कुन्नाथूर विधानसभा क्षेत्र आम तौर पर ज्यादा शोर नहीं मचाता, लेकिन चुनावों में अपना फैसला साफ और मजबूत तरीके से देता है. यह कोल्लम जिले के पूर्वी हिस्से में स्थित है और कोल्लम लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है. यहां की भौगोलिक बनावट नहरों, दलदली जमीन, धान के खेतों और घनी बस्तियों से बनी है, जहां लोगों का रोजमर्रा का जीवन सरकार की योजनाओं और प्रशासन से
सीधे जुड़ा रहता है. इसलिए यहां राजनीति बड़े नारों या विचारधाराओं से नहीं, बल्कि लोगों के दैनिक अनुभवों से तय होती है.
कुन्नाथूर के मतदाता सरकार को इस बात से परखते हैं कि बुजुर्गों को पेंशन समय पर मिल रही है या नहीं, गर्मियों में पीने का पानी उपलब्ध है या नहीं, बरसात में बाढ़ से कितना नुकसान हुआ और राहत कितनी जल्दी मिली, अस्पतालों तक पहुंच कितनी आसान है और सरकारी दफ्तरों में काम कितनी तेजी से होता है. इसलिए यहां चुनाव विश्वास, काम की निरंतरता और स्थानीय स्तर पर समस्याओं के समाधान की क्षमता पर निर्भर करते हैं.
यह इलाका पानी से घिरा हुआ है. सस्थमकोट्टा झील, जो केरल की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील है, इस क्षेत्र का केंद्र है. पीने के पानी की आपूर्ति, झील की सफाई, प्रदूषण और संरक्षण से जुड़े मुद्दे अक्सर राजनीतिक चर्चा का विषय बनते हैं, खासकर गर्मियों में जब पानी की कमी होती है. धान की खेती भले ही आज उतनी लाभकारी न हो, लेकिन यह अब भी लोगों की पहचान, जमीन के इस्तेमाल और राजनीति को प्रभावित करती है.
यहां समाज विविध है, जिसमें हिंदू बहुसंख्यक हैं, साथ ही मुस्लिम और ईसाई समुदाय भी अच्छी संख्या में हैं. यह अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट है, इसलिए दलित मतदाता भी राजनीतिक रूप से जागरूक और सक्रिय हैं. उच्च साक्षरता, मजबूत पार्टी संगठन और सहकारी संस्थाओं के कारण यहां के लोग राजनीति को समझते हैं और भावनाओं से ज्यादा संगठन और काम के आधार पर वोट करते हैं.
कुन्नाथूर में लोग स्थिरता चाहते हैं, लेकिन काम के साथ. यहां के प्रतिनिधियों से उम्मीद होती है कि वे बाढ़, सूखा, पेंशन, जमीन के विवाद और इलाज जैसी समस्याओं में तुरंत मदद करें और सरकारी कामकाज में रास्ता दिखाएं. 2021 के विधानसभा चुनाव में यहां कड़ा मुकाबला देखने को मिला, जिसमें वामपंथी समर्थित उम्मीदवार को थोड़े से अंतर से जीत मिली. इससे यह पता चलता है कि यहां हर बूथ और हर स्थानीय मुद्दे का असर पड़ता है.
कुन्नाथूर में लोग वही नेता पसंद करते हैं जो चुपचाप लेकिन लगातार काम करें, कल्याणकारी योजनाएं ठीक से चलाएं, पानी और पर्यावरण की रक्षा करें और संकट के समय साथ खड़े रहें. यहां चुनावी नतीजे बड़े भाषणों से नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के प्रशासन और लोगों के जीवन में दिखने वाले काम से तय होते हैं.
(K. A. Shaji)