दिल्ली इन दिनों तीन शब्दों से गूंज रही है- ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयोग और वोट चोरी. आर-पार की लड़ाई जारी है. राहुल गांधी और समूचा विपक्षी खेमा मान बैठा है कि चुनाव आयोग कंप्रोमाइज हो गया है, और बड़े पैमाने पर वोटों की धांधली करवाकर बीजेपी को चुनाव जितवाया जा रहा है. राहुल काफी पहले से यह मुद्दा उठाते आ रहे थे, लेकिन इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट ने सिर्फ उन्हें ही नहीं, बल्कि बीजेपी से चोट खाई कई विपक्षी पार्टियों और नवजात कॉकरोच जनता पार्टी को सड़क पर आने के लिए नया ईंधन दे दिया है. सबके आरोप कई हैं, लेकिन घुमा-फिराकर मांग एक ही है- ‘ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा’. राहुल गांधी इसी मांग पर डटे हुए हैं, और इस बार पूरी कांग्रेस पार्टी और बाकी विपक्ष भी उनके पीछे है.
ज्ञानेश कुमार के इर्द-गिर्द बुना गया आंदोलन NEET पेपर लीक प्रोटेस्ट जैसा ही है. और यही इस आंदोलन की सबसे बड़ी खामी भी है, क्योंकि दोनों ही मामलों में जमीन-आसमान का फर्क है, खासकर अपराध और अपराधी के नजरिए में. प्रधान के मामले में इस तथ्य को सरकार भी नकार नहीं रही थी कि नीट (NEET) पेपर लीक हुआ है, और यह भी कि परीक्षा लेने वाली एजेंसी एनटीए (NTA) से गलती हुई है. रस्साकशी इस बात पर थी कि पूरी गलती के लिए धर्मेंद्र प्रधान जिम्मेदार हैं या नहीं. चूंकि अपराध साफ-साफ था, इसलिए छात्रों का गुस्सा भी जायज माना गया. छात्रों की महाजुटान के दबाव में आखिरकार धर्मेंद्र प्रधान ने शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. बीजेपी के लिए भी यही अच्छा था कि वह प्रधान के प्रति गुस्से को प्रधानमंत्री के प्रति गुस्से में न बदलने दे. सरकार झुकी, और मामला शांत हो गया.
लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के मामले में दो ही बातें सच हैं- या तो वे दोषी हैं, या नहीं हैं. और यही सबसे बड़ा सस्पेंस है. यदि ज्ञानेश कुमार दोषी हैं, तो इस्तीफा इसकी सजा नहीं हो सकता. ज्ञानेश कुमार कोई राजनेता नहीं हैं, और न ही वे मंत्री जैसे किसी राजनीतिक पद पर बैठे हैं, जो धर्मेंद्र प्रधान की तरह इस्तीफा दे दें. वे एक संवैधानिक पद पर हैं, जिन्हें एक संवैधानिक प्रक्रिया के तहत राष्ट्रपति ने नियुक्त किया है, और जिन्हें हटाने की प्रक्रिया भी तय है.
सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट का इंतजार क्यों नहीं?
ज्ञानेश कुमार का दोष सिद्ध करने के लिए सबसे उचित मंच देश की सर्वोच्च अदालत है, जहां चुनाव आयोग के फैसलों की प्रक्रिया, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में हुई कथित गड़बड़ी और बाकी अन्य आरोपों पर सुनवाई चल रही है. जाहिर है, यहीं पर दोनों पक्षों को सुना जाएगा, और फिर दूध का दूध और पानी का पानी किया जाएगा. लेकिन जैसा कि सब जानते हैं, अदालती कार्यवाही में वक्त लगता है, और विपक्ष के पास उतना वक्त है नहीं. बार-बार ऐसे आंदोलन नहीं खड़े हो सकते, और कौन जाने आगे चलकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या आए. जजमेंट यदि ज्ञानेश कुमार के पक्ष में चला गया, तो और भी बड़ा रिस्क है. ज्ञानेश कुमार के बारे में जो कुछ कहा गया है, वह उल्टा पड़ जाने का खतरा है. हकीकत में देखें तो सुप्रीम कोर्ट में ही यह पता चल पाएगा कि चुनाव आयोग के फैसलों में ज्ञानेश कुमार ने मनमानी की है या नहीं. यहीं पर बाकी के दोनों चुनाव आयुक्तों के ऐतराज की हकीकत का खुलासा होगा, जिसे इंडियन एक्सप्रेस ने रिपोर्ट किया था.
