उत्तराखंड के चमोली जिले में जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े टनल निर्माण कार्यों में एक के बाद एक घटनाएं सामने आने से पूरे क्षेत्र में चिंता का माहौल बन गया है. एक ओर पीपलकोटी स्थित टीएचडीसी की निर्माणाधीन टनल में 13 अगस्त को हुए गंभीर हादसे के बाद लापता श्रमिकों की तलाश और राहत-बचाव अभियान जारी है.
वहीं, दूसरी ओर एनटीपीसी की तपोवन विष्णुगाड जलविद्युत परियोजना की मुख्य टनल की चोरमी एडिट टनल डीबीएम साइट में 15 अगस्त की सुबह कैविटी (छेद) बनने और उससे पानी का रिसाव होने की घटना सामने आई है. इन दोनों घटनाओं ने टनल निर्माण के दौरान सुरक्षा व्यवस्था, भूगर्भीय स्टडी और श्रमिकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
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टीएचडीसी की विष्णुगाड-पीपलकोटी परियोजना की टेल रेस टनल में अचानक मलबा और पानी घुसने से कई श्रमिक फंस गए थे. बचाव अभियान में कई लोगों को बाहर निकाला गया, लेकिन कुछ की मौत हो गई. दो श्रमिक अब भी लापता हैं. रेस्क्यू टीमें पानी निकालने, मलबा हटाने और तलाश जारी रखने में जुटी हुई हैं. इस हादसे ने पहले से ही संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में टनल निर्माण की चुनौतियों को एक बार फिर उजागर कर दिया है.
तपोवन विष्णुगाड टनल में कैविटी और रिसाव की घटना
एनटीपीसी की तपोवन विष्णुगाड जलविद्युत परियोजना की निर्माणाधीन मुख्य टनल की चोरमी एडिट टनल डीबीएम साइट में 15 अगस्त की सुबह एक छोटा छेद दिखाई दिया. सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उस हिस्से में काम कर रहे मजदूरों को तुरंत बाहर निकाल लिया गया. इसके बाद कैविटी को सुरक्षित तरीके से भरने और उपचार करने का काम शुरू कर दिया गया. टनल के अंदर बनी इस कैविटी से पानी का रिसाव भी हो रहा है.
एनटीपीसी प्रबंधन का कहना है कि टनलिंग के दौरान इस तरह की छोटी कैविटी बनना निर्माण प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा हो सकता है. फिलहाल इससे किसी बड़े खतरे की स्थिति नहीं बताई जा रही है. फिर भी सुरक्षा को देखते हुए कैविटी वाले हिस्से में मजदूरों का प्रवेश पूरी तरह रोक दिया गया है.
विशेषज्ञों की टीम मौके पर तैनात है. आधुनिक मशीनों की मदद से कैविटी को भरने तथा प्रभावित हिस्से को मजबूत बनाने का काम चल रहा है. प्रबंधन ने साफ किया है कि जब तक कैविटी का उपचार पूरी तरह नहीं हो जाता, तब तक उस हिस्से में टनलिंग का काम आगे नहीं बढ़ाया जाएगा.
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लगातार घटनाओं से बढ़ी चिंता
महत्वपूर्ण बात यह है कि पीपलकोटी टनल हादसे के ठीक बाद तपोवन परियोजना में कैविटी और पानी रिसाव की घटना सामने आई है. दोनों घटनाओं के कारण और परिस्थितियां अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन लगातार दो टनल परियोजनाओं से जुड़ी घटनाओं ने श्रमिकों की सुरक्षा और भूगर्भीय जांच को लेकर अतिरिक्त सतर्कता की जरूरत पर जोर दिया है.
हिमालयी क्षेत्र में चट्टानों की जटिल संरचना, पानी की मौजूदगी और मॉनसून के प्रभाव जैसी चुनौतियां पहले से जानी-मानी हैं. ऐसे में निर्माण के दौरान नियमित भूगर्भीय निगरानी, आधुनिक सेंसर तकनीक और सख्त सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन बेहद जरूरी हो जाता है.
विशेषज्ञों का मानना है कि टनल निर्माण में कैविटी का बनना कभी-कभी होता है, लेकिन समय रहते पहचान न होने पर यह बड़ा खतरा बन सकता है. तपोवन परियोजना में प्रबंधन ने तुरंत मजदूरों को बाहर निकालकर सही कदम उठाया है, जिससे बड़े हादसे को टाला जा सका.
वहीं पीपलकोटी हादसे में बचाव अभियान की चुनौतियां पानी और मलबे की वजह से जारी हैं. दोनों मामलों में पारदर्शिता और स्वतंत्र तकनीकी समीक्षा की मांग भी उठ रही है.
ये घटनाएं याद दिलाती हैं कि जलविद्युत परियोजनाएं बिजली उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन श्रमिकों की जान की सुरक्षा सर्वोपरि होनी चाहिए. हिमालय जैसे संवेदनशील इलाके में निर्माण से पहले विस्तृत भूगर्भीय सर्वेक्षण, नियमित मॉनिटरिंग और आपातकालीन योजनाओं को और मजबूत करने की जरूरत है. राज्य और केंद्र सरकार के स्तर पर भी सुरक्षा मानकों की सख्ती से निगरानी होनी चाहिए.
कुल मिलाकर चमोली की इन दो घटनाओं ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि विकास और सुरक्षा का संतुलन बनाए रखना कितना चुनौतीपूर्ण है. तपोवन टनल में कैविटी का समय रहते इलाज और पीपलकोटी में लापता श्रमिकों की सफल तलाश दोनों ही जरूरी हैं.
कमल नयन सिलोड़ी