प्रेमानंद महाराज के शिष्य रसिक दुलारी की मौत के बाद उनके आश्रम में साधकों के लिए कई नियम बदल गए हैं. वेशभूषा से लेकर दीक्षा लेने तक की प्रक्रिया में कुछ बदलाव किए गए हैं. हालिया घटना के मद्देनजर प्रेमानंद महाराज ने अपने शिष्यों और साधकों के लिए 20 जरूरी बातें बताई हैं. इसका वीडियो प्रेमानंद महाराज ने अपने ऑफिशियल यूट्यूब चैनल पर भी अपलोड किया है. आइए जानते हैं कि प्रेमानंद महाराज ने साधकों के लिए भक्ति के कौन से सूत्र बताए हैं.
1. झूठ का रास्ता न अपनाएं
डरकर झूठ न बोलें. गलती होने पर उसे स्वीकार करना चाहिए. गलती मानने पर दंड या आलोचना का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन सच छिपाने के लिए झूठ बोलने से मुश्किलें और बढ़ जाती हैं. एक झूठ को छिपाने के लिए कई झूठ बोलने पड़ सकते हैं.
2. संतों और भक्तों की निंदा
किसी की बुराई बिल्कुल न करें. दूसरों की निंदा करने से बचना चाहिए और ऐसी बातें सुनने से भी दूर रहना चाहिए. विशेषकर भगवान के भक्तों और संतों की निंदा करने से बचना चाहिए.
3. दुख में भी ईश्वर को याद रखें
सुख-दुख में अपने भाव, व्यवहार न बदलें. अच्छी परिस्थितियों में बहुत ज्यादा खुश और मुश्किल घड़ी में निराश नहीं होना चाहिए. हर हाल में भगवान को याद रखना चाहिए. आपको सम्मान मिले या अपमान सहना पड़े, हर परिस्थिति में अपनी भक्ति जारी रखें.
4. क्षमा करने का भाव रखें
गलती करने वाले को माफ करने की भावना मन में रखें. अगर कोई अपनी गलती मानकर माफी मांगता है और खुद को सुधारना चाहता है तो उसे एक मौका जरूर दें. दूसरों को क्षमा करने से भगवान की कृपा मिलती है.
5. दुख सहने की शक्ति
ईश्वर से दुख सहने की शक्ति मांगें. मुश्किल दौर आने पर हर किसी के सामने उसे बयां करने के बजाय भगवान से प्रार्थना करें कि वो आपको उस दुख को सहने की शक्ति दे.
6. दूसरों का भला करें
जगत में सभी का अच्छा करने की भावना मन में रखें. हमेशा दूसरों की मदद करने और उनका भला करने का प्रयास करना चाहिए. कोई व्यक्ति बुरा व्यवहार करे, तब भी उसके प्रति मन में बुरा ख्याल नहीं लाना चाहिए.
7. मन में द्वेष न रखें
दूसरों की गलतियों के लिए कभी मन में द्वेष न रखें. किसी की गलती को लेकर बदला लेने की भावना नहीं पालनी चाहिए. क्षमा और धैर्य अपनाकर व्यक्ति अपने भीतर के नकारात्मक भावों पर नियंत्रण रख सकता है और खुद को उत्कृष्ट बना सकता है.
8. नामजप करते रहें
काम करते हुए भी भगवान का नाम जप करें. नौकरी, व्यापार या रोजमर्रा के दूसरे कामों में व्यस्त रहने पर भी भगवान का स्मरण करते रहना चाहिए. जीवन के अनमोल समय को व्यर्थ गंवाने के बजाय भक्ति और अच्छे कार्यों में लगाना चाहिए.
9. मधुर वाणी
दूसरों के प्रति हमेशा मीठी और अच्छी वाणी बोलें. हमेशा ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करना चाहिए, जिनसे किसी को दुख न पहुंचे. कुछ भी बोलने से पहले विचार करें कि आपकी बात से सामने वाले को खुशी मिलेगी या ठेस पहुंचेगी.
