तिलोई उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले में स्थित एक कस्बा और तहसील मुख्यालय है. यह मोहनगंज के पास जायस-इन्हौना मार्ग पर स्थित है और आसपास के बड़ी संख्या में गांवों के लिए प्रमुख प्रशासनिक और व्यावसायिक केंद्र के रूप में काम करता है. ऐतिहासिक रूप से भी तिलोई एक महत्वपूर्ण स्थानीय बाजार और प्रशासनिक केंद्र रहा है. आज भी यह भूमिका बनी हुई है, जबकि आसपास
का क्षेत्र मुख्य रूप से ग्रामीण है और स्थानीय अर्थव्यवस्था में कृषि की प्रमुख भूमिका है.
1967 के विधानसभा चुनाव से पहले अस्तित्व में आई तिलोई एक सामान्य, अनारक्षित विधानसभा सीट है और अमेठी लोकसभा सीट के पांच विधानसभा क्षेत्रों में से एक है. 2008 के परिसीमन के दौरान इसकी सीमाओं में बदलाव किया गया था. वर्तमान विधानसभा क्षेत्र में पूरी तिलोई तहसील के साथ सिंहपुर और बहादुरपुर विकास खंडों के कुछ क्षेत्र शामिल हैं. यहां करीब 94.67 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है, जबकि केवल 5.33 प्रतिशत आबादी शहरी क्षेत्रों में रहती है. इससे इस विधानसभा क्षेत्र के मुख्य रूप से ग्रामीण स्वरूप का पता चलता है.
तिलोई में इसके गठन के बाद से अब तक 15 विधानसभा चुनाव हो चुके हैं. शुरुआती दशकों में यहां कांग्रेस का दबदबा रहा, लेकिन बाद में कांग्रेस के कमजोर होने के साथ भाजपा का प्रभाव बढ़ा. कांग्रेस ने आठ चुनाव जीते हैं, जिनमें 1974 से 1991 के बीच लगातार छह जीत शामिल हैं. भाजपा ने पांच चुनाव जीते हैं. इनमें 1969 की वह जीत भी शामिल है, जब भाजपा के पूर्व संगठन भारतीय जनसंघ ने चुनाव जीता था. समाजवादी पार्टी ने बाकी दो चुनावों में जीत दर्ज की.
तिलोई के चुनावों की एक प्रमुख विशेषता यहां के नेताओं का एक पार्टी से दूसरी पार्टी में जाना और फिर भी मतदाताओं के बीच स्वीकार किए जाना रहा है. मोहन सिंह ने 1969 में जनसंघ के टिकट पर चुनाव जीता था. इसके बाद उन्होंने 1974 और 1977 में कांग्रेस का प्रतिनिधित्व किया. मयंकेश्वर शरण सिंह ने 1993 और 2002 में भाजपा के टिकट पर दो बार चुनाव जीता. इसके बाद उन्होंने 2007 का चुनाव समाजवादी पार्टी के टिकट पर लड़ा और जीता. फिर 2017 और 2022 में भाजपा के टिकट पर चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे. मोहम्मद मुस्लिम ने 1996 का चुनाव समाजवादी पार्टी के टिकट पर जीता और 2012 में कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में दोबारा जीत दर्ज की. व्यक्तिगत नेताओं की बात करें तो मयंकेश्वर शरण सिंह ने तिलोई का पांच बार प्रतिनिधित्व किया है. वहीं हाजी मोहम्मद वसीम ने 1980 से 1991 के बीच कांग्रेस के टिकट पर लगातार चार चुनाव जीते.
