बांग्लादेशी होने के आरोप में हिरासत, बॉम्बे हाई कोर्ट ने महिला के डिपोर्टेशन पर लगाई रोक

मुंबई में बांग्लादेशी होने के आरोप में हिरासत में ली गई महिला के डिपोर्टेशन पर बॉम्बे हाई कोर्ट ने रोक लगा दी है. इसके साथ ही, बच्चों को पिता को सौंपने का आदेश दिया गया है.

Advertisement
बॉम्बे हाई कोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब (Representative Image/File) बॉम्बे हाई कोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब (Representative Image/File)

विद्या

  • मुंबई,
  • 03 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 11:20 PM IST

महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में बांग्लादेशी होने के आरोप में हिरासत में ली गई एक महिला और उसके तीन नाबालिग बच्चों के मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने अंतरिम राहत दी है. कोर्ट ने राज्य सरकार को फिलहाल महिला को डिपोर्ट नहीं करने का निर्देश दिया है और तीनों बच्चों को उनके पिता के सुपुर्द करने का आदेश दिया है. इसके साथ ही, सरकार से इस कार्रवाई को सही ठहराने के लिए जवाब भी मांगा है.

Advertisement

दरअसल, मुंबई के तिलक नगर पुलिस अधिकारियों ने एक महिला और उसके तीन नाबालिग बच्चों को बांग्लादेशी होने के आरोप में हिरासत में ले लिया था. महिला की सास और पति ने इसके खिलाफ 'हेबियस कॉर्पस' यानी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी. 

इस मामले में सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे उन्हें देश से बाहर न भेजें और बच्चों को उनके पिता को सौंप दें.

अदालत ने क्या कहा?

हाई कोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश में कहा, "महाराष्ट्र सरकार को अपना जवाब दाखिल करके अपनी कार्रवाई को सही ठहराना होगा." इसके साथ ही, कोर्ट ने निर्देश दिया कि बच्चों को उनके पिता को सौंपा जाए और उन्हें अपनी मां से मिलने की अनुमति दी जाए.

जस्टिस सारंग वी. कोटवाल और जस्टिस आशीष चव्हाण की बेंच कांता सुबरल्लू सुब्बय्या और मोहम्मद इमरान रऊफ खान की याचिका पर सुनवाई कर रही थी. ये दोनों सबीना की सास और पति हैं. सबीना को वीजा परमिट की अवधि खत्म होने के बाद भी देश में रहने के आरोप में उसके तीन नाबालिग बच्चों के साथ हिरासत में लिया गया था.

Advertisement

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वकील राज एल. कांबले और पंकज धोत्रे ने बताया कि रऊफ खान ने 2011 में सबीना से शादी की थी और उनके बच्चे भारत में ही पैदा हुए और यहीं पढ़ाई कर रहे हैं. इस बात को साबित करने के लिए सभी जरूरी दस्तावेज भी मौजूद हैं.

यह भी बताया गया कि हिरासत में लिए गए लोगों को कोई नोटिस, कारण बताओ नोटिस, हिरासत का आदेश, देश से निकालने का आदेश या अपनी बात रखने का मौका नहीं दिया गया. प्रक्रिया में मनमानी की ओर इशारा करते हुए वकीलों ने यह भी बताया कि उनका पांच साल का बच्चा डेंगू से पीड़ित था और उसे सायन अस्पताल में भर्ती कराया गया था, फिर भी याचिकाकर्ताओं को बच्चे से मिलने की इजाजत नहीं दी जा रही थी. वकीलों ने गुजारिश करते हुए कहा कि कम से कम मानवीय आधार पर बच्चों के मामले में कुछ रियायत दी जाए. जब ​​तक जांच चल रही है, तब तक बच्चों को कुछ शर्तों के साथ घर वापस भेज दिया जाए."

यह भी पढ़ें: बॉम्बे हाई कोर्ट के पूर्व जज के पूरे परिवार को खत्म करने की सुपारी

अभियोजन पक्ष ने कहा कि न सिर्फ सबीना एक अवैध प्रवासी थी, बल्कि बच्चों को भी अवैध प्रवासी माना गया था.

Advertisement

मामले के तथ्यों को देखने के बाद, बेंच ने अभियोजन पक्ष को अपना जवाब दाखिल करने के लिए वक्त दिया, लेकिन मानवीय आधार पर निर्देश दिया कि जब तक याचिका पर फैसला नहीं हो जाता, तब तक सबीना को निर्वासित न किया जाए और तीनों बच्चों को घर जाने की अनुमति दी जाए, लेकिन वे तिलक नगर पुलिस स्टेशन के अधिकार क्षेत्र से बाहर नहीं जा सकेंगे. बेंच ने यह भी कहा कि बच्चों को समय-समय पर अपनी मां से मिलने के लिए डिटेंशन सेंटर ले जाया जाएगा. कोर्ट इस याचिका पर आगे 21 जुलाई को सुनवाई करेगी.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »