कोवलम का मतदान व्यवहार पोस्टकार्ड जैसी खूबसूरत तस्वीरों और रोजमर्रा की असुरक्षाओं के बीच खड़ा दिखाई देता है. दुनिया भर में कोवलम अपनी अर्धचंद्राकार समुद्र तटों और पर्यटन अर्थव्यवस्था के लिए जाना जाता है, लेकिन इसके साथ ही यहां तटीय जीवन की चिंताएं, अस्थायी रोजगार और असमान विकास की समस्याएं भी मौजूद हैं. यहां की राजनीति समुद्र और अंदरूनी इलाकों
के बीच, पर्यटकों के लिए बने ढांचों और स्थानीय लोगों को मिलने वाली बुनियादी सुविधाओं के संघर्ष के बीच चलती है.
राजधानी के पास होने के बावजूद कोवलम का राजनीतिक स्वभाव अलग है. यहां के मतदाता किसी विचारधारा से ज्यादा इस बात को महत्व देते हैं कि उनकी रोजी-रोटी कितनी सुरक्षित है, सरकारी सेवाएं कितनी मिल रही हैं और विकास का फायदा किसे मिल रहा है. पर्यटन की संभावनाओं के साथ यह संदेह भी जुड़ा है कि इससे असल लाभ किन लोगों को मिल रहा है.
कोवलम की राजनीति उसकी भौगोलिक स्थिति से सीधे जुड़ी हुई है. यहां एक ओर तटीय मछुआरा बस्तियां हैं, दूसरी ओर समुद्र किनारे पर्यटन क्षेत्र और अंदरूनी अर्ध-शहरी इलाके हैं. समुद्र तट निवेश और पर्यटकों को आकर्षित करता है, लेकिन साथ ही तटीय कटाव, पर्यावरणीय नुकसान और सरकारी नियम मछुआरों की पारंपरिक आजीविका के लिए खतरा बनते जा रहे हैं.
अंदरूनी इलाके छोटे व्यापार, दिहाड़ी मजदूरी और पर्यटन से जुड़े सेवा क्षेत्र पर निर्भर हैं. इन इलाकों की आपसी कनेक्टिविटी अभी भी असमान है. चमकदार पर्यटन ढांचे और उपेक्षित रिहायशी सुविधाओं का फर्क लोगों की राजनीतिक सोच को प्रभावित करता है.
कोवलम में नागरिक समस्याएं लगातार बनी रहती हैं. पीने के पानी की कमी, मानसून में जलभराव, पर्यटन क्षेत्रों में कचरा प्रबंधन और तटीय निर्माण पर नियंत्रण जैसे मुद्दे रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा हैं. लोग अक्सर कहते हैं कि कोवलम की अंतरराष्ट्रीय छवि और स्थानीय सड़कों, मकानों और सार्वजनिक सुविधाओं की हालत में बड़ा अंतर है.
यहां शासन की विश्वसनीयता बड़े वादों से नहीं, बल्कि त्वरित समाधान से मापी जाती है. सड़क की मरम्मत, कचरा हटाना या समुद्री नुकसान के समय तुरंत मदद, राजनीतिक रूप से ज़्यादा मायने रखती है.
मछली पकड़ना कोवलम की सामाजिक और आर्थिक जिंदगी का केंद्र है. पारंपरिक मछुआरे घटती मछली, बढ़ती ईंधन लागत, तटीय कटाव और मशीन से मछली पकड़ने वाली नावों से प्रतिस्पर्धा का सामना कर रहे हैं. बड़े पर्यटन और तटीय प्रोजेक्ट्स को वे शक की नजर से देखते हैं, क्योंकि इससे विस्थापन और समुद्र तक पहुंच खोने का डर रहता है.
पर्यटन रोजगार तो देता है, लेकिन वह ज्यादातर अस्थायी, मौसमी और कम वेतन वाला होता है. होटल कर्मचारी, विक्रेता, ड्राइवर और मजदूर स्थिरता, सामाजिक सुरक्षा और उचित नियमों की मांग करते हैं. यही तनाव कोवलम की राजनीति की जड़ में है.
कोवलम की सामाजिक संरचना जटिल है. तटीय इलाकों में रहने वाले मछुआरा समुदाय, जिनमें लैटिन कैथोलिक और मुस्लिम आबादी बड़ी संख्या में है, चुनावी नतीजों में निर्णायक भूमिका निभाते हैं. अंदरूनी इलाकों में हिंदू ओबीसी, नाडार समुदाय, दलित और सेवा क्षेत्र से जुड़े प्रवासी मजदूर रहते हैं.
धार्मिक और सामुदायिक पहचान अहम है, लेकिन निर्णायक नहीं. यहां मतदान व्यवहार आजीविका, नेतृत्व की विश्वसनीयता और गठबंधन पर निर्भर करता है। कई संगठित समुदाय होने से कोवलम का चुनावी मुकाबला हमेशा प्रतिस्पर्धी बना रहता है.
