वामनपुरम विधानसभा सीट पर वोटिंग का फैसला अक्सर बड़े भाषणों या नारेबाजी से नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी में सरकार के कामकाज से तय होता है. तिरुवनंतपुरम शहर और जिले के ग्रामीण अंदरूनी हिस्सों के बीच स्थित यह सीट अटिंगल लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है. यहां अर्ध-शहरी बस्तियां, खेती वाले इलाके और मजदूरों की घनी आबादी वाले मोहल्ले एक साथ मिलते हैं.
इसी वजह से वामनपुरम की राजनीति जमीन से जुड़ी रहती है, सड़कें ठीक हैं या नहीं, पीने का पानी नियमित आता है या नहीं, मानसून में जल निकासी कैसी रहती है, और सरकारी योजनाओं का लाभ घर-घर तक पहुंच रहा है या नहीं.
वामनपुरम का सामाजिक ढांचा भी इसकी राजनीति को प्रभावित करता है. यहां छोटे व्यापारी, सरकारी कर्मचारी, कृषि परिवार, असंगठित क्षेत्र के मजदूर और लोअर मिडिल-क्लास परिवार पास-पास रहते हैं. हिंदू समुदाय बहुसंख्यक है, लेकिन ईसाई और मुस्लिम आबादी भी अलग-अलग वार्डों में फैली हुई है. जाति की पहचान बनी हुई है, पर मतदान का रुझान धीरे-धीरे वर्गीय स्थिति, रोजगार की सुरक्षा और वेलफेयर योजनाओं पर निर्भरता की ओर बढ़ा है. कामकाजी परिवार, पेंशनर्स, कृषि मजदूर और निम्न मध्यम वर्ग अक्सर एक जैसे मुद्दों पर एक साथ दिखाई देते हैं जिनमें महंगाई नियंत्रण, सार्वजनिक सेवाओं की विश्वसनीयता और सरकारी सहायता की निरंतरता शामल है.
इस सीट पर नागरिक दबाव हमेशा बना रहता है. सड़क मरम्मत, कचरा प्रबंधन, पीने के पानी की सप्लाई, और बारिश के समय जलभराव व ड्रेनेज जैसी समस्याएं यहां रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा हैं. यह शिकायतें चुनावी समय तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि लगातार राजनीतिक फैसले को प्रभावित करती हैं. यहां मतदाता वादों से ज्यादा “फॉलो-थ्रू” देखते हैं. सड़क की मरम्मत में देरी या ड्रेनेज का लंबा समय तक समाधान न होना सीधे राजनीतिक नुकसान में बदल सकता है. यही वजह है कि जनता प्रतिनिधियों से अपेक्षा करती है कि वे सिस्टम के फेल होने पर सीधे हस्तक्षेप करें और मौके पर मौजूद रहें.
वामनपुरम की राजनीतिक संस्कृति में नेतृत्व की उपलब्धता को सबसे ज्यादा महत्व दिया जाता है. नेता का चुनाव के बाद भी सक्रिय रहना, पंचायत और वार्ड-स्तर के नेटवर्क से जुड़े रहना और स्थानीय शिकायतों पर तेजी से प्रतिक्रिया देना यहां निर्णायक माना जाता है. पार्टी संगठन की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन संगठन की पकड़ तभी टिकती है जब जमीन पर शासन का असर दिखे. नागरिक समस्याओं के समय नेतृत्व की गैरमौजूदगी यहां जल्दी नोटिस की जाती है और मतदाता इसे राजनीतिक रूप से दंडित करने में देर नहीं करते.
ऐतिहासिक रूप से यह सीट वामपंथ की ओर झुकी रही है. मजबूत संगठनात्मक ढांचे और मजदूर वर्ग से जुड़े नेटवर्क के चलते CPI(M) ने यहां समय के साथ अपनी पकड़ मजबूत की है. हालांकि कांग्रेस यहां लंबे समय से एक प्रतिस्पर्धी चुनौती रही है. वहीं BJP और सहयोगी दलों ने भी पिछले वर्षों में अपना आधार बढ़ाया है, जिससे मुकाबला तीन-कोणीय बनता गया है. इसके बावजूद अब भी मुख्य मुकाबला वामपंथ और कांग्रेस के बीच ही माना जाता है, जबकि BJP की बढ़ती मौजूदगी विपक्षी वोटों के गणित को जटिल बनाती है.
2021 विधानसभा चुनाव में यह तस्वीर स्पष्ट रूप से सामने आई. CPI(M) उम्मीदवार डी. के. मुरली ने वामनपुरम सीट 73,137 वोटों के साथ जीती, जो कुल वोटों का 49.91 प्रतिशत था. उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार अनाद जयन को हराया, जिन्हें 62,895 वोट यानी 42.92 प्रतिशत मिले. जीत का अंतर 10,242 वोट रहा. यह चुनाव तीन-कोणीय था, जिसमें BDJS उम्मीदवार थझावा सहदेवन तीसरे स्थान पर रहे और उन्हें 5,603 वोट मिले. इस सीट पर मतदान प्रतिशत 73 प्रतिशत से थोड़ा अधिक रहा, जो बताता है कि वामनपुरम में राजनीतिक भागीदारी लगातार मजबूत है और मतदाता शासन के प्रदर्शन पर बारीकी से नजर रखते हैं.
2021 का नतीजा CPI(M) की संगठनात्मक ताकत और शासन के भरोसे को वोट में बदलने की क्षमता को दर्शाता है. हालांकि कांग्रेस का मजबूत प्रदर्शन यह संकेत भी देता है कि यदि सेवा-डिलीवरी कमजोर पड़ती है तो मतदाता विकल्पों के लिए खुले रहते हैं. लेकिन विपक्षी वोटों के बंटवारे के कारण वामपंथ को एकजुट चुनौती नहीं मिल पाती, जिससे उसका कोर फायदा बना रहता है.
इस सीट के चुनावी हॉटस्पॉट अर्ध-शहरी टाउन सेंटर और ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर माने जाते हैं, जहां सड़क, सफाई और पानी की सप्लाई सीधे चुनावी मूड तय करती है. खेती वाले इलाकों में जमीन से जुड़े मुद्दे, खेती की लागत और वेलफेयर की निरंतरता प्राथमिकता रहती है. बाजार क्षेत्र और घनी रिहायशी वार्डों में रोजमर्रा की नागरिक सेवाएं सबसे बड़ा मुद्दा बनती हैं. यहां जीत का अंतर बड़े झटकों से नहीं, बल्कि बूथ-स्तर की संगठन क्षमता, टर्नआउट और सेवा-डिलीवरी के अनुभव से बनता है.
वामनपुरम उन नेताओं को वोट देता है जो संगठनात्मक अनुशासन के साथ जमीन पर शासन का असर दिखा सकें. यहां की राजनीति का केंद्र सड़कें, पानी, ड्रेनेज, पेंशन, स्वास्थ्य सेवाएं, बाढ़ नियंत्रण, सार्वजनिक परिवहन और रोजगार जैसे मुद्दे हैं. विचारधारा का असर बना रहता है, लेकिन वह हर चुनाव में “परफॉर्मेंस” की कसौटी पर परखी जाती है. यही कारण है कि वामनापुरम को एक ऐसा क्षेत्र माना जाता है जहां मतदाता रोजमर्रा के कामकाज के आधार पर सरकार और प्रतिनिधियों को लगातार आंकते रहते हैं.
(ए के शाजी)