तिरुवनंतपुरम एक ऐसा विधानसभा क्षेत्र है, जहां लोग सत्ता और सरकार को दूर से नहीं, बल्कि रोज अपनी जिंदगी में महसूस करते हैं. यह राजधानी का क्षेत्र है, जहां सड़कें, नालियां, कचरा प्रबंधन, पानी की सप्लाई, सार्वजनिक परिवहन, बाजार, सरकारी दफ्तर और पुलिस व्यवस्था सीधे लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं. यहां शासन केवल नीति या घोषणा नहीं, बल्कि हर घंटे
अनुभव की जाने वाली चीज है.
इस सीट के मतदाता सामाजिक रूप से विविध और राजनीतिक रूप से सजग हैं. यहां सरकारी कर्मचारी और पेंशनधारक, व्यापारी और असंगठित क्षेत्र के कामगार, छात्र, प्रोफेशनल्स, तटीय इलाकों के परिवार और अपार्टमेंट में रहने वाले लोग सभी एक छोटे भौगोलिक क्षेत्र में रहते हैं.यहां विचारधारा मायने रखती है, लेकिन उससे ज्यादा अहम होता है कि मोहल्ले में सेवाएं कैसी हैं, इलाके की छवि क्या है और नेता भरोसेमंद है या नहीं.
यहां की घनी बसावट, सरकारी दफ्तर, अस्पताल, विश्वविद्यालय, बाजार और रिहायशी इलाके आस-पास ही हैं. इसका मतलब यह है कि राजनीति भी “छोटी” और तुरंत प्रतिक्रिया वाली हो जाती है. अगर कहीं सड़क जलमग्न हुई, कचरा जमा हुआ या ट्रैफिक जाम लगा, तो वह पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बन जाता है. यह इलाका शहर का प्रशासनिक और प्रतीकात्मक केंद्र है. यहां के मतदाता नेताओं से तेज कार्रवाई, अफसरशाही तक सीधी पहुंच और तुरंत समस्या समाधान की उम्मीद करते हैं. यहां केवल योजनाओं की घोषणा से काम नहीं चलता, बल्कि काम होते दिखना चाहिए.
राजधानी क्षेत्र में नागरिक सुविधाओं की कमी तुरंत राजनीतिक मुद्दा बन जाती है. बारिश में जलभराव, ट्रैफिक जाम, टूटी सड़कें, कचरा प्रबंधन और पीने के पानी की समस्या यहां लगातार शासन की परीक्षा लेती हैं. राजधानी में वादों और हकीकत का फर्क बहुत साफ दिखता है.
यहां प्रतिनिधियों का मूल्यांकन भाषणों से नहीं, बल्कि काम से होता है. सड़क बनी या नहीं, नाली साफ हुई या नहीं, सेवा बहाल हुई या नहीं, यही यहां की असली राजनीति है. किसी संकट के समय नेता की मौजूदगी बेहद जरूरी मानी जाती है.
तिरुवनंतपुरम में हिंदू, मुस्लिम और ईसाई समुदाय साथ रहते हैं. यहां जाति के साथ-साथ वर्ग, पेशा और सरकारी सुविधाओं तक पहुंच भी राजनीति को प्रभावित करती है. इस क्षेत्र में तटीय इलाका भी शामिल है, जहां मछुआरा समुदाय रहता है. उन्हें आजीविका की अनिश्चितता, समुद्री कटाव और बार-बार विस्थापन जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है.
मछुआरा समुदाय अब तटीय सुरक्षा, घरों की सुरक्षा और रोजगार को राजनीतिक एजेंडा बना रहा है. जलवायु परिवर्तन और समुद्री कटाव अब शहरी राजनीति का अहम हिस्सा बन चुके हैं. यह क्षेत्र ऐसे नेतृत्व की अपेक्षा करता है जो सुलभ हो, प्रशासनिक रूप से सक्षम हो और हर समय मौजूद दिखे. रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन, व्यापारी संगठन, तटीय समितियां और वार्ड स्तर के नेटवर्क असंतोष को बहुत तेजी से फैला देते हैं.
