क्या बीजेपी का यूपी में दरक रहा लोध वोटबैंक? साक्षी महाराज के छलके दर्द के मायने

उन्नाव से बीजेपी सांसद साक्षी महाराज ने अपनी ही सरकार और संगठन में लोधी समाज की उपेक्षा का आरोप लगाकर सियासी हलचल बढ़ा दी है. उन्होंने पूर्व सीएम कल्याण सिंह का जिक्र करते हुए चेतावनी दी है कि लोधी समाज को उचित प्रतिनिधित्व न मिलने से 2027 के चुनाव में पार्टी को नुकसान हो सकता है.

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बीजेपी के फायरब्रांड नेता साक्षी महाराज (Photo-ITG) बीजेपी के फायरब्रांड नेता साक्षी महाराज (Photo-ITG)

कुमार अभिषेक

  • लखनऊ,
  • 09 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 3:26 PM IST

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है और बीजेपी की टेंशन कम होने का नाम नहीं ले रही है. राज्यसभा चुनाव में प्रत्याशी न बनाए जाने से मोहनलालगंज के पूर्व सांसद कौशल किशोर की नाराजगी और आंवला से दो बार के सांसद रहे धर्मेंद्र कश्यप के बीजेपी को टाटा-बाय-बाय बोलने के बाद अब पार्टी के फायरब्रांड नेता और उन्नाव से सांसद स्वामी साक्षी महाराज के बयान ने पार्टी की सियासी टेंशन और बढ़ा दी है.

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उन्नाव में स्थानीय मीडिया से बातचीत करते हुए साक्षी महाराज ने अपनी ही पार्टी के संगठन और सरकार में लोधी समाज की उपेक्षा का गंभीर आरोप लगाया है. उन्होंने साफ लहजे में कहा कि जिस लोधी समाज ने बीजेपी को खड़ा किया और जिसका वोट चट्टान की तरह पार्टी के साथ खड़ा रहा, उसी समाज को संगठन से लेकर सरकार तक में उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा है.

साक्षी महाराज ने उत्तर प्रदेश में बीजेपी की नींव रखने वाले पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय कल्याण सिंह का जिक्र करते हुए पार्टी नेतृत्व को आड़े हाथों लिया. उन्होंने कहा कि जिस कल्याण सिंह की बदौलत बीजेपी आज उत्तर प्रदेश में सत्ता में है, उन्हीं की बिरादरी को न तो संगठन में और न ही सरकार में तवज्जो दी जा रही है. ऐसे में बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या बीजेपी का पारंपरिक लोधी वोटबैंक छिटक रहा है और पार्टी 2027 में सपा के 'PDA' फॉर्मूले का काउंटर कैसे करेगी?

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'कल्याण सिंह की वजह से बना राम मंदिर'

साक्षी महाराज ने पूर्व सीएम कल्याण सिंह और उमा भारती के दौर को याद करते हुए कहा, "एक समय था जब बीजेपी में लोधी समाज के दो बड़े चेहरे उमा भारती और कल्याण सिंह हुआ करते थे. पार्टी का शीर्ष नेतृत्व हमेशा इन दोनों नेताओं को साथ लेकर चलता था. केंद्र सरकार में दो-दो मंत्री और देश में दो-दो राज्यपाल हुआ करते थे, लेकिन अब तो केंद्र से लेकर संगठन तक केवल नाममात्र के मंत्री हैं. लोधी समाज की ताकत बीजेपी को दिखाई नहीं दे रही है."

साक्षी महाराज ने आगे कहा, "यूपी में कल्याण सिंह की बदौलत ही बीजेपी पनपी और सरकार बनाने में सफल रही. अगर कल्याण सिंह ने सरकार न बनाई होती और अपने मुख्यमंत्री रहते बाबरी मस्जिद न गिरने दी होती, तो आज बीजेपी का कोई नाम लेवा नहीं होता. कल्याण सिंह के उस कदम की वजह से ही आज भव्य राम मंदिर का निर्माण संभव हुआ है. अगर यह दोनों घटनाएं न हुई होतीं, तो उत्तर प्रदेश में बीजेपी कहीं नहीं होती."

योगी और केंद्रीय नेतृत्व के सामने उठा चुके हैं मुद्दा

साक्षी महाराज ने अपील करते हुए कहा कि वे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष से लोधी समाज की ओर ध्यान देने का आग्रह करते हैं. यह वही समाज है जिसने पार्टी के सबसे बुरे दौर में भी बीजेपी का हाथ नहीं छोड़ा और चट्टान की तरह हमेशा साथ खड़ा रहा. इसलिए लोधी समाज को उचित प्रतिनिधित्व मिलना ही चाहिए.

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उन्होंने यह भी खुलासा किया कि वे हर मंच पर अपनी बात रख चुके हैं. दो बार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने लोधी समाज की उपेक्षा का मुद्दा उठा चुके हैं और केंद्रीय नेतृत्व को भी अपनी बात से अवगत करा चुके हैं. सांसद ने चेतावनी भरे अंदाज में कहा कि अगर बीजेपी को आगामी चुनाव जीतना है, तो लोधी समाज को संगठन और सरकार में उचित जगह देनी होगी.

साक्षी महाराज क्या खुद चाहते हैं कोई पद?

खुद के मंत्री या मुख्यमंत्री पद की रेस में होने के सवाल पर साक्षी महाराज ने कहा, "मैं तो संत और सनातनी हूं. मुझे कभी मुख्यमंत्री या किसी मंत्री पद की लालसा नहीं रही. मैं तो एक 'एक्सीडेंटल राजनेता' हूं. मुझे सवर्ण और सर्वसमाज सभी ने अपना नेता माना और समर्थन दिया है. लेकिन मैं फिलहाल अपने लोधी समाज की बात इसलिए करता हूं क्योंकि मैं इसी बिरादरी से आता हूं."