मुख्य चुनाव आयुक्त को महाभियोग से हटाया जा सकता है, लेकिन...
मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की व्यवस्था संविधान ने पहले से की हुई है. उनके खिलाफ संसद में महाभियोग का प्रस्ताव लाकर उन्हें पद से हटाया जा सकता है. लेकिन विपक्ष के लिए यह रास्ता आसान नहीं है. महाभियोग प्रस्ताव लाकर विपक्षी एकता की नुमाइश तो की जा सकती है, लेकिन अपना अंतिम लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता, जो ज्ञानेश कुमार को पद से हटाना है, क्योंकि विपक्ष के पास संसद में उतना संख्या बल नहीं है. इस राह में दूसरी समस्या यह भी है कि यदि यह मामला एक बार संसद के दायरे में गया, तो वहां इस मुद्दे पर बहस भी होगी. विपक्ष निश्चित रूप से चुनाव आयोग और मोदी सरकार पर हमले करेगा, लेकिन एनडीए के पलटवार से नैरेटिव के बिखर जाने का भी खतरा होगा, जैसा कि 2018 में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के मामले में हुआ था.
इस्तीफे की मांग क्यों एक मजबूरी भी है
ज्ञानेश कुमार यदि यह कहकर इस्तीफा दे दें कि चुनाव आयोग एक पवित्र और तटस्थ संस्था है और वे उसकी छवि को विवादों से बचाने के लिए अपने पद से इस्तीफा दे रहे हैं, तो इससे आंदोलनकारी विपक्ष को क्या हासिल होगा? यह तो ज्ञानेश कुमार के लिए एक सेफ एग्जिट (Safe exit) होगा, वैसे ही जैसे धर्मेंद्र प्रधान को मिला था. राहुल गांधी समेत कांग्रेस और बाकी विपक्ष तो उन्हें अपराधी मानता है. ज्ञानेश कुमार यदि इस्तीफा दे देंगे, तो उन्हें सजा कैसे मिलेगी? इसके विपरीत, मोदी सरकार उनकी जगह किसी और को मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त करवा देगी. यह स्थिति वही "ढाक के तीन पात" वाली होगी.
लेकिन ऐसा है नहीं. राहुल गांधी जानते हैं कि यदि उनका दबाव काम कर गया और किसी भी कारण से ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दे देते हैं, तो वे अपने उस नैरेटिव में कामयाब हो जाएंगे, जिसमें वे कहते आए हैं कि वे चुनाव हार नहीं रहे हैं, बल्कि उन्हें हरवाया जा रहा है. इस्तीफे के बाद वे और सख्ती से दोहराएंगे कि ज्ञानेश कुमार तो महज कठपुतली थे, असली मास्टरमाइंड मोदी और अमित शाह हैं, ताकि मुख्य चुनाव आयुक्त की आगामी हर नियुक्ति को कठघरे में डाला जा सके.
अनंत गतिरोध, आंदोलन अनंत
गृह मंत्री अमित शाह उदाहरणों के साथ बता चुके हैं कि कांग्रेस पार्टी हर तरह का चुनाव लड़कर देख चुकी है और हारती ही जा रही है. उसे पता है कि वह 2029 का चुनाव भी हारेगी, इसलिए यह सब ड्रामा कर रही है. कुल मिलाकर, मोदी सरकार ज्ञानेश कुमार पर लगे आरोपों में अपनी कोई भूमिका नहीं देख रही है. आंदोलनकारियों से दिल्ली पुलिस निपट रही है, भाजपा पर लगे आरोपों पर पार्टी के प्रवक्ता टीवी डिबेट में लड़ रहे हैं, और राहुल गांधी तथा कॉकरोच जनता पार्टी अपने-अपने आंदोलन को नया रूप देने के लिए रोज नए-नए इनोवेशन कर रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट में ज्ञानेश कुमार और उनसे जुड़े आंदोलन के इर्द-गिर्द दायर याचिकाओं पर रोज सुनवाई हो रही है. मुद्दा गर्म है, सरकार और विपक्ष अपने-अपने नैरेटिव पका रहे हैं, और इस आंच में चुनाव आयोग झुलस रहा है, क्योंकि ज्ञानेश कुमार चुप हैं.
धीरेंद्र राय