महाकाल की नगरी उज्जैन में आयोजित आजतक धर्म संसद के विशेष सत्र 'शिव कथा' में सावन, शिव भक्ति और प्रकृति के महत्व पर विस्तार से चर्चा हुई. कथावाचक चिन्मयानंद बापूजी ने पूजा का सही अर्थ समझाया और यह भी कहा कि भगवान सिर्फ भाव के भूखे हैं. उन्होंने कहा कि, जिस क्रिया से ऐश्वर्य, लक्ष्मी धन इत्यादि की प्राप्ति होती है उस क्रिया का ही नाम है पूजा. पूजा की बहुत सारी विधियां हैं. जैसे जैसे हमारा भाव बढ़ता जाता है.
हमारी श्रद्धा बढ़ती जाती है पूजा की सामग्री बढ़ती चली जाती है. क्रिया बढ़ती चली जाती है. हमारे भोलेनाथ औघड़ दानी है. उनको कुछ भी अर्पित न किया जाए, सिर्फ स्नान करते हुए केवल हर हर महादेव कह दिया जाए हमारे भोलेनाथ उतने में ही प्रसन्न हो जाते हैं, उसको जो चाहिए भोलेनाथ वो दे देते हैं. पूजा की कोई भी लिमिटेशन नहीं है. पूजा की कोई भी एक अवधि नहीं है. जितनी देर कर सकते है, जैसे मर्जी कर सकते हैं. भगवान कहते है 'मैं भाव का भूखा हूं.'
वहीं, महेश गिरी महाराज ने कहा कि सावन में हर किसी के लिए कांवड़ यात्रा करना संभव नहीं होता, लेकिन भगवान शिव की कृपा पाने के लिए सबसे जरूरी चीज श्रद्धा और भाव है. उन्होंने कहा कि शास्त्रों के अनुसार पूजा का अर्थ उस साधना से है, जिससे सुख, ऐश्वर्य और लक्ष्मी की प्राप्ति हो. पूजा की विधियां अनेक हो सकती हैं, लेकिन भगवान शिव के लिए सबसे महत्वपूर्ण भक्त का भाव है.
महेश गिरी महाराज ने कहा कि भोलेनाथ को 'अवघड़दानी' यूं ही नहीं कहा जाता. यदि कोई व्यक्ति स्नान करते समय सच्चे मन से केवल 'हर-हर महादेव' का स्मरण भी कर ले, तो शिव प्रसन्न हो जाते हैं. उन्होंने कहा कि पूजा की कोई निश्चित अवधि या सीमा नहीं है. जितना समय और जिस भाव से श्रद्धालु भगवान को याद करता है, वही उसकी सबसे बड़ी आराधना है. उन्होंने कहा कि शिव भाव के भूखे हैं, इसलिए सच्ची श्रद्धा ही मनुष्य को भवसागर से पार लगाने का माध्यम बनती है.
महेश गिरी जी कहते हैं कि प्रकृति के रूप में भी शिव ही हैं. कहा भी गया है 'विभूं व्यापकं ब्रह्म वेद: स्वरूपम' . शिवजी सृष्टि के मूल हैं. यानी वही बीज हैं. यहां आम का बोया गया है तो तना भी आम ही का कहलाएगा. पत्तियां भी आम की कहलाएंगी. फूल जो लगेंगे वो भी आम के कहलाएंगे और फल भी आम ही है. तो बीज चाहे पेड़ बन जाए, चाहे फल बन जाए, कुछ भी बन जाए उसकी मूल पहचान वही बीज ही होती है. ऐसी ही प्रकृति का मूल भी शिव ही हैं. प्रकृत जगत की सेवा भी अगर ये समझ के की जाए की इसमें भी शिव व्याप्त हैं, तो प्रकृति सेवा भी शिव की सेवा हो जाती है.
इसकी और भी व्याख्या करते हुए चिन्मयानंद बापूजी ने कहा कि, युवाओं के मन में अक्सर प्रश्न रहता है की सनातन में प्रकृति की पूजा क्यों होती है? हमारे यहां पेड़ों की पूजा, पशुओं की पूजा, पक्षियों की पूजा पर्वतों की पूजा पूरी प्रकृति की पूजा क्यों होती है? मैं लंदन में कथा कर रहा था तो वहां पर एक धर्म सम्मेलन था तो उसमें बहुत सारे धर्म के धर्म अनुयायी और धर्म गुरु आए थे. तो वहां बात चली की सनातन धर्म बड़ा कॉम्प्लिकेटेड है. बड़ा उलझा हुआ है.
मैंने पूछा क्यों? तो वह लोग बोले- उसमें बहुत सारे देवता है और सबकी पूजा होती है. वहां पीपल वृक्ष की पूजा होती है तुलसी की पूजा होती है, गिरिराज गोवर्धन की पूजा होती है गंगा, यमुना सरस्वती इन सब की पूजा होती है तो बड़ा उलझा हुआ धर्म है. मैंने कहा नहीं महोदय उलझा हुआ नहीं है बड़ा विस्तृत और बड़ा सुलझा हुआ धर्म है. क्योंकि हमारा धर्म कहता है 'सर्वम खलु इदं ब्रह्म' सारे जगत में केवल और केवल ब्रह्म ही है.
सारे जगत को ये पता है परमात्मा एक ही है. इस सृष्टि के पहले भी एक ही ब्रह्म था 'एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति' और सृष्टि के साथ भी एक ही ब्रह्म है और सृष्टि के बाद भी एक ही ब्रह्म रहेगा. तो जब एक ही ब्रह्म था और कुछ भी ना था तो संसार बना कैसे जगत बना कैसे? तो हमारा वेद कहता है जगत को बनाने वाला भी वही है और जगत में सब कुछ बनने वाला भी वही है. वही पर्वत, वही नदियां वही वृक्ष, वही पशु, वही धरती, वही आकाश, वही हवाएं सब कुछ वही बना इसलिए हमारा सनातन धर्म ये मानता है कि सर्वम खलु इदं ब्रह्मा इसलिए परमात्मा को पूरी प्रकृति में दर्शन करते हुए पहचानते करते हुए परमात्मा की पूजा कर रहे है.
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