हरदोई उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में स्थित एक जिला स्तरीय नगर है, जहां नगर पालिका बोर्ड है. यह नगर आसपास के क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक, वाणिज्यिक और शैक्षणिक केंद्र के रूप में काम करता है. इसका इतिहास काफी पुराना है और स्थानीय परंपरा में इसे प्रह्लाद नगरी के नाम से भी जाना जाता है. इन परंपराओं के अनुसार, राक्षस राजा हिरण्यकशिपु ने
कभी इस क्षेत्र पर शासन किया था और यह क्षेत्र होलिका दहन की घटना से जुड़ा माना जाता है, जिसे होली की पूर्व संध्या पर मनाया जाता है.
1951 के परिसीमन आदेश के तहत स्थापित हरदोई एक सामान्य और गैर-आरक्षित विधानसभा क्षेत्र है तथा हरदोई लोकसभा सीट के पांच विधानसभा क्षेत्रों में से एक है. 2008 के परिसीमन में इसकी सीमाओं का फिर से निर्धारण किया गया और अब इसमें पूरा हरदोई नगर पालिका बोर्ड तथा हरदोई तहसील के अंतर्गत आने वाले हरदोई, बावन और शहर दक्षिण के कानूनगो सर्किल शामिल हैं. इस विधानसभा क्षेत्र की आबादी का स्वरूप मिश्रित है, जिसमें ग्रामीण मतदाताओं की संख्या अब भी नगर में रहने वाले मतदाताओं से अधिक है.
हरदोई में अब तक 19 विधानसभा चुनाव हो चुके हैं, जिनमें 2008 में हुआ उपचुनाव भी शामिल है. 1952 और 1957 में हुए पहले दो चुनावों में यह दो विधायकों वाला विधानसभा क्षेत्र था. कांग्रेस पार्टी ने कई दशकों तक इस क्षेत्र में अपना प्रभाव बनाए रखा और 1952 से 1996 के बीच 11 चुनाव जीते. वर्ष 1967 और 1989 में निर्दलीय उम्मीदवारों ने कांग्रेस की जीत का सिलसिला तोड़ा. समाजवादी पार्टी ने यह सीट चार बार जीती है, जबकि भाजपा और बहुजन समाज पार्टी ने एक-एक बार जीत दर्ज की है. निर्दलीय उम्मीदवारों ने दो बार यह सीट जीती है.
व्यक्तिगत उम्मीदवारों में नरेश चंद्र अग्रवाल सबसे सफल रहे हैं. उन्होंने यह सीट सात बार जीती, जिनमें लगातार छह जीत भी शामिल हैं. उन्होंने कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में चार कार्यकाल, समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार के रूप में दो कार्यकाल और एक बार निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीत दर्ज की. कांग्रेस पार्टी के साथ लंबे समय तक जुड़े रहने के बाद अग्रवाल समाजवादी पार्टी में शामिल हुए और 2002 तथा 2007 में इसी पार्टी के टिकट पर सीट जीती. उनके बेटे नितिन अग्रवाल ने परिवार की चुनावी परंपरा को आगे बढ़ाया और पिछले चार चुनाव जीते, जिनमें दो बार समाजवादी पार्टी, एक बार बहुजन समाज पार्टी और एक बार भाजपा के उम्मीदवार के रूप में जीत शामिल है. 1989 के बाद लगातार 11 चुनाव जीतने के साथ अग्रवाल परिवार हरदोई में लगातार अजेय रहा है.
नितिन अग्रवाल ने 2008 के उपचुनाव से चुनावी राजनीति में कदम रखा. यह उपचुनाव उनके पिता और उस समय के समाजवादी पार्टी विधायक के बहुजन समाज पार्टी में जाने के कारण जरूरी हुआ था. नितिन अग्रवाल ने बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार के रूप में समाजवादी पार्टी के सुख सागर मिश्रा को 48,000 से अधिक मतों के अंतर से हराया. दिसंबर 2011 में बहुजन समाज पार्टी द्वारा नितिन अग्रवाल को हरदोई विधानसभा क्षेत्र से टिकट नहीं दिए जाने के बाद नितिन अग्रवाल और उनके पिता समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए. उन्होंने 2012 में समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीता और भाजपा के राजा बक्स सिंह को 43,682 मतों से हराया.
