'युवराज रक्षाबंधन पर आया था...' बेटे को याद कर फफक पड़े माता-पिता, सत्य निकेतन हादसे में बुझा इकलौता चिराग

छत्तीसगढ़ के दुर्ग का रहने वाला छात्र युवराज दिल्ली में रहकर पढ़ाई कर रहा था. यहां सत्य निकेतन हादसे में युवराज की जान चली गई. वह परिवार का इकलौता बेटा था. रक्षाबंधन पर घर पहुंचा था और बहन से राखी बंधवाई थी. अब युवराज के पिता के परिजन बेटे को याद कर फफक पड़ते हैं.

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इकलौते बेटे की याद में परिजनों में मातम. (Photo: Screengrab) इकलौते बेटे की याद में परिजनों में मातम. (Photo: Screengrab)

रघुनंदन पंडा

  • दुर्ग,
  • 09 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 3:09 PM IST

कुछ दिन पहले इस घर में रौनक थी. रक्षाबंधन का त्योहार था. घर का इकलौता बेटा दिल्ली से आया था. मां-बाप खुश थे कि बेटा घर आया है. बहन भी खुश थी. उसने भाई की कलाई पर राखी बांधी. भाई ने बहन को प्यार दिया और फिर कुछ दिन बाद अपने सपनों को पूरा करने के लिए वापस दिल्ली चला गया. परिवार को क्या पता था कि जिस बेटे को वे पढ़ाई के लिए दिल्ली विदा कर रहे हैं, वह अगली बार अपने पैरों पर चलकर नहीं, बल्कि उसका पार्थिव शरीर लौटेगा.

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ये कहानी छत्तीसगढ़ के दुर्ग के रहने वाले युवराज सोनी की है. दिल्ली के सत्य निकेतन में हुए इमारत हादसे ने एक परिवार से उसका इकलौता बेटा छीन लिया. जिस बेटे के भविष्य को लेकर माता-पिता ने न जाने कितने सपने देखे थे, वह अब इस दुनिया में नहीं है.

हादसे के दो दिन बाद जब युवराज का पार्थिव शरीर दिल्ली से दुर्ग पहुंचा तो घर के बाहर लोगों की भीड़ थी. लेकिन घर के अंदर एक ऐसा सन्नाटा था, जिसे किसी शब्द में बयान करना मुश्किल था. परिजनों की आंखों में बेटे की यादें थीं. कुछ ही समय पहले युवराज रक्षाबंधन पर घर आया था. वह परिवार से मिला था. अपनी बहन से राखी बंधवाई थी. मां-बाप के साथ समय बिताया था. फिर पढ़ाई के लिए दिल्ली लौट गया.

घरवालों के मुताबिक, युवराज ने बताया था कि उसकी पढ़ाई अच्छी चल रही है. परिवार को भी बेटे पर भरोसा था. वह पढ़ रहा था, आगे बढ़ रहा था और अपने भविष्य को बनाने की कोशिश कर रहा था. लेकिन किसी ने नहीं सोचा था कि घर से उसकी विदाई इतनी जल्दी आखिरी विदाई में बदल जाएगी. अब बहन के सामने सबसे दर्दनाक सवाल यही है कि जिस भाई की कलाई पर उसने राखी बांधी थी, उसे वह दोबारा कभी राखी नहीं बांध पाएगी. रक्षाबंधन पर भाई के आने का इंतजार था. अब उसकी यादें हैं.

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माता-पिता का इकलौता बेटा था युवराज

युवराज सिर्फ एक छात्र नहीं था. वह अपने माता-पिता का इकलौता बेटा था. उसके साथ पूरे परिवार के सपने जुड़े हुए थे. दिल्ली में पढ़ाई करने गया युवराज दिल्ली विश्वविद्यालय के मोतीलाल नेहरू कॉलेज में बी.कॉम का छात्र था. पूर्व महापौर धीरज बाकलीबाल के मुताबिक, युवराज पढ़ाई के साथ आईएएस की तैयारी भी कर रहा था.

