यूपी के वो 5 जिले जो कांग्रेस-सपा के बीच बने 'कुरुक्षेत्र'... कौन देगा 'कुर्बानी'?

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर 'इंडिया गठबंधन' में तकरार बढ़ गई है. सहारनपुर, रायबरेली, अमेठी, बाराबंकी और सीतापुर जैसे प्रमुख जिलों की सीटों पर सपा और कांग्रेस के बीच फंसा पेंच गठबंधन के लिए सबसे बड़ा कुरुक्षेत्र बन गया है. देखना होगा है कि कौन कुर्बानी देगा?

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राहुल गांधी और अखिलेश यादव की दोस्ती कितने दिन रहेगी (Photo-ITG) राहुल गांधी और अखिलेश यादव की दोस्ती कितने दिन रहेगी (Photo-ITG)

कुबूल अहमद / आशीष श्रीवास्तव

  • नई दिल्ली/लखनऊ,
  • 28 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 2:54 PM IST

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सपा और कांग्रेस के भीतर सीट शेयरिंग को लेकर गहमागहमी तेज हो गई है. कहने को दोनों दल बीजेपी को हराने के लिए एक साथ हैं, लेकिन सीटों के बंटवारे को लेकर जुबानी जंग जारी है. कांग्रेस सूबे की 150 सीटों को चिह्नित करके चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है, तो वहीं सपा सीट के साथ में कैंडिडेट के नाम कांग्रेस से मांग रही है.

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सपा को लेकर कांग्रेस में सबसे ज्यादा मुखर सहारनपुर से लोकसभा सांसद इमरान मसूद हैं, जो लगातार हमलावर हैं और सीट बंटवारा जल्द से जल्द करने की बात कर रहे हैं. साथ ही वे कह रहे हैं कि अगर सीट शेयरिंग समय पर नहीं हुई, तो 2027 का चुनाव फिर नहीं जीत पाएंगे.

इमरान मसूद की बातों से लगता है कि सपा और कांग्रेस में सीट शेयरिंग का मामला सिर्फ सहारनपुर जिले में फंसा है, लेकिन यह स्थिति केवल एक जिले की नहीं, बल्कि यूपी के चार से पांच जिलों में बनी हुई है.

सपा-कांग्रेस गठबंधन में कहां फंसा पेच

उत्तर प्रदेश में सपा और कांग्रेस के बीच मामला केवल सीटों की संख्या का नहीं, बल्कि सीटों के चयन (सेलेक्शन) को लेकर है. कांग्रेस मुस्लिम बहुल सीटें चाहती है, जबकि सपा उसे मुस्लिम बहुल सीटें देने के मूड में नहीं है. इसके अलावा, कांग्रेस जिन क्षेत्रों से लोकसभा चुनाव जीती है, उन इलाकों की ज्यादा से ज्यादा विधानसभा सीटें अपने पास रखना चाहती है. सहारनपुर से इमरान मसूद सांसद हैं, जिन्होंने अपने जिले की सीटों के लिए पूरी ताकत लगा रखी है.

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सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस यूपी में 105 से 115 सीटों की मांग कर रही है. इन सीटों को कांग्रेस ने चिह्नित भी कर लिया है. वहीं, समाजवादी पार्टी कांग्रेस को 85 से 90 सीटें देने के मूड में है, लेकिन सीटों की संख्या और चयन को लेकर दोनों दलों के बीच सहमति बनना बड़ी चुनौती बना हुआ है.

सहारनपुर के साथ गांधी परिवार का गढ़ माने जाने वाले रायबरेली और अमेठी क्षेत्र की विधानसभा सीटें भी सपा और कांग्रेस के बीच सीट शेयरिंग की सबसे बड़ी परीक्षा बनती दिख रही हैं. इसके अलावा बाराबंकी और सीतापुर में भी सीट बंटवारे को लेकर खींचतान जारी है. ये वे जिले हैं, जहां से कांग्रेस के सांसद 2024 में जीतने में कामयाब रहे, लेकिन विधानसभा क्षेत्रों में सपा का दबदबा है. यही वजह है कि सपा अपनी सीटें नहीं छोड़ना चाहती है.

सहारनपुर में इमरान की डिमांड होगी पूरी?

पश्चिम उत्तर प्रदेश का सहारनपुर इलाका मुस्लिम और दलित आबादी के प्रभाव वाला माना जाता है. लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस सांसद इमरान मसूद सहारनपुर में नए सिरे से अपना वर्चस्व जमाना चाहते हैं. सहारनपुर जिले की 7 विधानसभा सीटों में से इमरान मसूद की मांग 5 सीटों की है, जिनमें से दो सीटों पर वर्तमान में सपा के विधायक हैं. ऐसे में इमरान मसूद सहारनपुर मंडल की ज्यादा से ज्यादा सीटें कांग्रेस के खाते में चाहते हैं.

