राहुल गांधी का मिशन 2029? इम्तिहान से पहले कांग्रेस संगठन में बदलाव, जमीन पर आक्रामक संघर्ष की नई रणनीति तैयार

कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव 2029 की तैयारी में संगठनात्मक बदलाव किए हैं, जिसमें मणिकम टैगोर, बीवी श्रीनिवास और राजेंद्र पाल गौतम को महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त किया गया है. ये कदम पार्टी के सामाजिक न्याय और कैडर मजबूती के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए उठाया गया है.

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कांग्रेस संगठन में बड़े बदलाव. (photo: ITG) कांग्रेस संगठन में बड़े बदलाव. (photo: ITG)

मौसमी सिंह

  • नई दिल्ली,
  • 30 जून 2026,
  • अपडेटेड 8:32 AM IST

कांग्रेस पार्टी ने आगामी लोकसभा चुनाव 2029 की बड़ी राजनीतिक लड़ाई को ध्यान में रखते हुए अपने संगठनात्मक ढांचे में एक बड़े बदलाव और फेरबदल की शुरुआत कर दी है. इस रणनीतिक सांगठनिक फेरबदल के तहत पार्टी ने कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने के लिए मणिकम टैगोर और बीवी श्रीनिवास जैसे सड़क पर संघर्ष करने वाले आक्रामक नेताओं को संगठन के बेहद महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त किया है.

इसके साथ ही ढाई साल पहले आम आदमी पार्टी छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए प्रमुख दलित नेता और पूर्व मंत्री राजेंद्र पाल गौतम को अविनाश पांडे की जगह उत्तर प्रदेश जैसे रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण राज्य का प्रभारी नियुक्त किया गया है. राहुल गांधी की सामाजिक न्याय की मुहिम को और ज्यादा आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाने तथा जमीनी स्तर पर कैडर को मजबूत करने के उद्देश्य से सेवा दल के मुख्य संगठक के रूप में पूर्व युवा कांग्रेस अध्यक्ष बीवी श्रीनिवास को कमान सौंपी गई है, ताकि देश भर में संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष को और तेज किया जा सके.

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यूपी में कांग्रेस का बड़ा दांव

कांग्रेस के SC/ST विभाग के तत्कालीन चेयरमैन राजेंद्र पाल गौतम कुछ हफ्ते पहले,  तब चर्चा में आए थे जब वो शिष्टाचार भेंट के लिए BSP प्रमुख मायावती के लखनऊ स्थित आवास पर गए थे. हालांकि, BSP प्रमुख उनसे नहीं मिलीं, जिससे ये अटकलें लगने लगीं कि राहुल गांधी की पहल को ठुकरा दिया गया है. हालांकि, इस पहल से ये संकेत मिला कि कांग्रेस BSP-SP-कांग्रेस के बीच तालमेल की संभावना को बनाए रखने की इच्छुक है.

दलित समुदाय से आने वाले वकील और एक्टिविस्ट राजेंद्र पाल गौतम का सामाजिक नेटवर्क मज़बूत है. इस कदम के ज़रिए पार्टी ये साफ संदेश देना चाहती है कि राहुल गांधी के सामाजिक न्याय के मुद्दे को अब और जोर-शोर से आगे बढ़ाया जाएगा.

वहीं, जब उनसे पूछा गया कि क्या BSP के लिए दरवाज़े अभी भी खुले हैं तो गौतम ने कहा, 'हम संविधान में विश्वास रखने वाली सभी पार्टियों को साथ आने का न्योता देते हैं. आने वाले कुछ महीनों में आप उत्तर प्रदेश में जबरदस्त गतिविधियां देखेंगे, जहां हम सबसे गरीब लोगों तक पहुंचेंगे. राहुल गांधी ने लगातार सामाजिक न्याय का मुद्दा उठाया है और दलित तेज़ी से कांग्रेस की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं कि वह उनके हक़ के लिए खड़ी होगी.'

दिलचस्प बात ये है कि राजेंद्र पाल गौतम 2014 में AAP के टिकट पर जीते थे, विधायक बने और बाद में मंत्री भी बने; एक वक्त वो लगभग 18 विभागों का काम संभाल रहे थे. हालांकि, बाद में अरविंद केजरीवाल से उनके मतभेद हो गए और 2024 में अपना कार्यकाल पूरा होने से मुश्किल से आठ महीने पहले उन्होंने पार्टी छोड़ दी.