लोधी समुदाय के हक और अधिकार की बात कहकर साक्षी महाराज ने बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. यूपी में 4 से 5 फीसदी के करीब लोधी वोटर हैं, जो बीजेपी का हार्डकोर वोटबैंक माना जाता रहा है. 2024 के लोकसभा चुनाव में यूपी की कई सीटों पर लोधी वोटर बीजेपी से छिटक कर सपा की तरफ गया है, जिसके चलते पार्टी को हमीरपुर और एटा जैसी परंपरागत सीटों पर हार का सामना करना पड़ा था.

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राजू भैया को राज्यसभा न मिलने से पनपा असंतोष?

दरअसल, साक्षी महाराज के आक्रामक तेवर के पीछे बीजेपी के अंदरूनी शक्ति संतुलन को वजह माना जा रहा है. हाल ही में कल्याण सिंह के बेटे राजवीर सिंह उर्फ 'राजू भैया' का नाम राज्यसभा उम्मीदवार के तौर पर बेहद चर्चा में था. हालांकि, बीएल वर्मा और राजू भैया के बीच की आपसी खींचतान के कारण राज्यसभा की सीट पार्टी के दूसरे लोधी नेता धर्मपाल सिंह के खाते में चली गई, जो आंवला सीट से पांच बार के विधायक और योगी सरकार में मंत्री हैं.

साक्षी महाराज को कल्याण सिंह के बेटे राजू भैया का बेहद करीबी माना जाता है. माना जा रहा है कि राजू भैया को बीजेपी से राज्यसभा न भेजे जाने की वजह से ही साक्षी महाराज का यह गुस्सा सार्वजनिक रूप से फूटा है. हालांकि बीएल वर्मा केंद्र में मंत्री हैं, लेकिन इस बार उन्हें राज्यसभा नहीं भेजा गया, क्योंकि राजू भैया से उनकी पुरानी सियासी अदावत रही है.

विपक्ष के 'वोट चोरी' पर मोदी सरकार का बचाव

अपनी ही पार्टी पर सवाल उठाने के बावजूद साक्षी महाराज ने मोदी सरकार की जमकर तारीफ की. मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज की सराहना करते हुए उन्होंने विपक्ष के 'वोट चोरी' के आरोपों को खारिज कर दिया.

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साक्षी महाराज ने कहा, "ज्ञानेश कुमार ने महान काम किया है. अगर बीजेपी ने वोट चोरी की होती, तो उत्तर प्रदेश में बीजेपी की 33 सीटें और समाजवादी पार्टी की 37 सीटें नहीं आतीं. अगर ऐसा होता तो सभी 80 की 80 सीटें बीजेपी ही जीत लेती."

साक्षी महाराज के बहाने अखिलेश की नजर 

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव लगातार लोधी समाज को साधने की कोशिशों में जुटे हुए हैं. वे कई मौकों पर यह कह चुके हैं कि जब वे चाहेंगे, साक्षी महाराज को समाजवादी पार्टी में शामिल करा लेंगे. साक्षी महाराज का अतीत भी समाजवादी पार्टी से जुड़ा रहा है, जब सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने उन्हें फर्रुखाबाद से सांसद बनवाया था. ऐसे में साक्षी महाराज के इन बगावती सुरों के बाद सियासी गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या वे एक बार फिर किसी नए राजनीतिक रास्ते की तलाश में हैं.

65 सीटों पर प्रभाव और सपा का भावी प्लान

उत्तर प्रदेश की कुल आबादी में लोधी समुदाय की हिस्सेदारी लगभग 4 से 5 प्रतिशत है, जो यादव और कुर्मी समाज के बाद ओबीसी वर्ग में तीसरे नंबर पर आती है. हालांकि, अवध, रुहेलखंड, बुंदेलखंड, ब्रज और पश्चिमी यूपी के करीब 23 जिलों में इनका प्रभाव काफी अधिक है. राज्य की 65 से अधिक विधानसभा सीटों पर लोधी मतदाता हार-जीत तय करने की क्षमता रखते हैं.

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यूपी के रामपुर, बुलंदशहर, अलीगढ़, एटा, आगरा, फिरोजाबाद, मैनपुरी, पीलीभीत, लखीमपुर, उन्नाव, शाहजहांपुर, हरदोई, फर्रुखाबाद, इटावा, औरैया, कन्नौज, कानपुर, जालौन, झांसी, ललितपुर, हमीरपुर और महोबा ऐसे जिले हैं जहां लोधी मतदाताओं की आबादी 10 प्रतिशत तक है. वर्तमान में राज्य में विभिन्न दलों को मिलाकर लोधी समाज के लगभग 15 विधायक हैं.

ब्रज और बुंदेलखंड क्षेत्र में लोधी मतदाताओं के मजबूत समर्थन के कारण बीजेपी लगातार बढ़त बनाए रखती रही है, लेकिन अब सपा इस आधार को चुनौती दे रही है. 2027 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए सपा अपने 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) अभियान को और व्यापक बना रही है. 2024 के लोकसभा चुनाव में कुर्मी और पासी समाज के समर्थन से सफलता हासिल करने के बाद सपा अब लोधी समाज को भी अपने साथ जोड़ने की कोशिश में है.

सपा न केवल सांस्कृतिक ऐलानों के जरिए संदेश दे रही है, बल्कि 2027 के चुनाव के लिए संभावित लोधी उम्मीदवारों की प्रोफाइल भी तैयार कर रही है. ऐसे में साक्षी महाराज का यह बयान बीजेपी के लिए सियासी टेंशन बढ़ाने वाला साबित हो सकता है.

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