उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी के भीतर 'आजम खान' होने का मतलब क्या है, ये एक बार फिर से साफ हो गया है. समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और वरिष्ठ नेता आजम खान के बीच रामपुर जेल में हुई करीब एक घंटे की मुलाकात ने सूबे की सियासत में हलचल तेज कर दी है.
एक साल के अंतराल में अखिलेश यादव की ये दूसरी रामपुर यात्रा थी, जिसने ये बता दिया कि सपा की राजनीति में आजम खान का कद और दबाव आज भी कितना बड़ा है.
अखिलेश यादव के रामपुर पहुंचने की खबर से ही पूरे जिले और मंडल के सपा कार्यकर्ताओं में भारी जोश भर गया था. हालांकि, इस मुलाकात के कई राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं.
आजम खान-अखिलेश यादव की मुलाकात के मायने
जानकारों का मानना है कि इस मुलाकात के पीछे एक तय एजेंडा तो था ही, लेकिन साथ ही एक अदृश्य एजेंडा आजम खान की ओर से पार्टी को अपनी सियासी हैसियत का अहसास कराना भी था. आजम खान ये जताना चाहते थे कि भले ही वो सलाखों के पीछे हैं, लेकिन समाजवादी पार्टी में मुस्लिम सियासत आज भी उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती है.
ये मुलाकात यूं ही नहीं हुई, बल्कि इसके लिए महीनों से राजनीतिक जमीन तैयार की जा रही थी. कुछ समय पहले राज्यसभा चुनाव से ठीक पहले आजम खान की पत्नी तंजीम फातिमा और उनके बड़े बेटे ने लखनऊ में अखिलेश यादव से मुलाकात की थी.
इसके अलावा, हाल ही में आजम खान के खासमखास माने जाने वाले जिलाध्यक्ष अजय सागर ने भी अखिलेश से भेंट की थी. इन मुलाकातों ने ही अखिलेश और आजम की इस आमने-सामने की बैठक की पृष्ठभूमि तैयार की थी.
मुलाकात के अहम मुद्दे और राजनीतिक समीकरण
सूत्रों के मुताबिक, इस लंबी बातचीत में तीन बड़े मुद्दों पर चर्चा हुई. पहला मुद्दा जौहर यूनिवर्सिटी को लेकर था. ईडी के जौहर यूनिवर्सिटी में दाखिल होने के बाद से उस पर मंडराते खतरे को देखते हुए आजम खान चाहते हैं कि अखिलेश यादव इस लड़ाई को पूरी मजबूती के साथ लड़ें.
दूसरा बड़ा मुद्दा आगामी विधानसभा चुनाव में टिकट बंटवारे का है. इस समय कांग्रेस और सपा के बीच गठबंधन की बातचीत अंतिम दौर में है. ऐसे में आजम खान चाहते हैं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश और खासकर उनके बुरे दौर में जिन लोगों ने उनकी और उनकी यूनिवर्सिटी की मदद की है, उन्हें चुनावी मैदान में उतारा जाए. आजम खान ने अपने कई वफादार नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए टिकटों पर अपनी बात अखिलेश के सामने साफ कर दी है.
तीसरा और सबसे अहम मुद्दा रामपुर सांसद मोहिबुल्लाह नदवी को लेकर आजम खान की नाराजगी है. आजम खान इस बात से असहज हैं कि अखिलेश यादव मोहिबुल्लाह नदवी को इंडिया गठबंधन की बैठकों में प्रतिनिधि के तौर पर भेज रहे हैं और नदवी मुरादाबाद मंडल में अपने समर्थकों को मजबूत कर रहे हैं. आजम खान बिल्कुल नहीं चाहते कि आगामी विधानसभा चुनाव के टिकट वितरण में मोहिबुल्लाह नदवी की कोई भी दखलंदाजी हो और उन्होंने ये बात साफ तौर पर अखिलेश को बता दी है.
सपा के सभी पुराने नेता जानते हैं कि आजम खान अपनी शर्तें मनवाने में कितने माहिर राजनेता हैं. दिवंगत मुलायम सिंह यादव के साथ आजम खान की ट्यूनिंग और राजनीतिक केमेस्ट्री अलग स्तर की थी, जहां वो अपनी बात आसानी से मनवा लेते थे. लेकिन अखिलेश यादव के साथ काम करने का तरीका थोड़ा अलग है. हालांकि, अखिलेश भी ये अच्छी तरह समझते हैं कि आजम खान को नाराज करने का जोखिम मोल नहीं लिया जा सकता.
भले ही अखिलेश यादव पार्टी में पुरानी परंपराओं को बदलने और अपनी स्वतंत्र शैली में काम करने की कोशिश करते दिखते हों, लेकिन जब बात आजम खान की आती है, तो वो अपनी सियासी जमीन और प्रभाव के बल पर हर बार हावी नजर आते हैं
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आगे क्या होगा?
ये मुलाकात भले ही खत्म हो गई हो, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि अखिलेश यादव, आजम खान की इन बातों और मांगों को कितनी अहमियत देते हैं और उनके कहे मुताबिक कितने टिकट बांटते हैं. ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि आजम खान ने अपनी पूरी बात और इच्छा खुलकर अखिलेश यादव के सामने रख दी है. सपा की सियासत में आजम खान का होना आज भी एक ऐसा समीकरण है, जिसे नजरअंदाज करना किसी भी नेतृत्व के लिए मुमकिन नहीं है.
कुमार अभिषेक