अलप्पुझा जिले में स्थित हरिपद विधानसभा क्षेत्र अलप्पुझा लोकसभा सीट का हिस्सा है और लंबे समय से यूडीएफ और एलडीएफ के बीच मुकाबले का मैदान रहा है. यहां की राजनीति किसी एक उद्योग या वर्ग तक सीमित नहीं है. समुद्र किनारे मछुआरे, अंदरूनी इलाकों में किसान, मंदिरों से जुड़े कस्बे और नहरों के आसपास बसावट- इन सबका असर राजनीति पर पड़ता है. इसी वजह से यहां
के लोग ऐसे नेताओं को पसंद करते हैं जो जमीन से जुड़े हों, लंबे समय से क्षेत्र में काम कर रहे हों और मुश्किल वक्त में साथ खड़े रहते हों.
हरिपद एक ऐसा क्षेत्र है जहां चुनावी राजनीति में ज्यादा शोर-शराबा या अचानक भावनात्मक लहरें देखने को नहीं मिलतीं. यह केरल के तटीय इलाके और मध्यवर्ती कृषि क्षेत्रों के बीच स्थित है. यहां के लोगों की जिंदगी मछली पकड़ने, खेती, छोटे व्यापार और रोजमर्रा की मेहनत से जुड़ी है. इसलिए यहां वोट विचारधाराओं से ज्यादा भरोसे, काम और लगातार मौजूद रहने वाले नेताओं को देखकर दिया जाता है. हरिपद के मतदाता सावधानी से फैसला लेते हैं और जब वे बदलाव करते हैं तो वह सोच-समझकर और साफ इरादे के साथ होता है.
समुद्र यहां की राजनीति का अहम हिस्सा है. मछली पकड़ने पर प्रतिबंध, डीजल के दाम, बंदरगाह की सुविधाएं और मुआवजा- ये सब सीधे लोगों की रोजी-रोटी से जुड़े मुद्दे हैं. अगर राहत या बीमा में देरी होती है तो उसका असर तुरंत नाराजगी के रूप में दिखता है. खेती करने वाले किसान बाढ़, जलवायु परिवर्तन और मजदूरों की कमी से परेशान हैं. ऐसे में लोग सरकार और अपने प्रतिनिधि के कामकाज को बहुत ध्यान से देखते हैं.
सामाजिक रूप से यहां हिन्दू समुदाय, खासकर इझावा समाज की संख्या ज्यादा है. मंदिर समितियां और उनसे जुड़े संगठन सामाजिक और राजनीतिक सोच को प्रभावित करते हैं. मुस्लिम और ईसाई समुदाय भी अपनी-अपनी बस्तियों में संगठित हैं और शिक्षा, व्यापार व सेवा क्षेत्र से जुड़े हुए हैं. अनुसूचित जाति और तटीय मजदूर वर्ग कल्याणकारी योजनाओं से प्रभावित होकर अक्सर वामपंथी दलों की ओर झुकता है.
हरिपद में भाषणबाजी से ज्यादा अहमियत व्यवहार को दी जाती है. बाढ़, नाव दुर्घटना, अस्पताल की मदद या सरकारी दफ्तरों के काम में नेता कितना सक्रिय रहता है- यही मतदाताओं के लिए असली पैमाना है. यहां लोगों को वही नेता पसंद आते हैं जो चुनाव के बाद भी दिखाई देते रहें.
2021 के विधानसभा चुनाव में जब पूरे केरल में एलडीएफ को बड़ी जीत मिली, तब भी हरिपद ने अपने पुराने और भरोसेमंद नेता रमेश चेनिथला को चुना. उन्होंने एलडीएफ उम्मीदवार को काफी अंतर से हराया. इससे साफ हुआ कि यहां के लोग सरकार की नीतियों को मानते हैं, लेकिन व्यक्तिगत भरोसे और लंबे रिश्ते को भी उतनी ही अहमियत देते हैं.
कुल मिलाकर, हरिपद में वही जीतता है जो मछुआरों, किसानों, मंदिर समितियों, सहकारी संस्थाओं और आम लोगों- सबसे जुड़ा रहे. यहां पहचान और काम दोनों जरूरी हैं. यह इलाका निरंतरता चाहता है, लेकिन लापरवाही बर्दाश्त नहीं करता. इसलिए हरिपद का वोट अनुभव, भरोसे और जमीनी कामकाज के आधार पर तय होता है, न कि केवल राजनीतिक नारों पर.
(K. A. Shaji)