पूंजर विधानसभा क्षेत्र शायद ही कभी सामान्य राजनीतिक रूटीन को चुपचाप स्वीकार करता है. केरल के मध्यवर्ती इलाकों और ऊंची पहाड़ियों के बीच स्थित यह क्षेत्र एक सीमांत समाज जैसा राजनीतिक स्वभाव रखता है- आत्मविश्वासी, मुखर और अपनी पहचान को लेकर बेहद सजग. यहां चुनाव किसी अमूर्त विचारधारा से कम और जमीन, धर्म, नेतृत्व की शैली तथा इस बात से ज्यादा तय होते
हैं कि कठिन आर्थिक और राजनीतिक समय में कौन जनता के साथ खड़ा रहा. कोट्टायम जिले में स्थित और कोट्टायम लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा होने के कारण पूंजर लंबे समय से ऐसा निर्वाचन क्षेत्र माना जाता रहा है जहां पार्टी से अधिक व्यक्तित्व की राजनीति प्रभावी रहती है.
भौगोलिक रूप से पूंजर ढलानदार जमीन, घने रबर के बागानों और इडुक्की की पहाड़ियों की ओर फैली बस्तियों से घिरा है. कृषि यहां की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, जिसमें रबर मुख्य फसल है और काली मिर्च व छोटी खेती सहायक भूमिका निभाती हैं. रबर के दामों में उतार-चढ़ाव, परिवारों की आर्थिक सुरक्षा, कर्ज चुकाने की क्षमता और बच्चों की पढ़ाई तक को प्रभावित करता है. कई बार तो इसका असर गिरजाघरों, सहकारी बैंकों और बाजारों तक फैल जाती है. यही कारण है कि पूंजर के लोग आर्थिक संकेतों के प्रति बेहद संवेदनशील और राजनीतिक रूप से सतर्क रहते हैं.
सामाजिक संरचना में सीरियन ईसाई बसने वालों का दबदबा है, जिनका प्रवासन दशकों पहले मध्य त्रावणकोर से हुआ था. भूमि, चर्च, स्कूल, सहकारी बैंक और व्यापार नेटवर्क पर उनकी मजबूत पकड़ रही है, जिसके चलते ऐतिहासिक रूप से यह क्षेत्र यूडीएफ और केरल कांग्रेस के प्रभाव में रहा. लेकिन इनके भीतर भी वर्गीय और पीढ़ीगत मतभेद तथा संप्रदायिक विभाजन समय-समय पर राजनीतिक एकता को तोड़ते रहे हैं. एझवा समुदाय, विशेषकर अर्ध-ग्रामीण और बागान क्षेत्रों में, एक निर्णायक शक्ति है और एसएनडीपी योगम के माध्यम से संगठित होकर कल्याणकारी नीतियों और भरोसेमंद नेतृत्व के आधार पर अपना रुख तय करता है. एरट्टुपेट्टा और आसपास के इलाकों में मुस्लिम समुदाय छोटे लेकिन संगठित रूप में मौजूद है, जिनकी राजनीति सुरक्षा, सामाजिक सौहार्द और रोज़गार से जुड़ी स्थिरता से प्रभावित रहती है. अनुसूचित जाति और अन्य हाशिए के समुदाय कल्याण योजनाओं और सामाजिक सुरक्षा के आधार पर धीरे-धीरे एलडीएफ की ओर झुकते रहे हैं.
लंबे समय तक पूंजर की राजनीति पी. सी. जॉर्ज के व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द घूमती रही. उनका आक्रामक और टकराव वाला अंदाज, बार-बार दल बदलना और खुद को बसने वाले समुदायों का अकेला रक्षक बताना, एक दौर तक लोकप्रिय रहा. लेकिन जब उनका रुख खुले तौर पर सांप्रदायिक मुद्दों, विशेषकर “लव जिहाद” जैसे विवादास्पद बयानों की ओर गया और भाजपा के करीब दिखने लगा, तो मतदाताओं में असंतोष बढ़ा. सामाजिक रूप से संवेदनशील इस क्षेत्र में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को स्वीकार नहीं किया गया.
2021 के विधानसभा चुनाव में यही असंतोष निर्णायक रूप से सामने आया. एलडीएफ समर्थित केरल कांग्रेस (एम) के सेबास्टियन कुलाथुंकल ने पी. सी. जॉर्ज को भारी अंतर से हराया. यह परिणाम केवल व्यक्ति विशेष की हार नहीं था, बल्कि यह संकेत था कि पूंजर अब भड़काऊ राजनीति के बजाय स्थिरता, कल्याणकारी शासन और सामाजिक संतुलन को प्राथमिकता दे रहा है.
कुल मिलाकर, पूंजर ऐसे नेतृत्व को पसंद करता है जो मजबूत हो लेकिन अहंकारी नहीं, मुखर हो लेकिन विभाजनकारी नहीं. रबर किसानों की चिंता, सहकारी संस्थाओं की स्थिरता, स्वास्थ्य और शिक्षा की पहुंच, और सामाजिक सौहार्द- ये सभी मिलकर यहां के मतदाताओं का मन बनाते हैं. इसलिए पूंजर आदत से नहीं, अनुभव से वोट करता है, याद रखता है, परखता है और जरूरत पड़ने पर अपना फैसला बदलने से नहीं हिचकता.
(K. A. Shaji)