पुथुप्पल्ली सिर्फ एक विधानसभा क्षेत्र नहीं है, बल्कि केरल की राजनीति में एक भावना है. यह सीट दशकों तक ओमन चांडी के नाम से जुड़ी रही. उनकी राजनीति लोगों के दुख-दर्द समझने, हर समय उपलब्ध रहने और व्यक्तिगत भरोसे पर आधारित थी. उनके निधन के बाद भी जनता से उनका रिश्ता खत्म नहीं हुआ है. यही कारण है कि पुथुप्पल्ली उन गिनी-चुनी सीटों में है, जहां यादें
आज भी राजनीति को दिशा देती हैं.
कोट्टायम लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा पुथुप्पल्ली, कोट्टायम शहर की शहरी व्यवस्था और ग्रामीण इलाकों की कृषि जीवनशैली के बीच स्थित है. यहां की राजनीति न तो बहुत उग्र है और न ही अचानक बदलने वाली. यहां निरंतरता, पहचान और नेता की व्यक्तिगत मौजूदगी सबसे अहम मानी जाती है. चुनाव यहां सिर्फ मुकाबला नहीं होते, बल्कि जनता के आत्ममंथन का समय होते हैं.
पुथुप्पल्ली गांवों, चर्च-केंद्रित बस्तियों, खेती वाले इलाकों और अर्ध-शहरी विस्तार से बना है. यहां की अर्थव्यवस्था रबर की खेती, छोटी कृषि, व्यापार, सेवा क्षेत्र और विदेशों से आने वाली कमाई पर निर्भर है. यहां के लोग बड़े प्रयोगों से ज्यादा स्थिरता चाहते हैं. राजनीति में भी यही सोच दिखाई देती है.
इस क्षेत्र की सामाजिक संरचना बहुत जुड़ी हुई है. नेता से उम्मीद की जाती है कि वह रोजमर्रा के जीवन में मौजूद रहे, मुश्किल समय में दिखे और आम लोगों तक सीधे पहुंचे. जो नेता दूर रहता है, उसे नकार दिया जाता है, और जो पास रहता है, उसे अपनाया जाता है.
ईसाई समुदाय पुथुप्पल्ली में सामाजिक और राजनीतिक रूप से बहुत मजबूत है, खासकर सीरियन ईसाई परिवार. लेकिन उनकी राजनीति संगठन से ज्यादा व्यक्तिगत भरोसे पर टिकी रही है.
एझावा समुदाय भी एक बड़ा वर्ग है, जो खेती, मजदूरी और सेवा क्षेत्रों में सक्रिय है. उनका वोट अब सरकारी योजनाओं और स्थानीय नेता की सक्रियता से ज्यादा प्रभावित होता है. नायर समुदाय भूमि स्वामित्व, पेशेवर वर्ग और मंदिरों से जुड़े नेटवर्क के कारण प्रभावशाली है. वे विचारधारा से ज्यादा उम्मीदवार की योग्यता और कामकाज को देखते हैं.
मुस्लिम समुदाय संख्या में कम है, लेकिन व्यापार और समाज में अच्छी तरह जुड़ा हुआ है. आमतौर पर उनका झुकाव यूडीएफ की ओर रहा है.
अनुसूचित जाति और अन्य वंचित समुदाय चुनाव के अंतर को तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं. उनके लिए योजनाओं का लाभ, सम्मानजनक व्यवहार और मूलभूत सुविधाएँ बहुत मायने रखती हैं.
पुथुप्पल्ली में राजनीति संगठन या विचारधारा से ज्यादा व्यक्ति पर आधारित रही है. ओमन चांडी की राजनीति लोगों से सीधे जुड़ने, शिकायतें सुनने और भावनात्मक रूप से उपलब्ध रहने की थी. इसी वजह से यहां मतदाता आसानी से अपना भरोसा नहीं बदलते. नए नेताओं को पुराने मानकों पर ही परखा जाता है.
2023 का उपचुनाव पुथुप्पल्ली के लिए भावनात्मक क्षण था. यह चुनाव पार्टी से ज्यादा विरासत और भरोसे का था. ओमन चांडी के बेटे चांडी ओमन ने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतकर 80,144 वोट हासिल किए. सीपीआई(एम) के जैक सी थॉमस को 42,425 वोट मिले, जबकि भाजपा तीसरे स्थान पर रही.
37,719 वोटों का अंतर इस सीट के इतिहास में सबसे बड़ा था. लगभग 73% मतदान हुआ, जो जनता की भावनात्मक भागीदारी दिखाता है. यह जीत विचारधारा से ज्यादा भरोसे और परंपरा की जीत मानी गई.
ग्रामीण इलाकों में चर्च और गांव आधारित नेटवर्क राजनीति को प्रभावित करते हैं. किसानों के लिए रबर के दाम, खेती की आय और मजदूरों की उपलब्धता अहम मुद्दे हैं. अर्ध-शहरी क्षेत्रों में युवा वर्ग, रोजगार और पलायन जैसे मुद्दे धीरे-धीरे उभर रहे हैं.
यहां नेता की ईमानदारी, संवेदनशीलता और उपलब्धता सबसे अहम है. सिर्फ भाषण या विचारधारा से वोट नहीं मिलते. लोगों को यह देखना होता है कि नेता मुश्किल समय में साथ खड़ा है या नहीं.
यहां के मतदाता भरोसे पर वोट करते हैं. वे बदलाव से ज्यादा निरंतरता चाहते हैं और प्रतिनिधि से व्यक्तिगत जुड़ाव की उम्मीद रखते हैं.
यहां की अर्थव्यवस्था में रबर खेती, कृषि, व्यापार, सेवाएं, विदेशी कमाई का प्रमुख स्थान है.आज पुथुप्पल्ली बदलाव के दौर से गुजर रहा है. नई पीढ़ी और पुरानी यादें साथ-साथ चल रही हैं. यहां बदलाव अचानक नहीं होगा, बल्कि धीरे-धीरे होगा. पुथुप्पल्ली यह दिखाता है कि केरल की राजनीति सिर्फ विचारधारा से नहीं, बल्कि यादों, संवेदनशीलता और भरोसे से भी चलती है.
(K. A. Shaji)