एट्टुमनूर सिर्फ एक मंदिर नगरी नहीं, बल्कि संगठित श्रम, अनुशासित राजनीति और निरंतरता के भरोसे से बनी एक विधानसभा सीट है. महादेव मंदिर इसे सांस्कृतिक पहचान देता है, लेकिन इसकी राजनीतिक पहचान पूजा स्थलों से नहीं, बल्कि कारखानों, निर्माण स्थलों, ट्रेड यूनियनों और मेहनतकश बस्तियों से बनी है. यहां की राजनीति दिखावे वाली नहीं, बल्कि जमीनी, व्यावहारिक
और लगातार काम करने वाली रही है. कोट्टायम लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाला एट्टुमनूर पारंपरिक केरल के मध्य क्षेत्र और तेजी से शहरी होते इलाकों के बीच स्थित है. यहां चुनाव किसी तूफानी बदलाव का संकेत नहीं होते, बल्कि सरकार के कामकाज का मूल्यांकन माने जाते हैं.
एट्टुमनूर की भौगोलिक बनावट भी इसकी राजनीति जैसी ही है. मंदिरों के आसपास बसे कस्बों के साथ छोटे उद्योग, परिवहन मार्ग, निर्माण क्षेत्र और आवासीय कॉलोनियां यहां की अर्थव्यवस्था का आधार हैं. पास ही कोट्टायम शहर होने के कारण शहरीकरण तेजी से बढ़ा है, जिससे सड़क, परिवहन, स्वास्थ्य सुविधाएं और रोजगार जैसे मुद्दे राजनीतिक विमर्श के केंद्र में रहते हैं. यहां की राजनीति प्रतीकों से ज्यादा प्रशासनिक दक्षता और सेवा वितरण पर आधारित है.
सामाजिक रूप से एट्टुमनूर में एझावा समुदाय की बड़ी उपस्थिति है, जिसका ऐतिहासिक जुड़ाव वामपंथी राजनीति से रहा है. ट्रेड यूनियन आंदोलन, सहकारी संस्थाएं और सामाजिक सुधार आंदोलनों ने इस जुड़ाव को मजबूत किया. नायर समुदाय भी कुछ क्षेत्रों में प्रभावशाली है, जो अब जातिगत परंपरा से ज्यादा शासन की गुणवत्ता को महत्व देता है. ईसाई समुदाय व्यापार, शिक्षा और सेवा क्षेत्रों में सक्रिय है और उनका वोट विकास और उम्मीदवार की विश्वसनीयता पर निर्भर करता है. मुस्लिम समुदाय संख्या में कम होने के बावजूद व्यापार से जुड़ा है और उनका रुझान आमतौर पर यूडीएफ की ओर रहा है, हालांकि अब स्थानीय नेतृत्व और गठबंधन की स्पष्टता उनके निर्णय को प्रभावित करती है. अनुसूचित जाति और श्रमिक वर्ग की बस्तियों में रहने वाले लोग आवास, स्वास्थ्य, कल्याण योजनाओं और सम्मानजनक प्रशासन को अहम मानते हैं.
एट्टुमनूर लंबे समय से वामपंथ, खासकर सीपीआई(एम), का मजबूत गढ़ रहा है. यहां उनकी ताकत किसी एक नेता के करिश्मे पर नहीं, बल्कि संगठन, कैडर नेटवर्क, ट्रेड यूनियनों और स्थानीय निकायों के निरंतर काम पर टिकी है. सड़क, अस्पताल, आवास और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के माध्यम से शासन की मौजूदगी लोगों के जीवन में महसूस होती है.
2021 के विधानसभा चुनाव में भी यह रुझान कायम रहा. लगभग 75 प्रतिशत मतदान के साथ सीपीआई(एम) के वी. एन. वासवन ने स्पष्ट जीत दर्ज की. उन्होंने कांग्रेस समर्थित केरल कांग्रेस उम्मीदवार को बड़े अंतर से हराया, जबकि भाजपा तीसरे स्थान पर रही. यह परिणाम संगठनात्मक मजबूती और जमीनी समर्थन को दर्शाता है.
यहां के मतदाता रोजगार की सुरक्षा, बुनियादी ढांचे, सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं और कल्याण योजनाओं को सबसे ज्यादा महत्व देते हैं. तेजी से बढ़ते शहरी इलाकों में नई आबादी और प्रवासी मजदूरों की जरूरतें भी राजनीति को प्रभावित कर रही हैं.
कुल मिलाकर, एट्टुमनूर एक ऐसा क्षेत्र है जहां राजनीति शोर से नहीं, बल्कि निरंतर काम, संगठन और भरोसे से चलती है. यहां बदलाव अचानक नहीं आते, बल्कि धीरे-धीरे, प्रशासनिक प्रदर्शन और लोगों के रोजमर्रा के अनुभवों के आधार पर होते हैं. यही कारण है कि एट्टुमनूर केरल की उन सीटों में गिना जाता है जहां स्थिरता, अनुशासन और जमीनी जुड़ाव ही चुनावी सफलता की असली कुंजी है.
(K. A. Shaji)