10. क्रोध में खुद को शांत रखें
किसी को गुस्से में या भूलवश भी अपशब्द न बोलें. क्रोध आने पर भी गाली देने या किसी का अपमान करने से बचना चाहिए. क्रोध की स्थिति में खुद को शांत रखना या चुप रहना ही बेहतर होता है.
11. किसी की चुगली या निंदा न करें
किसी की कमियां दूसरों के सामने न गिनाएं. अगर किसी व्यक्ति में कोई कमी नजर आती है तो उसकी चर्चा दूसरों के सामने बिल्कुल न करें. बेहतर होगा कि उससे सीधी बात करें. इससे चुगली और निंदा जैसी आदतों से बचा जा सकता है.
12. गलत बातों में समय खराब न करें
बेकार और बेवजह की बातों में समय न गंवाएं. दूसरों के बारे में घंटों अनावश्यक बातें करने के बजाय समय का उपयोग भगवान के स्मरण और उपयोगी कामों में करना चाहिए.
13. चोरी-धोखाधड़ी से दूरी
ईमानदारी से कमाया हुआ धन ही इस्तेमाल करें. चोरी, घूसखोरी, धोखाधड़ी, छल-कपट और हिंसा जैसे गलत तरीकों से कमाए धन से बचना चाहिए. मेहनत और ईमानदारी से कमाई करके उसी धन से परिवार का पालन-पोषण करना चाहिए.
14. कर्मों पर ध्यान दें
बुरे और अनैतिक कार्यों से दूर रहें. ऐसे कामों में अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहिए, जिनसे कोई फायदा न हो और जिनमें भगवान का स्मरण भी न हो सके. सत्कर्मों को बढ़ाने पर ध्यान दें. जीवन का हर पल अनमोल है. इसलिए उसका सही उपयोग करना चाहिए.
15. सात्विक भोजन
हल्का और शरीर के अनुकूल भोजन करें. ऐसा भोजन करना चाहिए, जिससे शरीर स्वस्थ रहे और भजन करने में परेशानी न हो. तामसिक चीजों से बचें और सात्विक आहार ग्रहण करें. जरूरत से ज्यादा खाने और भारी भोजन करने से बचना चाहिए.
16. आध्यात्मिक ज्ञान का दिखावा
अपने आध्यात्मिक ज्ञान और अनुभवों का दिखावा न करें. भजन या साधना के दौरान कोई विशेष अनुभव हो, तो उसे अपनी उपलब्धि बताकर लोगों के सामने प्रदर्शित नहीं करना चाहिए.
17. भक्ति पर अहंकार न करें
भक्ति करने का अहंकार न पालें. व्यक्ति चाहे कितना भी जप, तप या तीर्थयात्रा करे, उसे अपनी भक्ति पर घमंड नहीं करना चाहिए. अपनी साधना और उपलब्धियों को भगवान की कृपा मानना चाहिए.
18. सम्मान के बदले सम्मान की चाह न रखें
हमेशा दूसरों का सम्मान करें. लेकिन दूसरों से खुद कभी भी सम्मान की चाह न रखें. हर व्यक्ति के साथ आदर से पेश आना चाहिए. हालांकि, अपने लिए मान-सम्मान पाने की इच्छा नहीं रखनी चाहिए.
19. अच्छे गुणों का दिखावा न करें
अपने अच्छे गुणों का प्रदर्शन न करें. व्यक्ति में कितने भी अच्छे गुण हों, उन्हें दिखाकर दूसरों के सामने अपनी श्रेष्ठता साबित करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. हमेशा विनम्र बने रहना चाहिए.
20. साजो-श्रृंगार पर ज्यादा ध्यान न दें
शरीर के बाहरी साजो-श्रृंगार में जरूरत से ज्यादा ध्यान न दें. बाहरी दिखावे और शरीर को सजाने-संवारने में जरूरत से ज्यादा समय नहीं लगाना चाहिए. हालांकि, भगवान को अर्पित चंदन, तिलक, माला और गुरु से मिली कंठी को इससे अलग माना गया है.
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