तेरहवीं के बाद मृतक का शोक मनाएं या नहीं? मोक्ष में बाधा लाती हैं ये 3 गलतियां

परिवारजनों और सगे संबंधियों द्वारा तेरहवीं तक मृतक के लिए शोक मनाना तो उचित है. लेकिन वर्षों तक निरंतर मृतक को स्मृतियों में रोना, उसकी तस्वीर के सामने निरंतर दीपक जलाते रहना, उस आत्मा की आगे की यात्रा में बाधा उत्पन्न करने के अलावा कुछ नहीं है.

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जीव (शरीर के रूप में) व्यक्ति की आगे की गति कैसी होगी, यह उसके कर्मों पर निर्भर करता है. जीव (शरीर के रूप में) व्यक्ति की आगे की गति कैसी होगी, यह उसके कर्मों पर निर्भर करता है.

अंशु पारीक

  • नई दिल्ली,
  • 10 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 9:15 PM IST

मृत्यु शारीरिक है. आत्मा तो अमर है. शरीर की मृत्यु जीवन का अंत नहीं बल्कि एक अवस्था से दूसरी अवस्था में प्रवेश का माध्यम है. मरता शरीर है, आत्मा का सफर तो निरंतर चलता रहता है. परिवारजनों और सगे संबंधियों द्वारा तेरहवीं तक मृतक के लिए शोक मनाना तो उचित है. लेकिन वर्षों तक निरंतर मृतक को स्मृतियों में रोना, उसकी तस्वीर के सामने निरंतर दीपक जलाते रहना, उस आत्मा की आगे की यात्रा में बाधा उत्पन्न करने के अलावा कुछ नहीं है. ऐसा करके मृतक के प्रियजन ही उस आत्मा के आगे की यात्रा में अनजाने में बाधा बन जाते हैं.

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किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद परिवार में कई दिनों तक विशेष धार्मिक कर्म किए जाते हैं. वजह उस आत्मा की आगे की यात्रा को सफल बनाने का उद्देश्य होता है. मृत्यु के बाद घर में 13 दिन तक दीपक जलाने को केवल रोशनी करने की क्रिया नहीं माना जाता है. धार्मिक दृष्टि से अग्नि व प्रकाश को पवित्रता, ज्ञान और मार्गदर्शन का प्रतीक है. इसलिए मृतक के निमित्त जलाया गया दीपक इस भाव को व्यक्त करता है कि दिवंगत जीव की आगे की यात्रा मंगलमय हो और परिवार उसके प्रति श्रद्धा बनाए रखते हुए ईश्वर से उसकी सद्गति की प्रार्थना करें.

जीव (शरीर के रूप में) व्यक्ति की आगे की गति कैसी होगी, यह उसके कर्मों पर निर्भर करता है. मृत्यु के बाद 13 दिनों तक किए जाने वाले कर्म, पिंडदान आदि संस्कारों के बाद तेरहवें दिन होने वाले कर्मों का महत्व सामने आता है. अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं में इन कर्मों की विधि में अंतर हो सकता है. लेकिन इस समय काल में कुछ बातों का ध्यान सभी को रखना चाहिए.

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मृतक की तेरहवीं तक क्या करें क्या नहीं?
इस दौरान मृतक के प्रति श्रद्धा रखें. लेकिन अत्यधिक मोह में न बंधें. किसी प्रियजन के जाने पर रोना स्वाभाविक है. उसकी तस्वीर के सामने बैठकर उसे याद करना भी भावनात्मक रूप से सहज है. लेकिन मृतक को बार-बार पुकारना, उसके जाने को स्वीकार न करना और लगातार विलाप करते रहना उस आत्मा के लिए उचित नहीं. इसके बजाय उसके लिए प्रार्थना, तर्पण, श्राद्ध, दान और सेवा जैसे पुण्य कार्य करना अच्छा है.

13 दिनों की यह अवधि परिवार को भी धीरे-धीरे मृत्यु की वास्तविकता स्वीकार करने का अवसर देती है. धार्मिक दृष्टि से इस दौरान किए जाने वाले कर्मों का उद्देश्य दिवंगत के प्रति कर्तव्य निभाना और उसके लिए सद्गति की कामना करना है. इसके साथ ही परिवार को अपने जीवन में वापस लौटने की तैयारी भी कर लेनी चाहिए.

इसलिए मृतक की तेहरवीं के बाद भी लगातार दीपक जलाना केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि प्रकाश, आशा और सद्गति की कामना का प्रतीक माना जा सकता है. मृतक को श्रद्धा से याद करें. उसके लिए प्रार्थना करें और उसके नाम से सत्कर्म करें. शोक स्वाभाविक है. श्रद्धा को ऐसा रूप देना अधिक उचित माना गया है जो मृतक के प्रति सम्मान भी व्यक्त करे और परिवार को जीवन की ओर आगे बढ़ने का संबल भी दे.

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