मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कांग्रेस ने अपने तेवर और तीखे कर दिए हैं. मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) और फॉर्म-6 में बदलावों को लेकर शुरू हुआ यह राजनीतिक विवाद अब अपने चरम पर पहुंच चुका है. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और 'INDIA' गठबंधन के नेताओं ने कांग्रेस दफ्तर से लेकर सुप्रीम कोर्ट के दरवाजों तक पैदल मार्च निकालकर आयोग और केंद्र सरकार के खिलाफ सीधा शक्ति प्रदर्शन किया.
कांग्रेस और 'INDIA' गठबंधन का यह विरोध प्रदर्शन एक सोची-समझी रणनीति के तहत चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ा है. कदम-दर-कदम विपक्ष ने इस पूरे आंदोलन के दायरे को सड़क से लेकर सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे तक पहुंचा दिया है.
चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्ष का यह आक्रामक रुख साफ संकेत दे रहा है कि आगामी 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले वह चुनाव आयोग की निष्पक्षता और चुनावी प्रक्रियाओं को लेकर किसी भी तरह की ढील देने के मूड में नहीं है. इस प्रदर्शन के जरिए कांग्रेस के निशाने पर भले ही चुनाव आयोग हो, लेकिन असल सियासी निशाना मोदी सरकार और बीजेपी है.
पहला चरण: संसद से राष्ट्रपति भवन और आकाशवाणी तक संग्राम
कांग्रेस और विपक्षी दलों ने चुनावी प्रक्रिया, विशेष रूप से 'वोट चोरी' के आरोपों और मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े विवादों को लेकर सबसे पहले आवाज बुलंद की. विपक्षी सांसदों ने संसद भवन से मार्च निकालते हुए चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के रुख के खिलाफ मोर्चा खोला.
प्रदर्शन के दौरान जब पुलिस ने विपक्षी नेताओं को रोका, तो राहुल गांधी और प्रियंका गांधी आकाशवाणी के पास धरने पर बैठ गए. करीब सात घंटे तक चले इस धरने को पुलिस ने काफी मशक्कत के बाद समाप्त कराया. इसके बाद राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे, ममता बनर्जी और अन्य विपक्षी नेताओं ने राष्ट्रपति से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपा. राहुल गांधी ने कहा कि उन्होंने राष्ट्रपति को 'वोट चोरी' से लोकतंत्र को पहुँच रहे नुकसान से अवगत कराया है और राष्ट्रपति ने इस पर उनसे दस्तावेज व सबूत मांगे हैं.
दूसरा चरण: राजघाट पर राहुल गांधी और विपक्ष का सत्याग्रह
प्रशासनिक स्तर पर प्रदर्शन रोकने की कोशिशों के बीच विपक्ष ने अपनी लड़ाई को नैतिक और वैचारिक आधार देने के लिए महात्मा गांधी की समाधि स्थल (राजघाट) का रुख किया. आकाशवाणी के पास हुए धरने के अगले दिन राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और 'INDIA' गठबंधन के तमाम सांसद कनॉट प्लेस में एकजुट होकर बसों के जरिए राजघाट पहुँचे.
राजघाट पर राष्ट्रपिता को श्रद्धांजलि देने के बाद विपक्षी नेताओं ने शांतिपूर्ण धरना दिया. इस दौरान सरकार और चुनाव आयोग को 'सद्बुद्धि' मिलने की प्रार्थना करते हुए लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा का संकल्प लिया गया. इसके जरिए संदेश दिया गया कि यह लड़ाई सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि लोकतंत्र को बचाने की नैतिक जंग है.
तीसरा चरण: कानूनी लड़ाई के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख
संसद से सड़क तक आंदोलन चलाने के बाद विपक्ष ने इस लड़ाई को निर्णायक मोड़ देने के लिए न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाया. राहुल गांधी ने कांग्रेस और सहयोगी दलों के नेताओं के साथ सुप्रीम कोर्ट तक पैदल मार्च कर याचिका दायर की. राहुल गांधी चाहते तो सुप्रीम कोर्ट अपने कुछ नेताओं के साथ जाकर याचिका दायर कर सकते थे, लेकिन उन्होंने बकायदा कांग्रेस और विपक्षी नेताओं के साथ मार्च निकालकर सियासी संदेश दिया.
विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ और SIR व फॉर्म-6 से जुड़ी कथित अनियमितताओं को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की. कांग्रेस का मानना है कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था में जनता का भरोसा बहाल करने और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए अब देश की सर्वोच्च अदालत ही मुख्य मंच है. याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से निलंबित करने और उनके फैसलों पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की गई है.
संसद से सुप्रीम कोर्ट तक राहुल गांधी का शक्ति प्रदर्शन
राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे, सपा प्रमुख अखिलेश यादव और आरजेडी नेता तेजस्वी यादव समेत गठबंधन के प्रमुख दिग्गजों ने हाथों में संविधान की प्रति लेकर दिल्ली की सड़कों पर शक्ति प्रदर्शन किया. विपक्षी खेमे का तर्क है कि आयोग में सुनवाई न होने के बाद अदालत और जनता का दरबार ही अंतिम रास्ता बचा था.
दरअसल, राहुल गांधी इस पूरे आंदोलन के जरिए एक बड़ा परसेप्शन सेट करने की कोशिश कर रहे हैं. हाथ में संविधान लेकर सड़क पर उतरना यह संदेश देता है कि वे सत्ता के लिए नहीं, बल्कि लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं. प्रेस कॉन्फ्रेंस में आयोग और सरकार को सीधे निशाने पर लेना और 'डरो मत' का नारा देना कैडर में नई ऊर्जा भरने की रणनीति है.
संसद भवन से सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च निकालना और विपक्षी कार्यकर्ताओं/नागरिकों को साथ जोड़ना इस बात का प्रतीक है कि जब संस्थागत रास्तों पर सुनवाई नहीं होती, तो न्याय के लिए सर्वोच्च अदालत और जनता के दरबार का दरवाजा खटखटाना पड़ता है. इस तरह अपने कैडर के मनोबल को ऊंचा उठाने और सत्ता पक्ष को बैकफुट पर धकेलने की रणनीति है.
उत्तर प्रदेश समेत आगामी सात राज्यों के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले चुनाव आयोग की निष्पक्षता और मतदाता सूची पुनरीक्षण जैसे मुद्दों को केंद्र में लाना विपक्ष के लिए कैडर को सक्रिय करने का बड़ा जरिया बन गया. चुनाव आयोग की निष्पक्षता के मुद्दे को केंद्र में लाकर विपक्ष ने अपने कार्यकर्ताओं को लामबंद कर दिया है.
राहुल गांधी का यह 'आखिरी रण' केवल एक विरोध-प्रदर्शन नहीं, बल्कि यह नरेटिव सेट करने की कोशिश है कि चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखना देश का सबसे बड़ा मुद्दा है. इसीलिए स्टेप बाय स्टेप चुनाव आयोग और सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है. ऐसे में देखना है कि राहुल गांधी और विपक्ष के नेता क्या सियासी नैरेटिव सेट कर पाएंगे?
कुबूल अहमद