ये मेरठ डिस्ट्रिक्ट कोर्ट है. ये इसी कोर्ट के डिस्ट्रिक्ट जज अरविंद कुमार मिश्रा की अदालत है. 14 अक्टूबर की सुबह ठीक 10 बजकर 10 मिनट पर जज साहब अपनी कुर्सी पर बैठते हैं. सरकारी वकील और बचाव पक्ष की वकीलो की टीम पहले से ही अदालत में मौजदू थी. कार्यवाही की शुरुआत टीवी स्क्रीन ऑन होने के साथ होती है. इस कोर्टरूम से करीब 4 किलोमीटर की दूरी पर मेरठ जेल की वीसी रूम में तब तक दोनों आरोपी यानि मुस्कान और साहिल कैमरे के सामने बैठ चुके थे.
कोर्टरूम में सिर्फ़ जज साहब और कोर्ट का एक स्टाफ ही साहिल और मुस्कान को देख पा रहा था. क्योंकि टीवी स्क्रीन का रुख जज साहब की तरफ़ था. जज साहब सवालों का सिलसिला शुरु करते हैं. सबसे पहले वो मुस्कान से कहते हैं कि आज मैं आपको सज़ा सुनाने जा रहा हूं. क्या आपको ये पता है. मुस्कान बिना कुछ बोले ख़ामोशी से हां में सर हिला देती है. इसके बाद वो मुस्कान से पूछते हैं कि उसे कुछ कहना है. मुस्कान खामोश रहती है. मु्स्कान से जज साहब फिर सज़़ा के बारे में पूछते हैं. कि उसे क्या लगता है. मुस्कान तब भी ख़ामोश रहती है.
मु्स्कान की इसी ख़ामोशी के बाद अब जज साहब साहिल का नाम लेकर उससे पूछते हैं क्या आपको पता है मैं आपके खिलाफ आज सजा सुनाने जा रहा हूं. साहिल हां में जवाब देता है. फिर साहिल से पूछते हैं कि आपको कोई बीमारी तो नहीं. वो ना में जवाब देता है. फिर साहिल से पूछते हैं कि परिवार में कौन कौन है. इसपर वो बताता है कि नानी हैं. जज साहब साहिल से फिर पूछते हैं कि क्या वो पढ़ा लिखा है.
साहिल जवाब देता है वो ग्रैजुएट है. जज साहब अगला सवाल पूछते हैं. वो क्या बनना चाहता था या क्या बनना चाहता है. साहिल जवाब देता है. वो सीए बनना चाहता था और अब भी सीए बनना चाहता है. इसी के साथ जज साहब मुस्कान और साहिल से कहते हैं कि फिलहाल आप दोनों जा सकते हैं. कुछ देर बाद सज़ा सुनाने से पहले आपसे फिर मिलेंगे. इसके साथ ही वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग खत्म हो जाती है और टीवी बंद.
बेशक दोनों पक्षों के वकील साहिल और मुस्कान को देख नहीं पा रहे थे. लेकिन उनकी आवाज़ ज़रूर सुन रहे थे. अब कोर्ट में सज़ा पर बहस शुरु होती है. पहला मौका बचाव पक्ष यानि मुस्कान और साहिल के वकीलों को दिया जाता है. बचाव पक्ष की शुरुआत ही इस बात से होती है कि दोनों की कम उम्र और पहले जुर्म को देखते हुए साथ ही उनके सुधरने की उम्मीदों को ध्यान में रखते हुए उन्हें कम सज़ा दी जाए. यानि सज़ा-ए-मौत की बजाय उम्रक़ैद दी जाए.
बचाव पक्ष के वकीलों की दलील ये भी थी कि पिछले डेढ़ सालों में जब से दोनों जेल में हैं उनका बर्ताव अच्छा है. मुस्कान अपना ज़्यादातर वक़्त पूजा-पाठ में लगाती है. इसके बाद वो सुप्रीम कोर्ट के कई फ़ैसलों का हवाला देते हुए फिर से कोर्ट से ये गुज़ारिश करते हैं कि मुस्कान और साहिल को मौत की सज़ा नहीं बल्कि कम सजा यानि उम्रक़ैद दी जाए.
