MP News: शहडोल जिले के मझगवां गांव के सलैया टोला में रहने वाले बैगा और भूमिया आदिवासी परिवारों के लिए अनाज सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि उनकी पीढ़ियों की पहचान, परंपरा और खुशहाली का आधार है. आधुनिक कृषि के इस दौर में जहां रासायनिक खादों और हाइब्रिड बीजों का चलन तेजी से बढ़ रहा है, वहीं इन आदिवासी परिवारों ने अपने घरों की कोठरियों में सदियों पुराने देसी बीजों को किसी अनमोल खजाने की तरह सहेजकर रखा है.
आज जब खेती में आधुनिक और हाइब्रिड किस्मों का चलन बढ़ रहा है, वहीं मझगवां के बैगा और भूमिया समाज के किसान अपनी पुरानी देसी किस्मों को आज भी संजोए हुए हैं. झोलार, बांसपोर, ठर्री, सरैय्या, गुरमटिया, करन फूल और भेजरी जैसी पारंपरिक धान की किस्में यहां के खेतों में आज भी दिखाई देती हैं. इसी तरह लेदरी कोदो, बासिन कोदो, कोदैली कोदो, बेमेरहा कुटकी, जाली कुटकी, छोटाही कुटकी, भदैली कुटकी, कागुन, समा और मिलो जैसे श्री अन्न भी यहां की खेती और भोजन का हिस्सा हैं.
भोल्ली सिंह की तंदुरुस्ती का राज
मझगवां के किसान भोल्ली सिंह बताते हैं कि उनके खेत में उगाई जाने वाली देसी धान और मोटे अनाज की किस्में उनके रोजमर्रा के भोजन का मुख्य हिस्सा हैं.
"60 वर्ष से अधिक उम्र होने के बाद भी मैं आसानी से 20 से 25 किलोमीटर तक साइकिल चला लेता हूं. यह सब हमारे पारंपरिक और शुद्ध भोजन की वजह से ही संभव है. जब खेत का अनाज घर आता है और रसोई तक पहुंचता है, तो मेहनत सफल हो जाती है."
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बीजों को बचाना यानी अपनी पहचान और परंपरा को बचाना: बिरमतिया बैगा
सलैया टोला की बिरमतिया बैगा अपने खेतों में समा, कुटकी, सिकिया, काकुन, सरैय्या और ठर्री धान जैसी पारंपरिक फसलें उगाती हैं. वे बताती हैं कि एक मौसम की फसल से प्राप्त बीजों को संभालकर रखना और अगले मौसम में उन्हीं से खेती करना उनकी पीढ़ियों पुरानी परंपरा है.
बिरमतिया का मानना है कि:
"इन बीजों में हमारे पुरखों की यादें और खेती की पद्धतियां बसी हैं. इन्हें सुरक्षित रखना इसलिए जरूरी है ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी भी इन पारंपरिक अनाजों के स्वाद, पोषण और महत्व को जान सके."
सामूहिक संरक्षण और वर्षभर की खाद्य आत्मनिर्भरता
इसी गांव की धनवतिया बैगा भी झुंझरु, पैलहाई, बरबट्टी, मक्का, कोदो और कुटकी के संरक्षण में जुटी हैं. जब उनसे बीजों की उपलब्धता के बारे में पूछा जाता है, तो वे सहजता से कहती हैं कि अगर उनके घर में बीज न मिले, तो आसपास के पहाड़ी गांवों से मिल जाते हैं. यह दर्शाता है कि बीज संरक्षण केवल एक परिवार का व्यक्तिगत प्रयास नहीं, बल्कि पूरे समुदाय की साझी विरासत है.
खेती से प्राप्त अनाज को कोठरियों में सुरक्षित रखने से इन परिवारों को पूरे साल भोजन की निश्चिंतता रहती है. अपनी जमीन, अपने बीज और अपनी मेहनत, यही इनकी आत्मनिर्भर और खुशहाल जिंदगी का मूलमंत्र है.
कृषि वैज्ञानिक ने सराहा प्रयास
कृषि वैज्ञानिक डॉ. बीके प्रजापति के अनुसार, मझगवां क्षेत्र के बैगा और भूमिया समाज के किसान प्राचीन काल से पारंपरिक कृषि ज्ञान और जैव-विविधता को बचाए रखने में अहम भूमिका निभा रहे हैं. आधुनिक दौर में भी देसी किस्मों को सहेजकर रखना कृषि विज्ञान और पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से एक अनुकरणीय उदाहरण है.
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