2017 में मुकाबला काफी करीबी रहा और नितिन अग्रवाल ने भाजपा के राजा बक्स सिंह को केवल 5,109 मतों के अंतर से हराया. इसके बाद मार्च 2018 में अग्रवाल परिवार भाजपा में शामिल हो गया. इस बदलाव के बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने हरदोई में अपना खाता खोला. नितिन अग्रवाल ने 126,750 मत हासिल किए, जबकि उनके समाजवादी पार्टी के प्रतिद्वंद्वी अनिल वर्मा को 84,339 मत मिले. इस तरह भाजपा ने 42,411 मतों के अंतर से जीत दर्ज की.
लोकसभा चुनावों के दौरान हरदोई विधानसभा क्षेत्र में मतदान का रुझान भी समय के साथ काफी बदला है. वर्ष 2009 में समाजवादी पार्टी ने बहुजन समाज पार्टी पर 24,723 मतों की बढ़त हासिल की थी. 2014 में यह बढ़त घटकर 6,214 मत रह गई, जबकि भाजपा ने बहुजन समाज पार्टी की जगह मुख्य प्रतिद्वंद्वी का स्थान ले लिया. वर्ष 2019 में भाजपा समाजवादी पार्टी से 47,061 मतों की बढ़त बनाने में सफल रही. 2024 में भी भाजपा ने अपनी बढ़त बरकरार रखी, हालांकि अंतर कम रहा. भाजपा के उम्मीदवार जय प्रकाश रावत को 111,932 मत मिले, जबकि समाजवादी पार्टी की उम्मीदवार उषा वर्मा को 87,864 मत प्राप्त हुए. इस तरह इस विधानसभा क्षेत्र में भाजपा को 24,068 मतों की बढ़त मिली.
हरदोई में पिछले वर्षों के दौरान मतदाताओं की संख्या में काफी वृद्धि हुई है. पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 2012 में 340,302 से बढ़कर 2017 में 393,551, 2019 में 405,215, 2022 में 414,642 और 2024 में 424,319 हो गई. मतदाता भागीदारी अपेक्षाकृत कम रही है, हालांकि मतदान प्रतिशत में उतार-चढ़ाव देखा गया है. 2012 में मतदान प्रतिशत 59.24 रहा और 2017 में मामूली गिरावट के साथ 58.54 प्रतिशत हो गया. 2019 के लोकसभा चुनाव में यह और घटकर 55.20 प्रतिशत रहा. 2022 के विधानसभा चुनाव में मतदान प्रतिशत बढ़कर 57.59 हो गया. 2024 के लोकसभा चुनाव में मतदान प्रतिशत फिर घटकर 53.92 रहा.
हरदोई एक हिंदू बहुल विधानसभा क्षेत्र है, जहां अनुसूचित जाति की आबादी भी महत्वपूर्ण है. अनुसूचित जाति के मतदाताओं की हिस्सेदारी 33.19 प्रतिशत है, जबकि मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी लगभग 10.30 प्रतिशत है. अन्य सामाजिक समूहों में यादव, कुर्मी, लोध और अन्य पिछड़ा वर्ग समुदायों के साथ ब्राह्मण, ठाकुर, वैश्य और अन्य सवर्ण समूह शामिल हैं. इस विधानसभा क्षेत्र का स्वरूप ग्रामीण और शहरी दोनों तरह का है. यहां की 63.63 प्रतिशत आबादी गांवों में और 36.37 प्रतिशत आबादी शहरी क्षेत्रों में रहती है.
