नेदुमंगड (Nedumangad) विधानसभा सीट पर मतदान हमेशा जमीन पर दिखने वाले कामकाज के आधार पर तय होता है. तिरुवनंतपुरम जिले के पूर्वी किनारे पर फैली यह सीट एक “ट्रांजिशन जोन” में आती है, जहां राजधानी के उपनगर धीरे-धीरे ग्रामीण इलाकों, जंगलों से सटे बसावटों और पहाड़ी गांवों में बदल जाते हैं. इसी वजह से यहां के मतदाता राजनीति को नारे, भाषण या भावनात्मक
अपील से ज्यादा रोजमर्रा की सुविधाओं और प्रशासनिक प्रदर्शन के आधार पर परखते हैं. सड़कें ठीक हैं या नहीं, बसें समय पर आती हैं या नहीं, नलों में पानी आता है या सूख जाता है, और पेंशन या कल्याण योजनाओं की राशि समय पर घरों तक पहुंचती है या देर से, यही मुद्दे नेदुमंगड की राजनीतिक सोच का केंद्र हैं.
यह सीट लंबे समय से वामपंथ की ओर झुकी रही है. इसके पीछे वाम दलों की मजबूत संगठनात्मक पकड़ और जनता के बीच यह गहरी उम्मीद है कि राज्य सरकार एक भरोसेमंद सेवा देने वाली व्यवस्था बनी रहे. नेदुमंगड में राजनीति अक्सर “थिएट्रिकल” नहीं होती. यहां मतदाता प्रतिनिधि से बड़ी घोषणाओं की बजाय लगातार हस्तक्षेप, जवाबदेही और व्यवस्था को ठीक कराने की क्षमता की अपेक्षा करते हैं. हालांकि, यह सीट पूरी तरह स्थिर नहीं है. तेजी से बढ़ता शहरीकरण, जमीन और मकानों का दबाव, बुनियादी ढांचे की कमी और पर्यावरणीय तनाव यहां लगातार ऐसे मुद्दे बनते रहे हैं, जो किसी भी पार्टी को आत्मसंतुष्ट नहीं होने देते.
नेदुमंगड की राजनीतिक पहचान उसके भूगोल से सीधे जुड़ी है. तिरुवनंतपुरम शहर के नजदीकी हिस्सों में अर्ध-शहरी जीवन दिखाई देता है. यहां रोजाना काम के लिए शहर आने-जाने वाले लोग, बढ़ता रियल एस्टेट, और नागरिक सुविधाओं की बढ़ती मांग प्रमुख है. वहीं सीट के पूर्वी हिस्से में खेती-किसानी वाले पंचायत क्षेत्र और जंगल से सटे गांव आते हैं, जहां आज भी जीवन का आधार जमीन, पानी और सरकारी संस्थाओं तक पहुंच है. यह मिश्रित इलाका एक ऐसी जनता तैयार करता है, जिसमें छोटे व्यापारी, सरकारी कर्मचारी, किसान परिवार, असंगठित मजदूर और जंगल-आधारित समुदाय एक साथ रहते हैं.
इस सामाजिक विविधता के बावजूद कई चिंताएं साझा हैं. महंगाई, परिवहन कनेक्टिविटी, सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता और कल्याण योजनाओं की पहुंच ऐसे मुद्दे हैं जो लगभग हर वर्ग को प्रभावित करते हैं. नेदुमंगड में वोटिंग व्यवहार में जाति का प्रभाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, लेकिन धीरे-धीरे वर्गीय स्थिति, रोजगार की अनिश्चितता और कल्याण योजनाओं पर निर्भरता ज्यादा निर्णायक भूमिका निभाने लगी है. कामकाजी परिवार, पेंशनधारी, कृषि मजदूर और निम्न-मध्यम वर्ग अक्सर कीमतों की स्थिरता, सार्वजनिक सेवाओं की निरंतरता और कल्याण सहायता के भरोसे पर एक जैसी राजनीतिक अपेक्षाएं रखते हैं.
नेदुमंगड में राजनीतिक चर्चा का केंद्र नागरिक मुद्दे हैं. सड़कें, सार्वजनिक परिवहन, पीने का पानी, जलनिकासी और कचरा प्रबंधन जैसे विषय यहां रोजमर्रा की राजनीति बन जाते हैं. खासकर बरसात के मौसम में जलभराव, ड्रेनेज की समस्या और पानी की सप्लाई से जुड़े मुद्दे और तेज हो जाते हैं. यहां मतदाता शासन को वादों से नहीं, “फॉलो-थ्रू” यानी काम पूरा कराने की क्षमता से आंकते हैं. एक सड़क की मरम्मत में देरी या पानी की लाइन में लगातार परेशानी, उतना ही बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है जितना कोई बड़ा नीतिगत फैसला.
इसी वजह से नेदुमंगाड में नेतृत्व से उम्मीदें भी अलग हैं. यहां प्रतिनिधि से अपेक्षा होती है कि वह चुनाव के बाद भी जनता के बीच मौजूद रहे, वार्ड स्तर के नेटवर्क से जुड़ा रहे और प्रशासनिक मशीनरी के साथ सक्रिय रूप से हस्तक्षेप कर समस्याओं का समाधान कराए. इस सीट में नागरिक तनाव बहुत जल्दी राजनीतिक तनाव बन जाता है, क्योंकि मतदाता व्यवस्था की कमियों को लगातार महसूस करते हैं और उसी के आधार पर राजनीतिक निर्णय बनाते हैं.
