अलप्पुझा विधानसभा क्षेत्र पानी पर बसा हुआ इलाका है. इसके एक तरफ अरब सागर और दूसरी तरफ वेम्बनाड झील की बैकवॉटर है. यहां की जिंदगी और अर्थव्यवस्था मछली पालन, कोयर उद्योग, बंदरगाह से जुड़ा व्यापार, पर्यटन और नहरों पर निर्भर है. यह इलाका देखने में जितना खूबसूरत है, राजनीति में उतना ही व्यावहारिक और हिसाब-किताब करने वाला माना जाता है. यहां के मतदाता
भावनाओं से ज्यादा काम और नतीजों को देखकर वोट देते हैं. जो नेता रोजमर्रा की समस्याएं सुलझाते हैं, उन्हें समर्थन मिलता है और जो केवल दिखावे तक सीमित रहते हैं, उन्हें नकार दिया जाता है.
अलप्पुझा लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा यह विधानसभा क्षेत्र मुख्य रूप से अलप्पुझा नगर और उसके आसपास की पंचायतों जैसे अरियाद, मन्नांचेरी, मारारीकुलम दक्षिण और मारारीकुलम उत्तर से मिलकर बना है. यहां समुद्री किनारे के मजदूर, बैकवॉटर से जुड़े लोग, व्यापारी और सेवा क्षेत्र में काम करने वाले लोग बड़ी संख्या में हैं. यही कारण है कि यहां की राजनीति जमीनी, जागरूक और सवाल पूछने वाली है.
अलप्पुझा का भूगोल ही इसकी राजनीति बनाता है. यह शहर समुद्र और झील के बीच एक पतली पट्टी पर बसा है. पहले यह व्यापार और नहरों का बड़ा केंद्र था, आज यह पर्यटन और जल परिवहन के लिए जाना जाता है. लेकिन यही भूगोल इसे बाढ़, जलभराव, नहरों की गंदगी, कचरा प्रबंधन, तटीय कटाव और खारे पानी की समस्या जैसी परेशानियों से भी घेरता है. यहां जलवायु और पर्यावरण के मुद्दे किताबों की बात नहीं, बल्कि लोगों की रोज की जिंदगी का हिस्सा हैं और यही चुनावी सोच को भी प्रभावित करते हैं.
यहां शहरी और ग्रामीण दोनों तरह की चिंताएं एक साथ दिखाई देती हैं. नगर क्षेत्र में सड़क, नहर, बाजार, सफाई, मकान और स्वास्थ्य सेवाएं बड़े मुद्दे हैं, जबकि पंचायत इलाकों में खेती, मछली पालन, तटबंध, बाढ़ और खारे पानी की समस्या अहम होती है. इसलिए यहां के लोग सरकार से सिर्फ विचारधारा नहीं, बल्कि मजबूत और असरदार प्रशासन की उम्मीद रखते हैं.
समाज की दृष्टि से अलप्पुझा में एझावा, ईसाई (खासकर तटीय लैटिन कैथोलिक), मुस्लिम और अनुसूचित जाति के लोग रहते हैं. कोई एक समुदाय अकेले चुनाव नहीं जिता सकता, इसलिए गठजोड़ और संतुलन बहुत जरूरी होता है. पहले कोयर उद्योग, बंदरगाह और मछली से जुड़े मजदूर संगठनों की वजह से वामपंथ की जड़ें मजबूत हुईं, लेकिन यहां के मतदाता कभी भी आंख मूंदकर किसी एक दल के साथ नहीं चलते. अगर नहरें जाम हों, कचरा फैला हो या बाढ़ से राहत न मिले, तो वे अपना फैसला बदलने में देर नहीं करते.
राजनीतिक इतिहास में यह सीट कभी कांग्रेस का गढ़ रही है तो कभी वाम दलों का मजबूत आधार. 1990 के दशक में कांग्रेस के बड़े नेता यहां से चुने गए. बाद में टी. एम. थॉमस आइजक जैसे वाम नेता के कार्यकाल में विकास और नगर प्रशासन पर जोर बढ़ा. 2021 के चुनाव में माकपा के पी. पी. चित्तरंजन की जीत ने दिखाया कि लोग उस सरकार को तरजीह देते हैं, जिसे वे संकट के समय ज्यादा भरोसेमंद मानते हैं.
आज भी अलप्पुझा के सामने बड़ी चुनौतियां हैं- पर्यटन से बढ़ता कचरा, जलनिकासी की समस्या, नहरों की सफाई, मछुआरों की आजीविका और युवाओं के लिए रोजगार. यहां चुनाव जीतने के लिए भाषण से ज्यादा जरूरी है काम करके दिखाना, जिनमें बाढ़ के समय राहत, सड़क और नहर की मरम्मत, कचरा प्रबंधन और प्रशासन तक आसान पहुंच प्रमुख रूप से शामिल है.
कुल मिलाकर, अलप्पुझा की राजनीति भावनाओं से नहीं, अनुभव से चलती है. यह पानी पर बसा शहर जोखिम के साथ जीता है, इसलिए यहां के लोग सरकार को उसके काम से परखते हैं. यहां चुनाव किसी उत्सव से ज्यादा एक जांच की तरह होते हैं- कौन नहरें साफ रखता है, कौन सड़कों को ठीक करता है, कौन संकट में समय पर पहुंचता है. इसी कसौटी पर यहां सत्ता को तौला जाता है.
(K. A. Shaji)