2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के मोहम्मद मुस्लिम ने समाजवादी पार्टी के मौजूदा विधायक मयंकेश्वर शरण सिंह को 2,710 मतों से हराया था. इस चुनाव में भाजपा काफी पीछे रहते हुए चौथे स्थान पर रही थी. 2004 में भाजपा से निष्कासित किए जाने के बाद सिंह समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए थे. 2017 के चुनाव से पहले उन्हें भाजपा में दोबारा शामिल कर लिया गया. इसका तत्काल राजनीतिक लाभ भाजपा को मिला और सिंह भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़कर बहुजन समाज पार्टी के मोहम्मद सऊद को 44,047 मतों से हराकर विधानसभा पहुंचे. 2022 में सिंह ने भाजपा के टिकट पर सीट बरकरार रखी. उन्हें 99,472 मत मिले, जबकि समाजवादी पार्टी के प्रतिद्वंद्वी मोहम्मद नईम को 71,643 मत मिले. सिंह ने 27,829 मतों से जीत दर्ज की. कांग्रेस को 2012 में मिले 33.12 प्रतिशत मतों के मुकाबले 2017 में 18.31 प्रतिशत और 2022 में 10.72 प्रतिशत मत मिले.
विधानसभा चुनावों में बदलाव के मुकाबले लोकसभा चुनावों में तिलोई क्षेत्र का रुझान अपेक्षाकृत स्थिर रहा है. 2009 के बाद हुए चार लोकसभा चुनावों में से तीन में कांग्रेस को यहां बढ़त मिली, जबकि 2019 में भाजपा आगे रही. 2009 में कांग्रेस ने बहुजन समाज पार्टी पर 75,555 मतों की बढ़त बनाई थी. 2014 में भाजपा के मुकाबले कांग्रेस की बढ़त घटकर 11,249 मत रह गई. 2019 में यह स्थिति बदल गई और भाजपा ने अमेठी से उम्मीदवार स्मृति ईरानी के साथ राहुल गांधी पर 15,164 मतों की बढ़त बनाई. 2004 में पहली बार चुनाव जीतने के बाद अमेठी में लगातार तीन जीत दर्ज कर चुके राहुल गांधी के लिए यह पहली हार थी. 2024 में राहुल गांधी ने अमेठी के बजाय रायबरेली से चुनाव लड़ा. कांग्रेस ने अमेठी में गांधी परिवार के करीबी सहयोगी किशोरी लाल को उम्मीदवार बनाया. किशोरी लाल को 101,405 मत मिले, जबकि स्मृति ईरानी को 83,287 मत मिले. इस तरह तिलोई विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस को 18,118 मतों की बढ़त मिली.
गांधी परिवार का अमेठी से संबंध उत्तर प्रदेश के सबसे लंबे समय तक बने रहने वाले राजनीतिक संबंधों में से एक है. संजय गांधी ने अमेठी लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व किया था. इसके बाद राजीव गांधी ने 1981 में यह सीट जीती और 1984, 1989 तथा 1991 में इसे बरकरार रखा. सोनिया गांधी ने भी 1999 में अमेठी से चुनाव लड़ा था और बाद में रायबरेली चली गईं. राहुल गांधी ने 2004 से 2019 तक अमेठी का प्रतिनिधित्व किया. 2019 में स्मृति ईरानी के हाथों मिली हार ने दशकों से अमेठी पर बने गांधी परिवार के चुनावी प्रभाव में पहली बड़ी टूट दर्ज की.
तिलोई में एक दशक से अधिक समय तक मतदाताओं की संख्या लगातार बढ़ती रही, लेकिन 2024 में इसमें मामूली गिरावट दर्ज की गई. 2012 में यहां पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 3,12,629 थी, जो 2017 में बढ़कर 3,39,401 और 2019 में 3,44,863 हो गई. 2022 में यह संख्या 3,51,728 तक पहुंच गई. इसके बाद 2024 में घटकर 3,47,746 रह गई. 10 अप्रैल 2026 को विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में 3,06,621 मतदाता थे. यह विशेष गहन पुनरीक्षण से पहले मौजूद 3,48,696 मतदाताओं की तुलना में 42,075 की कमी थी. यह कमी पुनरीक्षण से पहले के कुल मतदाताओं का 12.07 प्रतिशत थी.