ऐतिहासिक रूप से यह सीट वामपंथ के लिए मजबूत रही है, और CPI की यहां गहरी पकड़ रही है. इसका कारण केवल विचारधारा नहीं, बल्कि यह भी है कि वाम दलों का शासन और संगठन इस सीट की अपेक्षाओं से मेल खाता है, यानी राज्य को एक स्थिर और भरोसेमंद सेवा प्रदाता के रूप में बनाए रखना. लेकिन शहरी विस्तार और सामाजिक बदलाव ने यहां चुनावी गणित को जटिल बनाया है. जमीन के उपयोग को लेकर विवाद, बढ़ती हाउसिंग डिमांड और पर्यावरणीय दबाव नेदुमंगाड की राजनीति को कई अन्य सीटों की तुलना में ज्यादा संवेदनशील बना दिया है. इन मुद्दों के कारण विपक्ष के लिए कुछ स्पेस जरूर बनता है, लेकिन अब तक विपक्षी ताकतें निर्णायक रूप से एकजुट नहीं हो पाई हैं.
2021 के विधानसभा चुनाव में नेदुमंगाड ने वामपंथ को एक स्पष्ट जनादेश दिया. CPI के जी. आर. अनिल ने 72,742 वोट हासिल कर जीत दर्ज की और उन्हें कुल पड़े वोटों का 47.54 प्रतिशत मिला. कांग्रेस के पी. एस. प्रसांत को 49,433 वोट मिले, जो 32.31 प्रतिशत थे. दोनों के बीच जीत का अंतर 23,309 वोट का रहा. मुकाबला तीन-कोणीय था, जहां भाजपा के जे. आर. पद्मकुमार 26,861 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे. लगभग 76 प्रतिशत मतदान ने यह दिखाया कि यहां राजनीतिक भागीदारी काफी ऊंची है.
इस परिणाम ने CPI की संगठनात्मक ताकत और शासन आधारित विश्वसनीयता को दोबारा पुष्ट किया. बड़ा अंतर यह संकेत देता है कि यह जीत केवल परंपरा या जड़ता का परिणाम नहीं थी, बल्कि मतदाताओं का विश्वास भी इसमें शामिल था. हालांकि, विपक्ष के कुल वोट यह भी बताते हैं कि शहरी दबाव, महंगाई और बुनियादी ढांचे की समस्याओं के कारण अंदरूनी बेचैनी मौजूद है, लेकिन वह अभी तक एक दिशा में संगठित नहीं हो पाई है.
नेदुमंगड के अर्ध-शहरी क्षेत्र, जो राजधानी के नजदीक हैं, राजनीतिक रूप से सबसे संवेदनशील माने जाते हैं. यहां सड़क की गुणवत्ता, ट्रैफिक जाम, और पानी की सप्लाई चुनावी मूड तय करती है. वहीं खेती वाले और जंगल से सटे इलाकों में जमीन तक पहुंच, कल्याण योजनाओं की निरंतरता और सरकारी सेवाओं की पहुंच ज्यादा अहम होती है. बाजार और परिवहन गलियारे महंगाई और रोजगार की चिंता के संकेतक बनते हैं.
मुख्य मुद्दों में कल्याण योजनाओं की डिलीवरी सबसे ऊपर रहती है. पेंशन, स्वास्थ्य सेवाएं, आवास सहायता, और पीने का पानी जनता की प्राथमिकता में शामिल हैं. सड़कें और सार्वजनिक परिवहन जैसी सुविधाओं की कमी लगातार सरकारों की परीक्षा लेती है. साथ ही जमीन के इस्तेमाल को लेकर विवाद, बढ़ती हाउसिंग मांग और पर्यावरणीय दबाव इस सीट के राजनीतिक विमर्श को और तेज बनाते हैं.
भाजपा की बढ़ती वोट हिस्सेदारी ने मुकाबले को जटिल जरूर किया है, लेकिन अभी तक नतीजों को पलटने की स्थिति नहीं बनी है. भाजपा का उभार विपक्षी वोटों के बंटवारे को प्रभावित करता है, और यही स्थिति अब तक वामपंथ के लिए फायदेमंद रही है. कांग्रेस और भाजपा के बीच विपक्षी वोटों का विभाजन LDF को बढ़त देता रहा है.
नेदुमंगड उन नेताओं को पसंद करता है जो संगठनात्मक अनुशासन के साथ-साथ शासन में सक्रिय हस्तक्षेप भी दिखाएं. यहां उपलब्धता, जवाबदेही और निरंतरता बहुत महत्वपूर्ण है. अगर कोई नेता जनता से कट जाए या केवल चुनाव के समय दिखाई दे, तो यहां के मतदाता इसे जल्दी नोटिस करते हैं और इसका राजनीतिक नुकसान भी तेज़ी से होता है.
नेदुमंगड में वोटिंग का तर्क रोजमर्रा के अनुभवों से बनता है. सड़कें, बसें, पानी के नल और कल्याण कार्यालय यहां राजनीतिक फैसले को भाषणों और बयानबाजी से ज्यादा प्रभावित करते हैं. विचारधारा के प्रति झुकाव बना रहता है, लेकिन वह हमेशा जमीन पर प्रदर्शन की कसौटी पर परखा जाता है. यही वजह है कि यह सीट वामपंथ की पारंपरिक पकड़ के बावजूद लगातार बदलते दबावों और शहरीकरण के प्रभाव में एक सतर्क और मांग करने वाला चुनावी क्षेत्र बनी हुई है.
(ए के शाजी)