कोवलम की राजनीतिक संस्कृति में संवाद और उपलब्धता को बहुत महत्व दिया जाता है. नेताओं से उम्मीद की जाती है कि वे मछुआरा संघों, पर्यटन से जुड़े श्रमिकों, रेजिडेंट एसोसिएशन और स्थानीय निकायों से लगातार संपर्क में रहें. तटीय कटाव, बाढ़ या रोजगार संकट जैसे मामलों में तुरंत प्रतिक्रिया का असर लंबे समय तक रहता है.
कोवलम कभी भी किसी एक पार्टी का गढ़ नहीं रहा. यहां लंबे समय से गठबंधन राजनीति प्रभावी रही है. कांग्रेस को पारंपरिक रूप से तटीय और अल्पसंख्यक समुदायों का समर्थन मिलता रहा है, लेकिन वामपंथी संगठनों और मजबूत स्थानीय नेताओं ने समीकरण को हमेशा जटिल बनाए रखा है.
बीजेपी ने हाल के वर्षों में खासकर अंदरूनी इलाकों में अपनी मौजूदगी बढ़ाई है, जिससे मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है, हालांकि वह अभी निर्णायक ताकत नहीं बन पाई है.
2021 के केरल विधानसभा चुनाव में कोवलम की गठबंधन राजनीति एक बार फिर सामने आई. कांग्रेस उम्मीदवार लेकिन एलडीएफ समर्थित एम. विंसेंट ने 59,447 वोट (करीब 43%) हासिल कर जीत दर्ज की. उन्होंने इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के एन. ए. फौजी को हराया, जिन्हें 44,039 वोट (लगभग 32%) मिले.
बीजेपी उम्मीदवार वी. मुरली को 30,759 वोट (करीब 22%) मिले और वे तीसरे स्थान पर रहे. जीत का अंतर 15,408 वोट का था. लगभग 1.78 लाख मतदाताओं में से करीब 77 प्रतिशत ने मतदान किया, जो केरल की उच्च राजनीतिक भागीदारी को दर्शाता है.
यह नतीजा दिखाता है कि कोवलम किसी एक दल की सीधी राजनीति में नहीं बंधता. मतदाताओं ने पार्टी से ज्यादा गठबंधन और स्थानीय नेतृत्व को महत्व दिया. वहीं बीजेपी का वोट प्रतिशत यह भी बताता है कि पारंपरिक मोर्चों से असंतोष मौजूद है, भले ही वह अभी जीत में न बदला हो.
तटीय मछुआरा इलाकों में तटीय कटाव, बंदरगाह और आजीविका सुरक्षा प्रमुख मुद्दे हैं. पर्यटन क्षेत्रों में कचरा प्रबंधन, नियम और रोजगार की स्थिति अहम है. अंदरूनी अर्ध-शहरी इलाकों में सड़क, पानी और बाजार तक पहुंच पर ध्यान दिया जाता है.
तटीय कटाव, मछुआरों की सुरक्षा और पर्यटन नियंत्रण मुख्य मुद्दे हैं. पीने का पानी, सफाई और सड़कें लंबे समय से चिंता का विषय हैं. महंगाई, अस्थायी रोजगार और सरकारी योजनाओं तक पहुंच भी परिवार स्तर पर वोट को प्रभावित करती है. पर्यावरण संरक्षण एक ऐसा मुद्दा बन चुका है जो आजीविका, विकास और शासन तीनों को जोड़ता है. कोवलम में चुनाव का केंद्र तटीय जीवन की सुरक्षा, पर्यटन से न्यायसंगत विकास, बुनियादी सेवाओं की आपूर्ति और सामुदायिक संतुलन होता है. मतदाता चाहते हैं कि विकास से विस्थापन और असुरक्षा न बढ़े.
कोवलम उन्हीं नेताओं को स्वीकार करता है जो पर्यटन की आकांक्षा और रोजमर्रा की जरूरतों के बीच संतुलन बना सकें, सभी समुदायों से संवाद करें और संकट में तुरंत कार्रवाई करें. यहां विचारधारा से ज्यादा भरोसा और स्थानीय जुड़ाव मायने रखता है.
कोवलम की राजनीति तटीय जीवन की असुरक्षा और विकास के तनाव से बनी है. समुद्र, पर्यटन और गली-मोहल्ले की समस्याएं मिलकर वोट तय करती हैं. यहां मतदाता सुरक्षा, जवाबदेही और संतुलन को सबसे ऊपर रखते हैं, क्योंकि शासन की विफलता का असर तुरंत उनकी जिंदगी पर पड़ता है.
(ए के शाजी)