कुट्टनाड समुद्र तल से नीचे बसा हुआ है. यहां राजनीति कोई सपना या भावनात्मक मुद्दा नहीं, बल्कि सीधे-सीधे जिंदगी से जुड़ा सवाल है. यहां सरकार सिर्फ कागजों में नहीं, समाजिक ढांचा में महसूस की जा सकती है. अलप्पुझा लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा कुट्टनाड केरल के सबसे संवेदनशील इलाकों में से एक है. चारों ओर पानी है. वही पानी जीवन भी देता है और संकट भी बनता
है. इसलिए यहां विचारधारा से ज्यादा यह देखा जाता है कि फसल बची या नहीं, जमीन टिकी रही या नहीं और नुकसान के बाद सरकार ने कितनी जल्दी मदद की.
कुट्टनाड दुनिया के उन गिने-चुने इलाकों में है जहां समुद्र तल से नीचे खेती होती है. धान के खेतों को मिट्टी के बांध, नहरें और पंप बचाते हैं. जरा-सी चूक पूरी फसल बर्बाद कर सकती है. बाढ़, खारा पानी और मौसम की मार यहां खेती को बहुत जोखिम भरा बना चुकी है. इसलिए यहां की राजनीति कामकाज और व्यवस्था पर टिकी होती है, भाषणों पर नहीं.
यहां के समाज में छोटे किसान, खेत मजदूर, मछुआरे, कोयर उद्योग से जुड़े लोग, ताड़ी निकालने वाले, दलित, पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यक समुदाय रहते हैं. सबकी जिंदगी एक-दूसरे पर और पानी के नियंत्रण पर निर्भर है. बाढ़ आने पर धर्म या जाति पीछे छूट जाती है, और पेट तथा रोजगार सबसे बड़ा सवाल बन जाता है.
कुट्टनाड का इतिहास कम्युनिस्ट आंदोलन से गहराई से जुड़ा है. यहीं से मजदूरों और किसानों ने जमीन, मजदूरी और अधिकारों के लिए संगठित संघर्ष किया. यूनियन, सहकारी समितियां और किसान संगठन आज भी यहां की राजनीति की रीढ़ हैं. इसलिए यहां नेता को उसके भाषण से नहीं, बल्कि इस बात से परखा जाता है कि वह बांधों की मरम्मत, फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य, बाढ़ राहत और सरकारी दफ्तरों में काम कितनी ईमानदारी से करवा पाता है.
2021 के विधानसभा चुनाव में भी यही सोच दिखी. एलडीएफ के उम्मीदवार थॉमस के. थॉमस ने जीत दर्ज की, क्योंकि लोगों ने बाढ़, कोरोना और फसल नुकसान के समय सरकार की कार्यप्रणाली को ज्यादा भरोसेमंद माना. यहां नाटकीय राजनीति या भावनात्मक मुद्दों की जगह स्थिर और काम करने वाली व्यवस्था को प्राथमिकता दी जाती है.
आज भी कुट्टनाड जलवायु परिवर्तन, बढ़ती लागत और युवाओं के पलायन जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है. इसलिए लोगों की उम्मीदें सरकार से और बढ़ गई हैं. वे ऐसे प्रतिनिधि चाहते हैं जो फाइलों, योजनाओं और अफसरशाही को समझते हों और संकट के समय मैदान में मौजूद रहें.
कुट्टनाड में वोट भावनाओं से नहीं, अनुभव और भरोसे से पड़ता है. यहां लोग नारे नहीं, समाधान देखते हैं. जिस तरह यह इलाका पानी को संभालकर जीता है, उसी तरह सोच-समझकर अपने नेता चुनता है. यहां चुनाव उत्सव नहीं, बल्कि जीवन को सुरक्षित रखने का एक जरूरी फैसला होते हैं.
(K. A. Shaji)