कायमकुलम ऐसा विधानसभा क्षेत्र नहीं है जहां राजनीति सिर्फ चुनाव के समय दिखाई दे. यहां राजनीति रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है- वार्ड कमेटियों की बैठकों में, राशन की दुकानों की लाइनों में, सहकारी दफ्तरों में, ट्रेड यूनियनों में और मोहल्लों की छोटी-छोटी समस्याओं में. यहां के लोग यह देखते हैं कि सरकार आम लोगों तक कितनी सही तरह से सुविधाएं पहुंचा
रही है, संकट के समय प्रशासन कैसा काम कर रहा है और चुना हुआ प्रतिनिधि चुनाव के बाद कितना सक्रिय रहता है.
अलप्पुझा जिले में स्थित और अलप्पुझा लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा कायमकुलम समुद्र के पास होते हुए भी सिर्फ मछुआरों का इलाका नहीं है. यह न पूरी तरह शहरी है, न ही पूरी तरह ग्रामीण. यहां मजदूर वर्ग, व्यापार, परिवहन, सेवा क्षेत्र और सहकारी संस्थाओं का बड़ा नेटवर्क है. इसी वजह से यहाँ के मतदाता राजनीतिक रूप से काफी जागरूक और सवाल पूछने वाले हैं.
यहां महंगाई, ईंधन के दाम, परिवहन की समस्या, इलाज का खर्च, रोजगार की अनिश्चितता जैसे मुद्दे सीधे राजनीति को प्रभावित करते हैं. साथ ही, जलभराव, तटीय कटाव और जल निकासी जैसी पर्यावरण से जुड़ी समस्याएं भी सरकार से तेज और असरदार कार्रवाई की उम्मीद बढ़ाती हैं.
कायमकुलम में राजनीति संगठनों के जरिए चलती है. पार्टी शाखाएं, यूनियनें, रेजिडेंट्स एसोसिएशन और सहकारी संस्थाएं लोगों और नेताओं के बीच लगातार संपर्क बनाए रखती हैं. इसलिए यहां मुकाबला ज्यादातर एलडीएफ और यूडीएफ के बीच ही रहता है और नतीजे अक्सर कड़े होते हैं.
2021 के विधानसभा चुनाव में भी यही देखने को मिला. एलडीएफ की उम्मीदवार एडवोकेट यू. प्रतिभा ने करीब 6,300 वोटों के अंतर से जीत हासिल की, लेकिन मुकाबला काफी करीबी रहा. मतदान प्रतिशत भी लगभग 79.5% रहा, जो बताता है कि यहां के लोग चुनाव को लेकर कितने सजग हैं.
कायमकुलम में लोग बड़े-बड़े भाषणों से ज्यादा काम को महत्व देते हैं. बाढ़, तटीय संकट, अस्पतालों की सुविधा, पेंशन और अन्य कल्याणकारी योजनाओं के समय जो नेता जमीन पर दिखाई देता है, वही भरोसा जीतता है. यहां वोट आदत से नहीं, बल्कि अनुभव और काम के आधार पर दिया जाता है.
कायमकुलम जीत उसी की होती है जो लगातार मौजूद रहे, समस्याओं को समझे और उन्हें हल कराने की कोशिश करे. यही वजह है कि यहां चुनावी मुकाबले हमेशा रोचक और कड़े बने रहते हैं.
(K. A. Shaji)