अजित पवार की उपलब्धि भी कम नहीं, लेकिन खामोश रहने के बदले उन्‍हें क्‍या मिल रहा है? | Opinion

अजित पवार जानते थे कि अगर चुपचाप बैठे रहे तो उनका हाल भी शिवपाल सिंह यादव और पशुपति कुमार पारस जैसा हो जाएगा. जैसे ही लगा अपना हक छीनना पड़ता है, न तो विचारधारा की परवाह की, न ही परिवार का लिहाज - और एक दिन सब कुछ लेकर वो चैन की वंशी बजाने लगे.

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अजित पवार के हिसाब से उनको थोड़ा मिला है, और थोड़े की ही जरूरत है. अजित पवार के हिसाब से उनको थोड़ा मिला है, और थोड़े की ही जरूरत है.

मृगांक शेखर

  • नई दिल्ली,
  • 29 नवंबर 2024,
  • अपडेटेड 12:45 PM IST

अजित पवार न मुख्यमंत्री पद की रेस में थे, न अभी हैं. सरकारें बदलती रहती हैं. मुख्यमंत्री कोई भी हो, अजित पवार का डिप्टी सीएम बनना पहले से ही पक्का हो जाता है. तब भी जबकि सिर्फ 72 घंटे के लिए सरकार बनती हो, डिप्टी सीएम के रूप में शपथ तो अजित पवार ही लेते हैं. 

2019 में अजित पवार ने अपने बूते एक कोशिश की थी. वो देवेंद्र फडणवीस के साथ डिप्टी सीएम बन गये थे. लेकिन, मामला टिकाऊ नहीं लगा, और सुबह के भूले की तरह अजित पवार शाम को घर लौट आये थे. दोबारा लंबी छलांग लगाये, और पूरे बंदोबस्त के साथ घर से निकले. जरूरत के सारे ही सामान लेते गये, बल्कि ये भी कह सकते हैं कि बस इतना ही छोड़ा जिससे कुछ दिन तक जीवनयापन हो सके - और अब तो लगता है नई राजनीतिक गृहस्थी ही बसा ली है. 

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हाल ही में जब अजित पवार ने दिल्ली में हुई कारोबारी गौतम अडानी वाली मीटिंग का कुछ ब्योरा सार्वजनिक किया था, तो विचारधारा और सत्ता को लेकर भी एक बड़ी बात कही थी. अजित पवार ने कहा था, विचारधारा की परवाह किसको है. सभी को सत्ता चाहिये. 

अजित पवार का ये बयान, एक तरह से कबूलनामा था. वो भी तो यही कर रहे हैं. कांग्रेस और एनसीपी की विचारधारा तो एक ही है, लेकिन अब वो बीजेपी के साथ गठबंधन का हिस्सा हैं. राजनीतिक बयान के रूप में ही सही, लेकिन देवेंद्र फडणवीस ने भी तो उनकी विचारधारा के बारे में ऐसा ही बताया था, जब वो योगी आदित्यनाथ का विरोध कर रहे थे. 

विरोध तो एक हिसाब से अजित पवार ने एकनाथ शिंदे का भी किया है, ये बोल कर कि वो बीजेपी के साथ हैं. जो हालात हैं, और जो उनकी हैसियत है उसमें जो कुछ वो कर रहे हैं, वो तो सही रणनीति ही लगती है. 

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अजित पवार ने पहले जो भी पाया था, वो सब पवार परिवार से होने की वजह से मिला था. अब उनके पास जो कुछ भी है, वो उनकी निजी उपलब्धि है - और अब ये देखना है अपनी उसी काबिलियत के बदले वो महाराष्ट्र में गठबंधन की सरकार बनने पर क्या क्या पाते हैं?

हक छीनने से ही हासिल होता है

अब तो कोई शक शुबहे वाली बात नहीं होनी चाहिये. अजित पवार ने साबित कर दिया है कि हक हासिल न तो धैर्य के साथ उम्मीदें रखने से होता है, न वक्त आने पर अपनेआप मिलता है - बल्कि, हक सिर्फ छीनने से मिलता है. 

सेटअप तो ऐसा ही था कि अजित पवार को परिवार का सदस्य होने की वजह से राजनीतिक पॉकेट खर्च मिलता रहा. उम्र बढ़ने के साथ खर्च बढ़ता जा रहा था, लेकिन आमदनी उतनी ही जितनी पहले से चली आ रही थी - और ये भी साफ था कि पवार परिवार के राजनीतिक विरासत का कभी बंटवारा हुआ तो अजित पवार के हिस्से में पॉकेट खर्च से ज्यादा तो मिलने से रहा. 