दुर्ग से दिल्ली तक का सफर सिर्फ डिग्री लेने का नहीं था. वह अपने भविष्य के लिए निकला था. एक बेहतर जिंदगी के लिए निकला था. माता-पिता ने भी शायद यही सोचा होगा कि बेटा पढ़-लिखकर कुछ बनेगा. घर का नाम रोशन करेगा. लेकिन 6 सितंबर को आई एक खबर ने इन सारे सपनों को एक झटके में तोड़ दिया.

सत्य निकेतन में हादसा और फिर घर में बेचैनी

6 सितंबर को दिल्ली के सत्य निकेतन में एक तीन मंजिला इमारत गिरने की खबर सामने आई. हादसे की खबर जैसे-जैसे फैलने लगी, वैसे-वैसे उन परिवारों की धड़कनें बढ़ने लगीं, जिनके बच्चे उस इलाके में रहकर पढ़ाई कर रहे थे. इन्हीं परिवारों में एक परिवार दुर्ग का भी था. युवराज के परिजनों को जैसे ही हादसे की जानकारी मिली, वे बेचैन हो गए. उन्हें उम्मीद थी. डर भी था. और फिर वह खबर आई, जिसने पूरे परिवार को तोड़ दिया. हादसे में युवराज की मौत हो गई थी.

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जिस बेटे से कुछ समय पहले पढ़ाई और भविष्य की बातें हुई थीं, वह अब कभी फोन नहीं करेगा. कभी घर नहीं आएगा. कभी मां-बाप से नहीं कहेगा कि पढ़ाई ठीक चल रही है. हादसे के बाद दो दिन का इंतजार. फिर दिल्ली से शव वाहन दुर्ग पहुंचा. जिस गाड़ी का परिवार शायद कभी इंतजार नहीं करना चाहता था, आज वही गाड़ी उनके घर के सामने आकर रुकी. युवराज का पार्थिव शरीर बाहर निकाला गया. और इसके साथ ही परिवार का सब्र टूट गया.

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माता-पिता अपने बेटे के शव को पकड़कर रोते रहे. जिस बेटे को उन्होंने बचपन से बड़ा होते देखा था, आज वह उनके सामने खामोश था. मां बिलख रही थी. पिता बदहवास थे. और बहन... वह अपने भाई को देखकर लगातार रो रही थी. वह भाई, जो कुछ दिन पहले उसके सामने बैठा था. जिसकी कलाई पर उसने राखी बांधी थी.

घर के बाहर भीड़, भीतर टूट चुका था परिवार

युवराज के पार्थिव शरीर के दुर्ग पहुंचने की खबर फैलते ही बड़ी संख्या में स्थानीय लोग, परिचित और रिश्तेदार उसके घर पहुंचने लगे. लोग परिवार को ढांढस बंधाने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन कुछ दर्द ऐसे होते हैं, जिनके सामने शब्द छोटे पड़ जाते हैं. एक मां के सामने उसका बेटा था. एक पिता के सामने उसका इकलौता चिराग बुझ चुका था. और एक बहन के सामने उसका भाई हमेशा के लिए खामोश था.

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पूर्व महापौर धीरज बाकलीबाल ने भी युवराज की मौत को बेहद दुखद बताया. उन्होंने कहा कि युवराज हजारों सपने लेकर दिल्ली पढ़ने गया था और उसके माता-पिता ने भी उसके भविष्य को लेकर कई सपने देखे थे. लेकिन एक हादसे ने सब कुछ बदल दिया.

बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी में युवराज का अंतिम संस्कार किया गया. लोगों ने नम आंखों से उसे अंतिम विदाई दी. दुर्ग ने एक युवा छात्र को खो दिया. एक परिवार ने अपना इकलौता बेटा. और एक बहन ने अपना भाई. युवराज दिल्ली पढ़ने गया था. उसके पास सपने थे. उसके माता-पिता के पास उम्मीदें थीं. घर से विदा होते वक्त शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि अगली बार उसे इस तरह वापस आना पड़ेगा.

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