यह विधानसभा क्षेत्र मध्य उत्तर प्रदेश के उपजाऊ जलोढ़ मैदानों में स्थित है. ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कृषि की मुख्य भूमिका है. आसपास के क्षेत्र में गेहूं, धान, गन्ना, दलहन और तिलहन प्रमुख फसलों में शामिल हैं. हरदोई नगर अपने कृषि आधारित आसपास के क्षेत्र के लिए व्यापार और सेवा केंद्र के रूप में काम करता है. छोटे उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण, चावल और आटा मिलें तथा अन्य स्थानीय कारोबार भी शहरी अर्थव्यवस्था में योगदान देते हैं. शैक्षणिक संस्थानों, सरकारी कार्यालयों, बाजारों और स्वास्थ्य सुविधाओं की मौजूदगी से जिला मुख्यालय का महत्व इसके तत्काल शहरी क्षेत्र से आगे तक बना हुआ है.
हरदोई सड़क और रेल मार्ग से क्षेत्र के प्रमुख कस्बों और शहरों से जुड़ा हुआ है. यह शाहाबाद से लगभग 42 किलोमीटर, सीतापुर से 65 किलोमीटर, सवायजपुर से 78 किलोमीटर, लखनऊ से 90 किलोमीटर, कानपुर से 135 किलोमीटर, अयोध्या से 160 किलोमीटर और वाराणसी से लगभग 300 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. हरदोई रेलवे स्टेशन लखनऊ-मुरादाबाद रेल मार्ग पर एक महत्वपूर्ण रेलवे स्टेशन है. यहां से लखनऊ, शाहजहांपुर, बरेली, मुरादाबाद और उत्तर भारत के अन्य हिस्सों के लिए रेल संपर्क उपलब्ध है.
स्थानीय परंपरा के अनुसार हरदोई नाम बाद में विकसित हुए हरि-द्रोही शब्द से जुड़ा है, जिसका अर्थ हरि या विष्णु का शत्रु माना जाता है. यह मान्यता इस क्षेत्र को राक्षस राजा हिरण्यकशिपु से जोड़ती है. इन कथाओं में इस क्षेत्र को उस स्थान के रूप में बताया जाता है जहां होलिका बालक प्रह्लाद को लेकर अग्नि में बैठी थी. यह घटना होलिका दहन और होली के त्योहार से जुड़ी हुई है. इसी वजह से स्थानीय परंपरा में इस नगर को प्रह्लाद नगरी भी कहा जाता है. ऐतिहासिक रूप से हरदोई एक प्रशासनिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ. 19वीं सदी के मध्य में ब्रिटिश प्रशासन द्वारा सिविल स्टेशन स्थापित किए जाने के बाद पुराने बसे हुए क्षेत्र के साथ एक नया हिस्सा भी विकसित हुआ. इसके बाद से यह उस जिले का मुख्यालय बना हुआ है, जिसका नाम भी हरदोई है.
हरदोई का चुनावी परिदृश्य लंबे समय के रिकॉर्ड और हाल के रुझानों के बीच एक अलग तस्वीर प्रस्तुत करता है. समाजवादी पार्टी ने पिछले सात प्रमुख चुनावों में विधानसभा की दो जीत और लोकसभा के दो चुनावों में बढ़त हासिल की है, जबकि भाजपा ने एक विधानसभा जीत और दो लोकसभा चुनावों में बढ़त दर्ज की है. हालांकि केवल आंकड़े भाजपा के हाल के प्रभाव को पूरी तरह नहीं दिखाते हैं. 2019 के बाद से भाजपा ने लोकसभा और विधानसभा चुनावों में बड़ी बढ़त बनाए रखी है. 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की बढ़त कम हुई, लेकिन फिर भी वह पर्याप्त रही. समाजवादी पार्टी के लिए कम होता अंतर एक सकारात्मक संकेत माना जा सकता है. हालांकि उसे भाजपा की हाल की चुनावी बढ़त को खत्म करने के साथ अग्रवाल परिवार की राजनीतिक विरासत के प्रभाव का भी सामना करना होगा. हरदोई में बदलते राजनीतिक समर्थन और हाल के वर्षों में भाजपा के पक्ष में बने चुनावी रुझान को देखते हुए 2027 का विधानसभा चुनाव यह तय करने वाला हो सकता है कि भाजपा अपनी हाल की बढ़त बनाए रखती है या समाजवादी पार्टी एक बार फिर इस विधानसभा क्षेत्र को कड़ी चुनावी प्रतिस्पर्धा में बदलने में सफल होती है.
(अजय झा)