कोन्नी एक ऐसा विधानसभा क्षेत्र है जहां की राजनीति जंगल, जंगली जानवरों और सरकार की मौजूदगी से गहराई से जुड़ी हुई है. यह केरल के पथानामथिट्टा जिले के पूर्वी मध्य भाग में स्थित है और यहां के लोग रोजमर्रा के खतरों के साथ जीवन जीते हैं, जैसे हाथियों का गांवों में घुस आना, फसलों का नष्ट होना और जंगलों के कारण सड़कों से कट जाना. यहां वोट डालने का
फैसला किसी बड़े वैचारिक मुद्दे या भावनात्मक नारों से नहीं, बल्कि रोज की परेशानियों से तय होता है. इसलिए कोन्नी का मतदाता अतीत की यादों से नहीं, बल्कि मौजूदा जरूरतों और तुरंत समाधान की सोच से वोट देता है.
कोन्नी पथानामथिट्टा जिले में है और पथानामथिट्टा लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है. यहां दुनिया के सबसे प्रसिद्ध तीर्थ स्थलों में से एक सबरीमला मंदिर भी स्थित है, फिर भी दिलचस्प बात यह है कि यहां की राजनीति लगातार धार्मिक ध्रुवीकरण की ओर नहीं गई. धर्म यहां के सामाजिक जीवन का हिस्सा जरूर है, लेकिन चुनावी फैसले ज्यादा तर सरकार के कामकाज, प्रशासन की सक्रियता और जमीनी समस्याओं के समाधान पर आधारित होते हैं, न कि सिर्फ धार्मिक भावनाओं के उभार पर.
इस क्षेत्र की भौगोलिक बनावट घने जंगलों और उबर-खाबर वाली जमीन से बनी है. रबर की खेती, बसाहट वाली कृषि और प्लांटेशन से जुड़े मजदूर यहां की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं. कई गांव हाथियों के रास्तों और जंगल की सीमाओं से सटे हैं, इसलिए इंसान और जंगली जानवरों का टकराव यहां कोई कभी-कभार होने वाली बात नहीं, बल्कि रोजमर्रा की सच्चाई है. जंगली सूअरों और हाथियों से फसलें बर्बाद होना, घरों को नुकसान पहुंचना और लोगों की जान को खतरा बने रहना आम बात है. जंगल के रास्तों से गुजरने वाली सड़कों की हालत, सोलर फेंसिंग, रात की गश्त और समय पर मुआवज़ा मिलना यहां की राजनीति के मुख्य मुद्दे हैं. जंगल यहां रोजगार का साधन भी है और साथ ही असुरक्षा का एहसास भी, इसलिए लोग सरकार की मजबूत मौजूदगी चाहते हैं.
यहां की आबादी में मध्य त्रावणकोर से आए हिंदू, एझावा समुदाय (जहां एसएनडीपी का प्रभाव है), और खेती, व्यापार व छोटे व्यवसाय से जुड़े ईसाई परिवार शामिल हैं. अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोग जंगल के किनारे और प्लांटेशन क्षेत्रों में रहते हैं, जो वन्यजीवों के खतरे और जमीन की अनिश्चितता से सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं. यहां राजनीति पहचान की राजनीति से कम और कल्याण योजनाओं व सरकारी मदद तक पहुंच से ज्यादा जुड़ी है. वाम दलों की संगठनात्मक मजबूती और सरकारी योजनाओं की पहुंच ने उन्हें स्थिर समर्थन दिलाया है, जबकि कांग्रेस को कुछ वर्गों, खासकर सेवा क्षेत्र और ईसाई समुदाय के हिस्सों में समर्थन मिलता रहा है.
कोन्नी के मतदाता नेता को उसके भाषणों से नहीं, बल्कि उसकी मौजूदगी से परखते हैं. जब हाथी का हमला हो, फसल नष्ट हो जाए या कोई संकट आए, तो विधायक से उम्मीद की जाती है कि वह तुरंत वन विभाग, राजस्व विभाग और पुलिस से बात करे और बिना देरी के मुआवजा दिलाए. संकट के समय मैदान में दिखना यहां भाषण देने से कहीं ज्यादा मायने रखता है. इसी वजह से वामपंथी सरकारों को यहाँ अक्सर भरोसेमंद माना गया है, क्योंकि उन्हें प्रशासन और कल्याणकारी तंत्र तक सीधी पहुंच वाला समझा जाता है.
2021 के विधानसभा चुनाव में भी कोन्नी ने शासन और कामकाज को प्राथमिकता दी. वाम लोकतांत्रिक मोर्चे के उम्मीदवार और सीपीआई(एम) के के. यू. जेनिश कुमार ने 62,318 वोट पाकर कांग्रेस के रॉबिन पीटर (53,810 वोट) को 8,508 मतों से हराया. भाजपा ने सबरीमला की मौजूदगी को देखते हुए यहां बड़ी उम्मीदें लगाई थीं और धार्मिक भावनाओं को उभारने की कोशिश की, लेकिन उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिली और वह तीसरे स्थान पर ही रही. इससे साफ हुआ कि कोन्नी में धार्मिक प्रतीकवाद से ज्यादा महत्व शासन, संकट प्रबंधन और कल्याणकारी योजनाओं को मिलता है.
यहां चुनाव जीतने के लिए जरूरी है कि नेता जंगली जानवरों से जुड़े मामलों में तुरंत कार्रवाई करे, मुआवजा दिलाने में तेजी दिखाए और प्रशासनिक दफ्तरों तक लोगों की पहुंच आसान बनाए. पेंशन, आवास, सड़क, स्वास्थ्य और आपदा राहत जैसी योजनाएं लोगों के राजनीतिक भरोसे को तय करती हैं. कुल मिलाकर कोन्नी एक ऐसा क्षेत्र है जहां लोग सुरक्षा, सरकार की मौजूदगी और काम के आधार पर वोट देते हैं. धार्मिक भावनाओं से ज्यादा यहां रोजमर्रा की जिंदगी की सच्चाइयां और तुरंत मदद मिलने की उम्मीद चुनावी फैसलों को दिशा देती हैं.
(K. A. Shaji)