अजित पवार को मालूम था कि शरद पवार तो अपनी राजनीतिक विरासत सुप्रिया सुले को ही देंगे. लालू यादव की बात भी उनको हर वक्त याद रहती ही होगी कि वारिस तो बेटा ही होगा. यूपी में शिवपाल सिंह यादव का मुलायम सिंह यादव परिवार में क्या हाल हुआ वो भी जानते ही थे. बिहार में पशुपति कुमार पारस के साथ राम विलास पासवान परिवार में क्या हुआ सभी जानते हैं. फर्क थोड़ा समय का ही था, लेकिन आखिर में चिराग पासवान को भी वो सब मिल ही गया, जो यूपी में अखिलेश यादव को मिला. अब दोनो अपने अपने तरीके से अपना अपना खानदानी बिजनेस आगे बढ़ा रहे हैं. 

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एनसीपी पर लगभग पूरी तरह काबिज होने के बाद अजित पवार ने भी आगे का एक्शन प्लान बता दिया है. कहते हैं, हमारी पार्टी राष्ट्रीय पार्टी थी... वो दर्जा फिर से हासिल करने के लिए अब और मेहनत की जरूरत है. बताया है कि दिसंबर के बाद एनसीपी का राष्ट्रीय सम्मेलन होगा, और पार्टी के भीतर जिम्मेदारियां सौंपी जाएंगी. 

कभी शरद पवार के करीबी और भरोसेमंत माने जाने वाले प्रफुल्ल पटेल अब अजित पवार के साथ हैं. वो बताते हैं, हमारी पार्टी को तीन राज्यों में मान्यता मिल गई है... नगालैंड में 7 सीटें और अरुणाचल प्रदेश में तीन सीटें जीती हैं... वहां हमें 10.6 फीसदी वोट मिले... अब हम रुकेंगे नहीं... हम दिल्ली विधानसभा चुनाव लड़ेंगे, और मुझे विश्वास है कि कामयाबी हासिल करेंगे.

वैसे तो दुनिया में किसी चीज की गारंटी नहीं है. कल को हो सकता है, सियासी समीकरण बदले और सुप्रिया सुले फिर से चिराग पासवान की तरह काबिज हो जायें, लेकिन आज की तारीख में तो पार्टी की पहचान, नाम और चुनाव निशान सब कुछ अजित पवार के पास ही है. ये अलग बात है कि ये सब सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक ही है, लेकिन क्या मालूम सुप्रीम कोर्ट को महाराष्ट्र विधानसफा के स्पीकर और चुनाव आयोग की तरह अजित पवार का ही पक्ष सही लगे, और सब कुछ हमेशा के लिए अजित पवार का हो जाये. 

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बीजेपी के ब्लाइंड सपोर्ट के बदले में क्या मिलने वाला है

उपलब्धि का कोई पैमाना नहीं होता. कोई भी चीज किसी के लिए मामूली बात हो सकती है, और वही किसी और के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि हो सकती है. लेकिन, अजित पवार को अब तक जो कुछ भी मिला है, वो किसी उपलब्धि से कम नहीं है. 

मानकर चलना चाहिये, अजित पवार के लिए डिप्टी सीएम की कुर्सी बरकरार रहेगी. मौके की नजाकत तो देखते हुए अजित पवार ने मुख्यमंत्री पद के लिए बीजेपी के उम्मीदवार का एकनाथ शिंदे से पहले ही सपोर्ट कर दिया था. एक तरह से एकनाथ शिंदे को झटका ही दिया था. अपने हिसाब से बात को अंजाम तक पहुंचा दिया था, हमने पहले कभी भी इस बात पर चर्चा नहीं की कि महाराष्ट्र का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा... मुख्यमंत्री के लिए पहले से चर्चा करने से पार्टी को नुकसान हो सकता है. बैठक के बाद ही हम फैसला करेंगे. 

अजित पवार चुनावों के दौरान जब यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कॉल 'बंटेंगे तो कटेंगे' का विरोध कर रहे थे, तो एक पल के लिए ऐसा लग रहा था जैसे घरवापसी का प्लान कर रहे हों. सुनेत्रा पवार को बारामती से चुनाव लड़ाये जाने पर अफसोस तो जता ही चुके थे. अजित पवार पर देवेंद्र फडणवीस का बयान आने के बाद तो ये भी लगा कि रास्ते अलग हो सकते हैं - लेकिन जल्दी ही मंशा साफ तौर पर समझ में आ गई थी कि वो सब चुनावी शिगूफे थे, और कुछ नहीं. 

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ये तो तय है कि सबसे ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने और जीतने वाली बीजेपी के पास कैबिनेट में विभाग भी ज्यादा ही होंगे, और अजित पवार का नंबर भी एकनाथ शिंदे के बाद ही आएगा - लेकिन शोर मचा रही अजित पवार की खामोश रणनीति की बदौलत जो कुछ भी हासिल होता नजर आ रहा है, कहीं से भी कम नहीं है.

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