदाहरण के लिए, अगर किसी पिता को अपना मकान बेटे या बेटी के नाम करना है, तो वह गिफ्ट डीड के जरिए ऐसा कर सकता है. इसमें सबसे जरूरी बात यह है कि गिफ्ट डीड रजिस्टर होने और जरूरी कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद मकान का मालिकाना हक बच्चे के पास चला जाता है. इसके बाद माता-पिता का उस संपत्ति पर पहले जैसा अधिकार नहीं रहता.

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मान लीजिए, किसी व्यक्ति ने 50 लाख रुपये में घर खरीदा था. अब वह इसे अपनी बेटी के नाम करना चाहता है. अगर वह गिफ्ट डीड के जरिए घर बेटी को देता है, तो बेटी उस घर की कानूनी मालिक बन सकती है. लेकिन ऐसा करने से पहले माता-पिता को अपने रहने, इलाज और भविष्य के खर्चों के बारे में अच्छी तरह सोच लेना चाहिए. क्योंकि बाद में घर वापस लेना आसान नहीं होता.

2. Will यानी वसीयत क्या होती है?
वसीयत एक ऐसा कानूनी दस्तावेज है, जिसमें कोई व्यक्ति लिखकर बताता है कि उसकी मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति किसे मिलेगी. इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि वसीयत बनाने के बाद भी घर का मालिकाना हक आपके पास ही रहता है. आप अपने घर में रह सकते हैं, उसे किराये पर दे सकते हैं और अपनी जरूरत के हिसाब से फैसले ले सकते हैं. उदाहरण के लिए, किसी पिता के दो बच्चे हैं. वह चाहता है कि उसकी मृत्यु के बाद घर बेटी को और दूसरी संपत्ति बेटे को मिले. वह अपनी वसीयत में यह बात लिख सकता है.

अगर बाद में उसकी सोच बदलती है, तो वह कानूनी नियमों के अनुसार वसीयत बदल भी सकता है. इसके लिए उसे हर बार बच्चों की सहमति लेने की जरूरत नहीं होती. हालांकि, वसीयत की वैधता और उसे लागू करने की प्रक्रिया संपत्ति और संबंधित कानूनों पर निर्भर कर सकती है. विवाद होने पर मामला अदालत तक भी पहुंच सकता है.

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Gift Deed और Will (वसीयत) के बीच सबसे बड़ा अंतर 
गिफ्ट डीड और वसीयत के बीच सबसे बड़ा अंतर यह है कि संपत्ति का मालिकाना हक कब और कैसे मिलता है. गिफ्ट डीड के जरिए माता-पिता अपने जिंदगी में ही घर या दूसरी अचल संपत्ति बच्चे के नाम कर सकते हैं. इसके लिए गिफ्ट डीड का रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी होता है. एक बार कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद संपत्ति का मालिकाना हक बच्चे के पास चला जाता है. इसके बाद फैसला बदलना आमतौर पर आसान नहीं होता. इस प्रक्रिया में राज्य के नियमों के अनुसार स्टांप ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन फीस भी देनी पड़ सकती है.

वहीं, वसीयत के जरिए माता-पिता यह तय करते हैं कि उनकी मृत्यु के बाद घर या दूसरी संपत्ति किसे मिलेगी. वसीयत बनाने के बाद भी संपत्ति का मालिकाना हक माता-पिता के पास ही रहता है. वे अपनी पूरी जिंदगी घर में रह सकते हैं, उसे किराये पर दे सकते हैं या अपनी जरूरत के अनुसार दूसरे फैसले ले सकते हैं. अगर भविष्य में उनकी इच्छा बदल जाती है, तो वे कानूनी नियमों के अनुसार वसीयत में बदलाव भी कर सकते हैं. वसीयत का रजिस्ट्रेशन आमतौर पर अनिवार्य नहीं है, हालांकि इसे रजिस्टर कराना उपयोगी हो सकता है. इसके अलावा, वसीयत बनाने पर स्टांप ड्यूटी नहीं लगती, लेकिन वकील की फीस जैसे दूसरे खर्च हो सकते हैं.

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इस तरह, अगर माता-पिता जीवनकाल में ही संपत्ति बच्चे को देना चाहते हैं, तो गिफ्ट डीड एक विकल्प है. वहीं, अगर वे जीवनभर घर पर अपना कंट्रोल बनाए रखना चाहते हैं और मृत्यु के बाद संपत्ति बच्चों को देना चाहते हैं, तो वसीयत पर विचार कर सकते हैं. फैसला लेने से पहले संपत्ति के मालिकाना हक, संभावित खर्च और परिवार की जरूरतों को समझना जरूरी है.

4. क्या बच्चों को घर गिफ्ट करने पर टैक्स लगता है?
माता-पिता के लिए यह एक अहम सवाल है. अच्छी बात यह है कि भारत में माता-पिता से बच्चों को प्रॉपर्टी गिफ्ट करने पर आम तौर पर इनकम टैक्स नहीं लगता. माता-पिता और बच्चे आयकर कानून के तहत रिश्तेदारों की उस श्रेणी में आते हैं, जिन्हें इस तरह के गिफ्ट पर छूट मिलती है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि प्रॉपर्टी ट्रांसफर करने में कोई खर्च नहीं आएगा. 

