उत्तर प्रदेश की सत्ता में वापसी के लिए सपा प्रमुख अखिलेश यादव बेताब हैं. यही वजह है कि 2027 विधानसभा चुनाव से पहले अपने सियासी समीकरण को मजबूत करने में जुट गई है. सपा अपने विनिंग फार्मूले पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के साथ ब्राह्मण समाज को जोड़ना चाहती है, जिसके लिए लखनऊ में बुधवार को 'प्रबुद्ध सम्मेलन' कर रही है.
समाजवादी पार्टी के संस्थापक रहे जनेश्वर मिश्र की जयंती पर लखनऊ में 'ब्राह्मण सम्मेलन' रखा है. जनेश्वर मिश्र को सपा का कद्दावर नेता और ब्राह्मण चेहरा माना जाता था. इतना ही नहीं वो अखिलेश यादव के राजनीतिक गुरु थे. अखिलेश यादव अब जनेश्वर मिश्र के बहाने ब्राह्मण समाज के बीच अपनी पैठ जमाना चाहते हैं.
जनेश्वर मिश्र की जयंती पर लखनऊ में सपा ने प्रबुद्ध सम्मेलन रखा है, जिसमें पार्टी के ब्राह्मण समाज के चेहरों के अलावा काशी, मथुरा और अयोध्या से संत और विद्वान बुलाए गए हैं. मंच से वैदिक मंत्रोच्चार होगा और अखिलेश यादव संतों और विद्वानों का सम्मान कर ब्राह्मण समाज को सियासी संदेश देते नजर आएंगे. ऐसे में सवाल उठता है कि सपा को ब्राह्मण वोटों की जरूरत क्यों पड़ गई और क्या ब्राह्मण समाज के साथ आने से यूपी का चुनावी गेम बदल जाएगा?
लखनऊ में सपा का ब्राह्मण सम्मेलन
सपा के लिए इस बार 5 अगस्त सिर्फ जनेश्वर मिश्र की जयंती से मिशन-2027 का चुनावी बिगुल फूंकने जा रही है . जनेश्वर मिश्र पार्क में अखिलेश यादव जनेश्वर मिश्र की प्रतिमा पर माल्यार्पण के बाद सपा मुख्यालय में ब्राह्मण सम्मेलन में शामिल होंगे, जिसमें प्रदेशभर से करीब 20 हजार ब्राह्मण समाज के लोगों के जुटने का दावा किया है.
जनेश्वर मिश्र की जयंती के जरिए सपा ब्राह्मण समाज को अपने साथ जोड़ने का प्लान बनाया है. इसीलिए प्रबुद्ध सम्मेलन में काशी, मथुरा और अयोध्या से संत और विद्वानों को बुलाया गया है. वैदिक मंत्रों के बीच कार्यक्रम की शुरुआत होगी. अखिलेश यादव तमाम संतों, संस्कृत विद्वानों और ब्राह्मण नेताओं का सम्मान करेंगे.पूर्वांचल और अवध क्षेत्र के साथ-साथ पश्चिमी यूपी और बुंदेलखंड से ब्राह्मण समाज के लोगों को बुलाया गया है.
सपा प्रबुद्ध सम्मेलन के जरिए यह संदेश देने की कोशिश करेगी कि उसकी राजनीति सिर्फ पीडीए तक सीमित नहीं बल्कि सभी वर्गों को साथ लेकर चलने की है. इसीलिए सपा ने कई महीनों से अपनी तैयारी शुरू कर थी. सपा के ब्राह्मण चेहरे सूबे के अलग-अलग क्षेत्रों में दौरा करके ब्राह्मण सम्मेलन के लिए माहौल बना रहे थे. माता प्रसाद पांडेय से लेकर सनातन पांडेय, अभिषेक मिश्रा और पवन पांडेय ने ब्राह्मण सम्मेलन के लिए पूरी ताकत लगाई है.
ब्राह्मण समाज का विश्वास सपा जीत पाएगी
अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश के चुनावी आहट के साथ अपनी रणनीति पर काम शुरू कर दिया है, लेकिन सवाल यही है कि सपा क्या ब्राह्मण समाज के विश्वास को जीत पाएगी. यूपी में करीब 10 से 12 फीसदी से ब्राह्मण वोटर हैं, जो फिलहाल बीजेपी का परंपरागत वोटबैंक माने जाते हैं. ब्राह्मण समाज ने 85 से 90 फीसदी के बीच बीजेपी को वोट कर रहा है. इसके बाद भी सपा ने ब्राह्मण समाज के बीच अपनी पैठ बनाने की कवायद है.
2017 में बीजेपी पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की तो क्षत्रीय समुदाय से आने वाले योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने. इसके बाद से ब्राह्मण समाज के उपेक्षा का मुद्दा उठाने लगा, लेकिन उसके बाद भी ब्राह्मणों का विश्वास बीजेपी के साथ बना हुआ है. सपा की पूरी सियासत ओबीसी से शुरू हुई, जिसके चलते ब्राह्मण वोटर हमेंशा से सपा से दूरी बनाए रखा. अब सूबे के बदले हुए सियासी माहौल में अखिलेश यादव ने ब्राह्मणों को साधने की कोशिश कर रहे हैं,
अखिलेश यादव को यह पता है कि भले ही ब्राह्मण वोटर उन्हें बीजेपी के तरह एकमुश्त वोट न दे, लेकिन उसमें थोड़ा बहुत सेंधमारी करने में कामयाब हो जाते हैं तो सत्ता में वापसी की राह आसान हो सकती है. सपा को लगता है कि सीएम योगी आदित्यनाथ के सत्ता में होने के चलते ब्राह्मणों का एक तबका उनके साथ आ सकता है, जिसके लिए ही माता प्रसाद पांडेय से लेकर सनातन पांडेय और पवन पांडेय को ब्राह्मण चेहरे के तौर पर बढ़ा रहे हैं. ब्राह्मणों के बीच सपा को लेकर एक सकारात्मक बदलाव भी दिख रहा है.