बचाव पक्ष की दलील ख़त्म होते ही अब सरकारी वकील अपना पक्ष रखते हैं. उनके दलील की शुरुआत ही इस बात से हुई कि मुस्कान और साहिल ने जिस तरह से सौरभ का क़त्ल किया, लाश के टुकड़े किए, टुकड़ों को नीले ड्रम में रखा. ये सब कुछ अचानक किया गया क़त्ल नहीं था बल्कि ये पूरी प्लानिंग और साज़िश के तहत किया गया जुर्म था. सरकारी वकील की दलील ये भी थी कि सिर्फ़ किसी की कम उम्र या उसके पहले अपराध के आधार पर उसकी सज़ा कम नहीं की जानी चाहिए. बल्कि उस जुर्म की क्रूरता को देखी जानी चाहिए.
सरकारी वकील की ये भी दलील थी कि महज़ जेल में किसी के अच्छे बर्ताव या किसी के पूजा-पाठ करने भर से अदालत को उसके साथ रहम नहीं दिखाना चाहिए. इस दौरान सरकारी वकील ने भी सुप्रीम कोर्ट के कई फ़ैसलों का हवाला दिया. अब तक जज साहब सिर्फ़ वकीलों की दलील सुन रहे थे. फिर तभी उन्होंने कहा कि ये सही है कि बाकी चीजों के साथ साथ समाज और जनता की ओपिनियन भी सुनी और देखी जानी चाहिेए. सरकारी वकील ने अपनी बहस इस मांग के साथ खत्म की कि सौरभ मर्डर केस में मुस्कान और साहिल को अधिकतम सज़ा यानि सज़ा-ए-मौत ही मिलनी चाहिए.
कोर्टरूम की घड़ी में तब दोपहर के सवा 12 बज चुके थे. यानि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और सज़ा पर बहस पूरी होने में दो घंटे 5 मिनट लग चुके थे. इसी के साथ जज साहब अपनी कुर्सी से उठते हैं और अपने चैंबर में चले जाते हैं. दोपहर बाद अब फैसले की घड़ी थी.
डिस्ट्रिक्ट जज की कोर्ट के साथ साथ मेरठ की पूरा कोर्ट 14 अक्टूबर को बंद था. वकीलों की हड़ताल की वजह से. सिर्फ़ दो ही चीजों की इस हड़ताल में भी सुनवाई की इजाजत थी. एक केस के फैसले की और दूसरी ज़मानत के मामलों की. लिहाजा बहस पूरी होने के बाद कोर्टरूम खाली हो चुका था. अब कोई दूसरा केस नहीं था.
दोपहर बाद शाम के ठीक 4 बजकर 10 मिनट पर जज साहब कोर्टरूम में दाखिल होते हैं. फैसला सुनने के लिए अब कोर्टरूम खचाखच भर चुका था. एक बार फिर से मेरठ जेल से वीडियो कॉन्फ्रेसिंग के जरिए मुस्कान और साहिल जुड़ चुके थे. कुर्सी पर बैठते ही जज साहब मुस्कुराते हुए मुस्कान और साहिल के वकील से कहते हैं कि आप परेशान क्यों दिख रहे हैं. घबराने की कोई बात नहीं है.
इसके बाद वो महाभारत का एक अंश पढ़ते हैं. फिर कहते हैं कि दंड ही धर्म है. इतना कहते ही उसी मुस्कुराते चेहरे के साथ अब जज साहब उनके सामने रहे मॉनिटर पर मुस्कान और साहिल को देखते हुए सिर्फ़ एक लाइन कहते हैं. आपके किए अपराध के लिए मैं आप दोनों को मृत्युदंड देता हूं. इतना सुनते ही कोर्टरूम के अंदर ही अचानक भारत माता की जय के नारे गूंजने लगते हैं. फिर शोर में ही जज साहब की आगे की कोई भी बातचीत सुनाई नहीं देती.
वो फैसले पर दस्तखत करते हैं और उसके साथ ही कुर्सी से उठ जाते हैं. उन्होंने दस्तखत बॉल पेन से किया था इसीलिए शायद निब तोड़ने की जरूरत भी नहीं पड़ी. जिस वक्त जज साहब ने मुस्कान और साहिल की मौत के फैसले पर दस्तखत किया तब कोर्टरूम की घड़ी में शाम के ठीक चार बजकर 16 मिनट हुए थे.
शम्स ताहिर खान