गिफ्ट डीड बनवाते समय स्टांप ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन फीस देनी पड़ सकती है. इनकी दर राज्य के हिसाब से अलग-अलग होती है. वसीयत के जरिए संपत्ति मिलने पर भी सिर्फ संपत्ति विरासत में मिलने के कारण आम तौर पर इनकम टैक्स नहीं लगता. हालांकि, संपत्ति बेचने पर कैपिटल गेन टैक्स यानी पूंजीगत लाभ कर लग सकता है.

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5. घर बेचने पर बच्चों को कितना टैक्स देना पड़ सकता है?
यह गिफ्ट डीड का एक ऐसा पहलू है, जिस पर अक्सर लोग ध्यान नहीं देते. मान लीजिए, एक पिता ने 2005 में 20 लाख रुपये में घर खरीदा था. अब वह घर बेटी को गिफ्ट कर देता है. कुछ साल बाद बेटी उस घर को 1 करोड़ रुपये में बेच देती है. ऐसी स्थिति में टैक्स की गणना करते समय आम तौर पर पिता की खरीद कीमत और संपत्ति रखने की अवधि को भी ध्यान में रखा जाता है. यानी सिर्फ गिफ्ट मिलने के दिन घर की कीमत को आधार मानकर टैक्स नहीं निकाला जाता.

भारत में 23 जुलाई 2024 से लागू सामान्य नियमों के अनुसार, लंबे समय तक रखी गई संपत्ति पर कैपिटल गेन टैक्स की दर आम तौर पर बिना इंडेक्सेशन के 12.5% है. हालांकि, 23 जुलाई 2024 से पहले खरीदी गई जमीन या इमारत बेचने वाले कुछ निवासी व्यक्तियों और HUF को पुरानी इंडेक्सेशन वाली व्यवस्था के तहत 20% टैक्स की गणना का विकल्प मिल सकता है, यदि संबंधित शर्तें पूरी होती हैं. इसलिए घर बेचने से पहले टैक्स एक्सपर्ट से दोनों विकल्पों की गणना कराना फायदेमंद हो सकता है.

6. क्या गिफ्ट डीड करने के बाद माता-पिता घर में रह सकते हैं?
हां, लेकिन इसके लिए पहले से कानूनी सुरक्षा की व्यवस्था करना जरूरी है. मान लीजिए, माता-पिता ने अपना घर बेटे के नाम कर दिया. कुछ समय बाद बेटा उनसे कहता है कि वे घर छोड़कर कहीं और चले जाएं. अगर गिफ्ट डीड में माता-पिता के रहने के अधिकार का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, तो विवाद पैदा हो सकता है.

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इसलिए गिफ्ट डीड बनवाते समय दो बातों पर ध्यान देना चाहिए.

रहने का अधिकार: दस्तावेज में साफ लिखा जा सकता है कि माता-पिता को जीवन भर उस घर में रहने का अधिकार रहेगा.
देखभाल की शर्त: बच्चों की ओर से माता-पिता की देखभाल और भरण-पोषण की जिम्मेदारी को दस्तावेज में स्पष्ट किया जा सकता है.

वरिष्ठ नागरिकों के मामले में कानून कुछ परिस्थितियों में संपत्ति का गिफ्ट रद्द कराने की अनुमति भी देता है, अगर संपत्ति इस शर्त पर दी गई हो कि बच्चा माता-पिता की बुनियादी जरूरतें पूरी करेगा और बाद में ऐसा करने से इनकार कर दे. लेकिन इसके लिए कानूनी शर्तों का पूरा होना जरूरी है. ध्यान रहे, घर में रहने का अधिकार सुरक्षित करने से माता-पिता का मालिकाना हक अपने आप वापस नहीं आता.

7. फिर बच्चों के नाम घर कब करना चाहिए?
इसका जवाब हर परिवार के लिए अलग हो सकता है. गिफ्ट डीड बेहतर विकल्प हो सकती है, अगर माता-पिता अपनी जिंदगी में ही संपत्ति का मालिकाना हक बच्चे को देना चाहते हैं. वे संपत्ति के बंटवारे को अभी स्पष्ट करना चाहते हैं. वे ट्रांसफर के बाद अपने नियंत्रण में होने वाली कमी को समझते हैं और उसके लिए तैयार हैं.

वसीयत बेहतर विकल्प हो सकती है, अगर माता-पिता जीवन भर घर पर अपना कंट्रोल रखना चाहते हैं. वे भविष्य में अपनी योजना बदलने की स्वतंत्रता चाहते हैं. उन्हें अपने इलाज, रहने और रोजमर्रा के खर्चों के लिए संपत्ति की जरूरत पड़ सकती है. अगर घर संयुक्त या पैतृक संपत्ति है, तो उसे गिफ्ट करने या वसीयत में देने के नियम अलग हो सकते हैं. इसलिए पहले यह देखना जरूरी है कि संपत्ति वास्तव में किसकी है और उस पर दूसरे लोगों के क्या अधिकार हैं.

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