केरल की राजनीति में चेरथला एक शांत इलाका है. यहां न तो बड़े राजनीतिक उलटफेर होते हैं, न ही कोई ऐसे नेता हैं जो हर समय सुर्खियों में रहें. लेकिन इस शांत माहौल के पीछे एक गहरी सामाजिक और आर्थिक कहानी छिपी है. चेरथला की राजनीति दिखावे से नहीं, बल्कि मेहनत, रोजगार और लोगों की सामूहिक यादों से जुड़ी हुई है.
हिस्सा चेरथला समुद्र और बैकवॉटर के बीच बसा हुआ है. यहां की जिंदगी मछली पकड़ने, कोयर उद्योग, छोटी फैक्ट्रियों, मजदूर यूनियनों और सहकारी संस्थाओं के इर्द-गिर्द घूमती है. इसलिए यहां के लोगों के लिए राजनीति का मतलब है- कौन उनके साथ संकट केसमय खड़ा है.
यहां की भौगोलिक स्थिति भी राजनीति को प्रभावित करती है. तटीय इलाका होने के कारण बाढ़, समुद्र का कटाव और खारे पानी की समस्या आम है. मछुआरे मौसम और ईंधन के दामों से परेशान रहते हैं. कोयर उद्योग में काम करने वाले मजदूरों ने शुरू से ही संगठित होकर अपने हक के लिए लड़ना सीखा. इसी वजह से यहाँ वामपंथी दलों की जड़ें मजबूत रहीं.
सामाजिक रूप से चेरथला में एझावा समुदाय सबसे बड़ा समूह है, जो परंपरागत रूप से मजदूर आंदोलन और सहकारी व्यवस्था से जुड़ा रहा है. ईसाई समुदाय, खासकर तटीय मछुआरे, अपने जीवन और रोजगार की सुरक्षा को देखकर वोट करते हैं. मुस्लिम समुदाय व्यापार और सेवाओं से जुड़ा है और आम तौर पर कांग्रेस के साथ रहता है. अनुसूचित जाति और गरीब वर्ग सरकार की योजनाओं और सहायता को देखकर फैसला करते हैं. इस संतुलन के कारण यहां साम्प्रदायिक तनाव बहुत कम देखने को मिलता है.
राजनीतिक रूप से चेरथला लंबे समय से वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) का गढ़ रहा है. यहां लोग सरकार बदलने के बजाय कामकाज का हिसाब लेते हैं. नाराजगी हो तो भी वह धीरे-धीरे वोटों के अंतर में दिखती है, न कि अचानक सत्ता पलटने में.
2021 के विधानसभा चुनाव में भी यही देखने को मिला. CPI के उम्मीदवार पी. प्रसाद ने जीत दर्ज की, लेकिन अंतर बहुत बड़ा नहीं था. इसका मतलब यह था कि लोग सरकार से सवाल भी कर रहे थे, पर भरोसा भी बनाए हुए थे. भाजपा यहां बहुत पीछे रही, क्योंकि चेरथला की राजनीति भावनाओं और ध्रुवीकरण से नहीं, बल्कि जमीनी मुद्दों से चलती है.
आज चेरथला के सामने नई चुनौतियां हैं - कोयर उद्योग का कमजोर होना, मछली की घटती उपलब्धता, पर्यावरण प्रदूषण, तटीय कटाव और युवाओं का बाहर जाना. आने वाले समय में ये मुद्दे राजनीति को और प्रभावित करेंगे.
कुल मिलाकर, चेरथला में चुनाव न तो डर से होते हैं, न ही जोश से. यहां लोग अपने अनुभव के आधार पर वोट करते हैं. वे भाषणों से ज्यादा काम देखते हैं, नारों से ज्यादा राहत और वादों से ज्यादा भरोसेमंद शासन को महत्व देते हैं. इसीलिए कहा जाता है कि चेरथला में चुनाव कोई तूफान नहीं, बल्कि एक शांत लेकिन गंभीर हिसाब-किताब होते हैं.
(K. A. Shaji)