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सहारनपुर देहात से आशु मलिक विधायक हैं, तो बेहट से उमर खान विधायक हैं. इमरान मसूद इन दोनों सीटों के साथ-साथ शहरी सीट पर भी दावेदारी कर रहे हैं. सपा किसी भी सूरत में अपनी जीती हुई सीटें नहीं छोड़ना चाहती है. सपा का पारंपरिक रूप से इन जिलों में मजबूत आधार रहा है. सपा सहारनपुर में कांग्रेस के लिए वही सीटें छोड़ रही है, जहां पर बीजेपी के विधायक हैं.

रायबरेली-अमेठी में असल अग्निपरीक्षा

सपा और कांग्रेस के बीच सीट शेयरिंग का मामला सिर्फ सहारनपुर जिले तक सीमित नहीं है, बल्कि गांधी परिवार का गढ़ माने जाने वाले रायबरेली और अमेठी जिले में भी फंसा हुआ है. सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने रायबरेली से 'पीडीए रथ' की शुरुआत की थी और यह जिला सपा-कांग्रेस सीट शेयरिंग का बड़ा सियासी केंद्र बनता दिख रहा है. रायबरेली और अमेठी जिले की सीटों को लेकर भी दोनों दलों के बीच खींचतान चल रही है.

रायबरेली जिले में 6 और अमेठी जिले में 4 विधानसभा सीटें हैं. रायबरेली में सपा के चार विधायक थे, जिनमें से एक मनोज पांडेय बीजेपी के पाले में चले गए हैं. अमेठी जिले में सपा के दो विधायक थे, जिनमें से दोनों ने अपना सियासी पाला बदल लिया है. सपा रायबरेली में ऊंचाहार, हरचंदपुर और सरेनी सीट नहीं छोड़ना चाहती, और उसी तरह अमेठी में गौरीगंज व अमेठी के साथ तिलोई सीट भी अपने पास रखना चाहती है.

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सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस रायबरेली और अमेठी को अपना मजबूत गढ़ मानते हुए इन सीटों को सपा को देने के पक्ष में नहीं है. इसी सियासी संदेश के तहत समाजवादी पार्टी ने 'पीडीए रथ' के जरिए रायबरेली में अपनी ताकत का प्रदर्शन किया था. कांग्रेस रायबरेली में तीन से चार सीटें चाहती है, वहीं अमेठी में जिन सीटों पर सपा का दावा है, उन्हें भी अपने कोटे में लेना चाहती है.

बाराबंकी और सीतापुर में उलझा गेम

बाराबंकी और सीतापुर, दोनों ही संसदीय क्षेत्रों पर कांग्रेस का कब्जा है. बाराबंकी जिले की सभी 6 विधानसभा सीटों पर समाजवादी पार्टी ने अपनी मजबूती दिखाते हुए तैयारी शुरू कर दी है और पार्टी नेताओं का दावा है कि वे सभी सीटों पर जीत दर्ज करने का दम भर रहे हैं. वहीं, कांग्रेस बाराबंकी जिले में तीन सीटें हर हाल में चाहती है. पार्टी सांसद तनुज पुनिया किसी भी सूरत में अपने जिले की सीटों पर समझौता करने के मूड में नहीं हैं.

सीतापुर लोकसभा क्षेत्र से राकेश राठौर कांग्रेस के सांसद हैं. उन्होंने काफी पहले ही अपने जिले की विधानसभा सीटों पर कांग्रेस के सम्भावित उम्मीदवारों के नामों का ऐलान भी कर दिया है. सीतापुर जिले में 9 विधानसभा सीटें हैं और कांग्रेस की रणनीति चार से पांच सीटें लेने की है. इसके विपरीत सपा केवल एक से दो सीटें देने का मन बना रही है. इसके चलते सीट शेयरिंग का मामला सुलझ नहीं पा रहा है.

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निष्कर्षतः, यूपी के पांच प्रमुख जिलों में आकर कांग्रेस और सपा की बात पूरी तरह अटक गई है. इन जिलों की विशिष्ट सीटों पर सपा और कांग्रेस, दोनों का अपना-अपना सियासी गणित और मजबूत दावेदारी है, जिससे मामला पूरी तरह 'शह-मात' के खेल में बदल चुका है.

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