यहां चुनाव केवल विचारधारा पर नहीं लड़े जाते, बल्कि इस बात पर लड़े जाते हैं कि शहर की रोजमर्रा की जिंदगी कौन बेहतर संभाल सकता है. कई बार उम्मीदवार की व्यक्तिगत विश्वसनीयता पार्टी से ज्यादा अहम हो जाती है.
तिरुवनंतपुरम में राजनीति हमेशा प्रतिस्पर्धात्मक रही है. लेफ्ट के पास मजबूत संगठन है, कांग्रेस के पास पारंपरिक नेटवर्क और मध्यम वर्ग का समर्थन है, जबकि भाजपा ने कुछ वार्डों में स्थायी वोट बैंक बना लिया है. इसी वजह से यह सीट साफ तौर पर त्रिकोणीय मुकाबले वाली बन चुकी है.
2021 के विधानसभा चुनाव में इस संतुलन की झलक दिखी. एलडीएफ उम्मीदवार और जनाधिपत्य केरल कांग्रेस के नेता एंटनी राजू ने 48,748 वोट (38.01%) हासिल कर जीत दर्ज की. उन्होंने कांग्रेस के वी. एस. शिवकुमार को 7,089 वोटों से हराया. भाजपा के जी. कृष्णकुमार को 34,996 वोट मिले और वे तीसरे स्थान पर रहे.
हाल ही में एंटनी राजू को एक पुराने आपराधिक मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद विधानसभा से अयोग्य घोषित कर दिया गया. इस फैसले के चलते वे अगला चुनाव लड़ने के पात्र नहीं रह गए हैं. राजधानी में एलडीएफ के सबसे प्रमुख चेहरे के तौर पर उनकी भूमिका खत्म होना बड़ा झटका माना जा रहा है. राजू की अयोग्यता ने एलडीएफ की राजधानी रणनीति को हिला दिया है. वे कई वर्षों से तिरुवनंतपुरम में गठबंधन का शहरी चेहरा थे. उनके जाने से नेतृत्व, भरोसे और उत्तराधिकार पर नए सवाल खड़े हो गए हैं, खासकर ऐसे समय में जब नागरिक असंतोष बढ़ रहा है.
विपक्षी दलों के लिए यह मामला जवाबदेही और प्रतिनिधित्व का बड़ा चुनावी मुद्दा बन गया है.
व्यापारिक इलाके, बाजार और घनी आबादी वाले वार्ड राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील हैं. तटीय इलाकों में कटाव और पुनर्वास मुख्य मुद्दा है, जबकि अपार्टमेंट क्षेत्रों में ट्रैफिक, सुरक्षा और सेवाओं की गुणवत्ता अहम है. ये छोटे इलाके अब “स्विंग जोन” की तरह व्यवहार करने लगे हैं.
तिरुवनंतपुरम में चुनाव तीन सवालों पर तय होते हैं- शहर की रोजमर्रा की व्यवस्था कौन संभाल सकता है, विविध शहरी और तटीय हितों का सही प्रतिनिधि कौन है और गठबंधन राजनीति को बिना भरोसा खोए कौन चला सकता है?
भाजपा की स्थायी मौजूदगी मुकाबले को त्रिकोणीय बनाए रखती है. एलडीएफ में नेतृत्व परिवर्तन और कांग्रेस की वापसी की कोशिश के बीच, मामूली मत परिवर्तन भी नतीजा बदल सकता है.
तिरुवनंतपुरम सीट उन नेताओं को चुनती है जो दिखाई देते हैं, जनता की सुनते हैं और काम करते हैं. संगठन जरूरी है, लेकिन भरोसा उससे भी ज्यादा अहम है.मतदाता दक्षता, उपलब्धता और भरोसे को प्राथमिकता देता है और हर नेता को लगातार कसौटी पर रखता है.
(ए के शाजी)