उन्होंने कहा, 'मैंने 2020 में 'मिशन जय भीम मोर्चा' बनाया और लगातार दलितों के मुद्दे उठाए. असल में पिछड़े समुदायों की नियुक्तियों, खासकर नौकरशाही और मोहल्ला क्लीनिक में नियुक्तियों में आरक्षण को लेकर केजरीवाल के साथ मेरे मतभेद बढ़ते गए, जिसके कारण आखिरकार मुझे इस्तीफ़ा देना पड़ा.'

2024 में राहुल गांधी के साथ आमने-सामने की मुलाकात के बाद गौतम कांग्रेस में शामिल हुए.

गौतम ने याद करते हुए कहा, 'मैं राहुल गांधी की ईमानदारी से हैरान था. उन्होंने मुझे बताया कि वो ऐसे परिवार से आते हैं, जहां उन्होंने अपने परिवार के सदस्यों को प्रधानमंत्री बनते और फिर बेरहमी से हत्या का शिकार होते देखा है. उन्होंने अपनी ज़िंदगी का ज़्यादातर हिस्सा पुलिस सुरक्षा में बिताया है. भारत जोड़ो यात्रा के दौरान, रोजाना लोगों से बातचीत करने के बाद उन्हें एहसास हुआ कि बहुत से लोग बेज़ुबान हो गए हैं और न्याय की तलाश में हैं. उसी दिन उन्होंने फ़ैसला किया कि वो दबे-कुचले लोगों के लिए खड़े होंगे, चाहे नतीजे कुछ भी हों.'

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युवा और अनुभवी नेताओं का संगम

इस सांगठनिक फेरबदल में एक और महत्वपूर्ण नियुक्ति पूर्व युवा कांग्रेस अध्यक्ष बीवी श्रीनिवास की काफी चर्चा हो रही है, जिन्हें कांग्रेस सेवा दल का मुख्य संगठक बनाया गया है.(आज का सेवा दल उस दौर के ताकतवर 'हिंदुस्तानी सेवा दल' की बस एक परछाईं भर रह गया है, जिसके पहले अध्यक्ष 1923 में जवाहरलाल नेहरू थे)  श्रीनिवास को ये ज़िम्मेदारी मिलना चौंकाने वाला था, क्योंकि श्रीनिवास अपने आक्रामक अंदाज़ और काम में सीधे शामिल होने के तरीक़े के लिए जाने जाते हैं. उन्हें अक्सर विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व करते, वॉटर कैनन का सामना करते और पुलिस बैरिकेड्स पार करते देखा जाता है.

कोरोना महामारी के दौरान जनसेवा के लिए देश भर में अपनी पहचान बनाने वाले श्रीनिवास ने 2019 से 2024 के बीच महंगाई, बेरोज़गारी, कृषि कानूनों, NRC-CAA और कई अन्य मुद्दों पर विरोध प्रदर्शनों के जरिए यूथ कांग्रेस की जमीनी स्तर पर लड़ने वाली छवि बनाने में भी मदद की थी.

श्रीनिवास ने कहा, '102 साल पुराने कांग्रेस सेवा दल के मुख्य आयोजक के तौर पर इस नई यात्रा की शुरुआत करते हुए- एक ऐसा संगठन, जिसका नेतृत्व कभी जवाहरलाल नेहरू ने इसके पहले अध्यक्ष के तौर पर किया था- मैं इस भूमिका के साथ आने वाली बड़ी ज़िम्मेदारी को अच्छी तरह समझता हूं.'

दिलचस्प बात ये है कि 1924 में बेलगाम कांग्रेस अधिवेशन के दौरान, महात्मा गांधी ने हिंदुस्तानी सेवा दल के अनुशासन, स्वच्छता और सुरक्षा व्यवस्था की तारीफ़ की थी.

शायद श्रीनिवास को संगठन में नई ऊर्जा भरने के लिए लाया गया है. उन्होंने कहा, 'मैं कांग्रेस सेवा दल को एक ऐसी ताकत में बदलने की कोशिश करूंगा जो युवाओं की ऊर्जा और अनुभव की समझ को मिलाती हो. साथ ही, मैं एक निडर, अनुशासित और विचारधारा के प्रति समर्पित कैडर तैयार करूंगा, जो संविधान, लोकतंत्र और जनता की आवाज़ की रक्षा के लिए हमेशा सड़कों पर उतरने को तैयार रहे- राहुल गांधी के सच्चे 'बब्बर शेरों' की तरह.'