मतदान प्रतिशत में उतार-चढ़ाव रहा है और ग्रामीण विधानसभा क्षेत्र के लिए यह अपेक्षाकृत मध्यम स्तर पर रहा है. 2012 में मतदान प्रतिशत 59.16 था. 2017 में यह घटकर 57.69 प्रतिशत और 2019 के लोकसभा चुनाव में 55.09 प्रतिशत रह गया. 2022 के विधानसभा चुनाव में मतदान प्रतिशत बढ़कर 58.47 हो गया. 2024 के लोकसभा चुनाव में 56.54 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया.
तिलोई हिंदू बहुल विधानसभा क्षेत्र है और यहां मुस्लिम आबादी भी अच्छी संख्या में है. अनुमान के अनुसार मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी 27.20 प्रतिशत है, जबकि अनुसूचित जाति की आबादी करीब 28.37 प्रतिशत है. पासी यहां की एक महत्वपूर्ण अनुसूचित जाति है. इसके अलावा जाटव और अन्य दलित समूह भी मौजूद हैं. अन्य प्रमुख समुदायों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, यादव, कुर्मी, लोध और अन्य पिछड़ा वर्ग के समूह शामिल हैं. विधानसभा क्षेत्र का सामाजिक स्वरूप हर हिस्से में एक जैसा नहीं है और अलग-अलग समुदायों ने समय के साथ अलग-अलग पार्टियों और उम्मीदवारों का समर्थन किया है. बड़ी मुस्लिम आबादी भी यहां के चुनावों में राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण रही है. मुस्लिम उम्मीदवारों का यहां सात विधानसभा चुनाव जीतना अपने आप में इस बात का प्रमाण नहीं माना जा सकता कि पूरा मुस्लिम समुदाय किसी एक दल के साथ मतदान करता है.
तिलोई ऐतिहासिक रूप से कान्हपुरिया राजपूतों के एक महत्वपूर्ण तालुकेदारी क्षेत्र का केंद्र रहा है. 20वीं सदी की शुरुआत में यह तत्कालीन रायबरेली जिले का खजुरगांव के बाद दूसरा सबसे बड़ा तालुका था. तिलोई के कान्हपुरिया परिवार ने अपनी वंश परंपरा कान्ह के दो पुत्रों में से एक राहस से जोड़ी. कान्ह को इस राजपूत वंश का पारंपरिक संस्थापक माना जाता है. पांच पीढ़ियों के बाद परशद सिंह ने अपनी विस्तृत संपत्ति अपने तीन पुत्रों के बीच बांट दी. सबसे बड़े पुत्र जंगा सिंह तिलोई में रहते थे और उस समय के जायस परगना पर उनका नियंत्रण था. इसके बाद यह संपत्ति कान्हपुरिया शाखा का प्रमुख केंद्र बन गई और रायबरेली तथा आसपास के क्षेत्रों के बड़ी संख्या में गांवों तक इसका विस्तार हुआ. 19वीं सदी के अंतिम दौर में अंग्रेजों ने राजा की वंशानुगत उपाधि को औपचारिक रूप से मान्यता दी थी. स्वतंत्रता के बाद जमींदारी व्यवस्था समाप्त होने तक यह संपदा स्थानीय सत्ता के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में बनी रही.
पुरानी रियासत ने इस क्षेत्र के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास पर अपनी अलग छाप छोड़ी है. तिलोई और आसपास की कान्हपुरिया रियासतें, जिनमें शाहमऊ और अन्य क्षेत्र शामिल थे, राजपूत जमींदारी शक्ति के केंद्र बन गई थीं. वहीं आसपास के गांव कृषि और स्थानीय बाजारों के माध्यम से विकसित हुए. आज भी तिलोई तहसील और ब्लॉक मुख्यालय के रूप में महत्वपूर्ण स्थान रखता है. यहां सप्ताह में दो दिन बुधवार और रविवार को बाजार लगता है. यह बाजार आसपास के ग्रामीण क्षेत्र के लोगों की जरूरतों को पूरा करता है. अनाज और अन्य कृषि उत्पाद स्थानीय व्यापार का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं.