ब्राह्मणों के संग सपा कितना बदलेगी गेम
सपा ने अपने पीडीए फार्मूले के जरिए 2024 के लोकसभा चुनाव में 80 में से 37 सीटें जीतने में कामयाब रही है, लेकिन विधानसभा चुनाव में सपा का दांव ब्राह्मणों को भी साथ जोड़ने का है. सपा को पता है कि ब्राह्मण समाज का विश्वास जीत लेते हैं तो सत्ता की राह काफी आसान हो जाएगी. सपा यह मानती है कि सिर्फ पीडीए के सहारे 2027 की सत्ता तक पहुंचना आसान नहीं होगा. यही वजह है कि अब ब्राह्मण समाज को भी सियासी संदेश देने की तैयारी है.
उत्तर प्रदेश की सियासत में भले ही ब्राह्मणों की आबादी 10 फीसदी वोट तक सिमटी हुई है, लेकिन ब्राह्मण समाज का सियासी प्रभाव इससे कहीं अधिक है. ब्राह्मण समाज सूबे में प्रभुत्वशाली होने के साथ-साथ राजनीतिक हवा बनाने में भी काफी सक्षम माना जाता है. सूबे की करीब 80 से ज्यादा सीटों पर ब्राह्मण वोटर निर्णायक भूमिका अदा करते हैं.
यूपी के एक दर्जन जिलों में ब्राह्मणों की आबादी 20 फीसदी से ज्यादा है. वाराणसी, चंदौली, महाराजगंज, गोरखपुर, देवरिया, भदोही, जौनपुर, बस्ती, संत कबीर नगर, अमेठी, बलरामपुर, कानपुर, प्रयागराज में ब्राह्मण मतदाता 15 फीसदी से ज्यादा है. इन जिलों में ब्राह्मण वोटर्स किसी भी उम्मीदवार की हार या जीत में अहम रोल अदा करते हैं.सपा का मानना है कि ब्राह्मण समाज का आधा वोट भी सपा अपने साथ जोड़ने में कामयाब रहती है तो फिर यूपी का सियासी गेम ही पूरी तरह बदल जाएगा.
ब्राह्मण सपा पर हुआ सवार तो बनेगी सरकार
उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण समुदाय सिर्फ वोट ही नहीं करता बल्कि सत्ता बनाने और बिगाड़ने में अहम रोल अदा करता है. आजादी से बाद 90 के दशक तक ब्राह्मण समाज कांग्रेस के साथ खड़ा रहा तो कांग्रेस की सरकार बनती रही. ब्राह्मण समाज ने कांग्रेस का छोड़ते ही सत्ता से बाहर हो गई. 2007 में ब्राह्मणों ने बसपा की हाथी पर सवार हुए तो मायावती की पूर्ण बहुमत से सरकार बनी. इसके बाद अलग-अलग पार्टियों में बंटता रहा, लेकिन 2014 से बीजेपी के साथ मजबूती से खड़ा हुआ है.
यूपी की सियासत में ब्राह्मण समाज बीजेपी का कोर वोटबैंक माना जाता है.सपा ये मानकर चल रही है कि सत्ता में आना है तो बीजेपी के कोर वोटबैंक में ही सेंधमारी करनी होगी. मुस्लिम और यादव के सहारे 2017 और 2022 का चुनाव सपा देख चुकी है. इसीलिए 2024 के चुनाव में सपा ने पीडीए फार्मूला बनाया, जिसके सहारे बीजेपी को गहरी चोट दी, लेकिन 2027 में सत्ता में आने के लिए ब्राह्मणों को जोड़ने का प्लान है. ऐसे में सपा को पता है कि ब्राह्मण वोट अगर उसके साथ आता है तो फिर बीजेपी के सत्ता से बाहर कर सकती है.
सपा के लिए ब्राह्मण वोटर कितना अहम
लोकसभा चुनाव 2024 में सपा ने सपा को 33.59 फीसदी वोट मिले थी, जिसके सहारे 37 सीटें जीती थी, लेकिन सत्ता में आने के लिए 45 फीसदी वोट चाहिए होंगे. बीजेपी 2024 में 41.37 फीसदी वोट पाने में कामयाब रही. इस तरह बीजेपी का वोट सपा से ज्यादा था. 2022 में सपा 32 फीसदी से साथ 111 सीटें जीती थी जबकि बीजेपी 41.29 फीसदी वोट शेयर के साथ 255 सीटें जीती थी.
सपा 2027 में ब्राह्मण वोटों को जोड़ती है तो उसका सीधा असर बीजेपी के वोट शेयर में पड़ेगा, जिसमें 5 फीसदी वोट भी जोड़ लेती है तो बीजेपी का गेम पूरी तरह खराब हो जाएगा. ऐसे में जनेश्वर मिश्र की पहचान एक समाजवादी विचारक के साथ ब्राह्मण समाज के प्रभावशाली नेता के रूप में भी रही. इसी विरासत को आगे बढ़ाने की कोशिश है. अब देखना है कि ब्राह्मण समाज 2027 में किसकी नैया पर सवा होते हैं?
कुबूल अहमद