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CM विजय के साथ बढ़ेगा तालमेल

संसद के अंदर पार्टी के लिए संकटमोचक की भूमिका निभाने वाले वरिष्ठ नेता मणिकम टैगोर को भी संगठन में नई और बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई है. टैगोर को राहुल गांधी के सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में गिना जाता है, जो सदन के अंदर सांसदों के समन्वय से लेकर सरकार के खिलाफ प्रदर्शनों की कप्तानी करने तक हमेशा अगली कतार में खड़े दिखाई देते हैं. तमिलनाडु में बदले हुए राजनीतिक घटनाक्रम और मुख्यमंत्री विजय के साथ राहुल गांधी की बढ़ती नजदीकियों के बीच मणिकम टैगोर की ये भूमिका गठबंधन को और अधिक मजबूत बनाने के लिहाज से बेहद अहम मानी जा रही है.

नई जिम्मेदारी को लेकर उन्होंने इंडिया टुडे-आजतक को बताया, 'ये कोई पद नहीं, बल्कि एक ज़िम्मेदारी है. हो सकता है कि आज हम सरकार में शामिल हों, लेकिन हमारा मिशन 2029 है. हम लोगों तक पहुंचेंगे और उनसे एकजुट होकर काम करने का आग्रह करेंगे, ताकि भारत का शासन वापस जनता के हाथों में लाया जा सके और हमारे नेता राहुल गांधी को भारत का प्रधानमंत्री बनाया जा सके. ये एक आंदोलन बनने जा रहा है. हम आज ही इसे बनाना शुरू करेंगे और 2029 में जीत की नींव रखेंगे.'

कई राज्यों में बड़ा फेरबदल

वहीं, अलग-अलग राज्यों में सत्ता के ढांचे में बदलाव के कारण भी कुछ नियुक्तियां जरूरी हो गई हैं. उदाहरण के लिए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता बी.के. हरिप्रसाद, जो कर्नाटक कांग्रेस के अध्यक्ष बन गए हैं, उन्हें हरियाणा प्रभारी की ज़िम्मेदारी से मुक्त कर दिया गया है. उनकी जगह महाराष्ट्र के पूर्व विधायक और AICC सचिव संजय दत्त को हरियाणा का प्रभारी नियुक्त किया गया है.

इसके अलावा सेवा दल के पूर्व प्रमुख लालजी देसाई को अजय लल्लू की जगह ओडिशा का नया प्रभारी बनाया गया है, ताकि अजय लल्लू आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में पार्टी के एक प्रमुख पिछड़े वर्ग के चेहरे के रूप में अपना पूरा ध्यान केंद्रित कर सकें.

कहा जा सकता है कि इस फेरबदल का लंबे वक्त से इंतजार था और इसमें महीनों की देरी हुई. राहुल गांधी पर अक्सर नियुक्तियों और संगठनात्मक फैसलों में देरी करने के आरोप लगते रहे हैं. हालांकि, पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने इस पर अलग नजरिया पेश किया.

नेता ने कहा, 'हो सकता है कि अतीत में ऐसा रहा हो, लेकिन अगर आप पिछले कुछ महीनों पर नजर डालें तो राहुल गांधी ने कहीं अधिक निर्णायक फैसले लिए हैं और पार्टी में नया जोश है. चाहे केरल हो, तमिलनाडु हो या कर्नाटक, पार्टी एक्शन मोड में रही है. राहुल गांधी ने छात्रों के मुद्दों को उठाया है और शायद उनके लिए सबसे मजबूत और सच्ची आवाज बनकर उभरे हैं.'

क्या ये सिर्फ 'रबर स्टैम्प' हैं नियुक्तियां?

आने वाले हफ्तों में पंजाब, छत्तीसगढ़, राजस्थान, उत्तराखंड और यहां तक कि झारखंड में भी और संगठनात्मक बदलावों की उम्मीद है. कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने जमीनी कैडर को फिर से सक्रिय करना है. अक्सर संगठनात्मक नियुक्तियां महज 'रबर-स्टैम्प' पदों तक सीमित रह जाती हैं, जहां नेताओं को दिल्ली से नियंत्रित किया जाता है और खराब चुनावी प्रदर्शन के लिए जवाबदेही बहुत कम होती है. हरियाणा, महाराष्ट्र या बिहार विधानसभा चुनावों में मिली करारी हार के उदाहरणों को ही देख लीजिए.

कमांड स्ट्रक्चर के अत्यधिक केंद्रीकृत होने के कारण, राज्य यूनिटें अपनी लड़ाई लड़ने के लिए काफी हद तक केंद्रीय नेतृत्व पर निर्भर रही हैं. क्या इस संगठनात्मक बदलाव से स्थिति बदलेगी, ये देखना बाकी है. इसकी पहली परीक्षा जल्द ही हो सकती है.

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