तिलोई रायबरेली से करीब 35 किलोमीटर और लखनऊ से लगभग 85 किलोमीटर दूर है. जायस करीब 18 किलोमीटर की दूरी पर है. अमेठी करीब 50 किलोमीटर और सुलतानपुर लगभग 65 किलोमीटर दूर है. अयोध्या करीब 95 किलोमीटर दूर है. प्रयागराज लगभग 150 किलोमीटर और वाराणसी करीब 250 किलोमीटर दूर है. दूरी मार्ग के अनुसार बदल सकती है. विधानसभा क्षेत्र में कोई रेलवे स्टेशन नहीं है. जायस और निहालगढ़ नजदीकी महत्वपूर्ण रेलवे स्टेशन हैं. इन स्टेशनों से लखनऊ, रायबरेली, सुलतानपुर और अन्य रेल मार्गों तक पहुंच मिलती है. स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए सड़क संपर्क महत्वपूर्ण है. जायस-इन्हौना मार्ग के साथ रायबरेली, लखनऊ और आसपास के विकास खंडों से जुड़े मार्ग यात्री और व्यावसायिक यातायात का प्रमुख माध्यम हैं.
तिलोई में लोकसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस को मिली बड़ी बढ़त यह बताती है कि विधानसभा और संसदीय चुनावों में यहां के मतदाताओं के मतदान के आधार अलग-अलग हो सकते हैं. 2019 के लोकसभा चुनाव ने यह भी दिखाया कि अमेठी में गांधी परिवार के उम्मीदवार की मौजूदगी के बावजूद कांग्रेस को चुनौती का सामना करना पड़ सकता है. पिछले दो विधानसभा चुनावों में कांग्रेस तीसरे स्थान पर रही है और वर्षों के दौरान उसके मत प्रतिशत में काफी गिरावट आई है.
भाजपा 2027 में लगातार तीसरी जीत की कोशिश करेगी. हालांकि पार्टी को विपक्षी एकता की स्थिति पर भी नजर रखनी होगी. बड़े अमेठी क्षेत्र में विपक्षी दलों के बीच एकजुटता कई बार कमजोर रही है और तिलोई भी इससे अलग नहीं रहा है. विधानसभा क्षेत्र में मजबूत आधार बनाने के बाद भाजपा के पास अपनी जीत को लेकर कारण जरूर हैं. फिर भी इस सीट पर उसका लाभ निश्चित नहीं माना जा सकता, क्योंकि यहां के मतदाताओं ने बार-बार राजनीतिक निष्ठा बदलने की इच्छा दिखाई है. बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस साथ आती हैं या नहीं और क्या वे एक साझा उम्मीदवार उतारती हैं. इसके साथ यह भी महत्वपूर्ण होगा कि ऐसा गठबंधन भाजपा के स्थापित समर्थन आधार के मुकाबले अपने मतों को एकजुट कर पाता है या नहीं.
बहुजन समाज पार्टी भी दलित और मुस्लिम मतदाताओं के कुछ हिस्सों के बीच अपने संभावित समर्थन के कारण चुनाव को प्रभावित कर सकती है. विशेष गहन पुनरीक्षण ने एक और नया राजनीतिक पहलू जोड़ दिया है, हालांकि अभी इसके राजनीतिक प्रभाव का आकलन नहीं किया जा सकता है. इसलिए 2027 में तिलोई एक ऐसी विधानसभा सीट बनी रह सकती है, जिस पर करीबी मुकाबले के लिए नजर रहेगी. यहां उम्मीदवार, गठबंधन और सहयोगी दलों के बीच मतों के हस्तांतरण की क्षमता चुनाव परिणाम में निर्णायक भूमिका निभा सकती है.
(अजय झा)