'इतने साल से पढ़ रहे हो, अभी तक नौकरी नहीं लगी?' रांची में आए छात्र ने कहा अब ये सवाल चुभता है!

जाहिद का कहना है कि अगर हम सिर्फ पढ़ते रहें और सिस्टम में कोई सुधार ही न हो, तो आने वाले सालों में भी यही हाल रहेगा. इसलिए हमें लगा कि शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखना ज़रूरी है. हमारा मकसद किसी से टकराव नहीं, बल्कि एक साफ़ और भरोसेमंद परीक्षा व्यवस्था की मांग करना है.

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तानों से टूटे छात्र जाहिद ने बताई रांची के JPSC प्रोटेस्ट में आने की वजह तानों से टूटे छात्र जाहिद ने बताई रांची के JPSC प्रोटेस्ट में आने की वजह

मानसी मिश्रा

  • रांची ,
  • 07 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 5:55 PM IST

8 साल का संघर्ष, जेब में तंगी और 'कब लगेगी नौकरी?' वाले रिश्तेदारों के तीखे ताने, रांची के एक छोटे से कमरे में घुटते जाहिद का दर्द अब सड़कों पर छलक पड़ा है. JSSC CGL की तैयारी में जवानी खपा चुके इस छात्र की आंखें सिस्टम से मायूस हुईं तो दिल टूटने लगा. लेकिन जब अम्मी ने कहा है कि आज हक के लिए आवाज़ नहीं उठाई, तो कल हालात और बुरे होंगे तो जाहिद डर भूलकर आंदोलन में कूद पड़े. 

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रांची के एक सीले हुए छोटे से कमरे में जलती टेबल लैंप की रोशनी सिर्फ किताबों को ही नहीं रोशन करती, बल्कि लातेहार के एक किसान परिवार के उस उम्मीद को भी जलाए रखती है जो पिछले आठ सालों से एक सरकारी नौकरी की राह तक रहा है. नाम है जाहिद. जेएसएससी सीजीएल (JSSC CGL) की तैयारी कर रहे जाहिद उन हज़ारों चेहरों में से एक हैं, जो इन दिनों रांची की सड़कों पर अपने हक़, निष्पक्ष परीक्षा और अपने बिखरते सपनों को बचाने के लिए आंदोलन कर रहे हैं. aajtak.in ने उनसे बातचीत करके जाना उनका संघर्ष... 

जाहिद बताते हैं कि मैं 2018 से रांची में रहकर तैयारी कर रहा हूं. इतने साल घर से दूर रहना सिर्फ पढ़ाई का नहीं, बल्कि आर्थिक और मानसिक दोनों तरह का इम्तिहान रहा है. कुछ खर्च घर से आता है और बाकी ज़रूरतें पूरी करने के लिए मैं ट्यूशन पढ़ाता हूं. सच कहूं तो अब बार-बार घर से पैसे मांगना अच्छा नहीं लगता. यही सोचकर जितना हो सके, खुद अपने पैरों पर खड़े रहने की कोशिश करता हूं.

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कैसे चलता है खर्च 
जाह‍िद कहते हैं कि ये संघर्ष अब मेरी ज़िंदगी का हिस्सा बन चुका है. एक छोटे से कमरे में रहकर, बहुत सीमित खर्च में गुज़ारा करना पड़ता है. किराया, राशन और बाकी ज़रूरतों का इंतज़ाम आसान नहीं होता. घर से जितनी मदद मिलती है, उतनी मिलती है, लेकिन हर बार हाथ फैलाना अच्छा नहीं लगता. इसलिए ट्यूशन पढ़ाकर और छोटे-मोटे काम करके खर्च निकालता हूं. ये सिर्फ पैसों की नहीं, हिम्मत और सब्र की भी लड़ाई है.

अब चुभते हैं सवाल 
जाहिद कहते हैं कि अब तो अपने गांव घर जाने पर भी ज्यादा लोगों से मिलना-जुलना नहीं होता. ज्यादातर वक्त घर में ही रहता हूं और फिर वापस रांची आ जाता हूं. शादी-ब्याह या दूसरे प्रोग्राम में भी कम ही जाता हूं. वजह ये है कि लोग आपके संघर्ष को नहीं, सिर्फ नतीजा देखते हैं. कई लोग पूछते हैं कि इतने साल से पढ़ रहे हो, अभी तक नौकरी नहीं लगी? कुछ लोग दूसरों से तुलना भी करते हैं. ऐसी बातें दिल को तकलीफ़ देती हैं और इंसान अंदर से टूटने लगता है.

धांधली की खबरें भी नॉर्मल लगती हैं

जाहिद कहते हैं कि अब तो पेपर लीक, धांधली जैसी खबर सुनकर हैरानी भी नहीं होती. पहले बहुत दुख होता था, लेकिन अब ज़्यादा मायूसी होती है. हम लोग मेहनत इसलिए करते थे कि अगर कोई गलत तरीके से आगे बढ़ने की कोशिश करे तो भी अपनी मेहनत से उसे पीछे छोड़ दें. लेकिन जब बार-बार पूरी परीक्षा ही शक के घेरे में आ जाए, तो मेहनत पर भी भरोसा कम होने लगता है. कई बार लगता है कि क्या सच में झारखंड में अपना भविष्य बन पाएगा या कहीं और सोचना चाहिए.

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उनका कहना है कि इस लंबे इंतज़ार का असर मानसिक तौर पर बहुत पड़ा है. सालों तक पढ़ाई करना, फिर बार-बार निराश होना आसान नहीं है. कई बार महसूस होता है कि पहले जैसी याददाश्त भी नहीं रही. कभी मोबाइल किसी काम से खोलता हूं और कुछ सेकंड बाद भूल जाता हूं कि किसलिए खोला था. कई बार घर लौट जाने का ख़याल भी आता है, लेकिन फिर लगता है कि इतने साल की मेहनत यूं ही छोड़ देना भी ठीक नहीं होगा. बस यही उम्मीद आगे बढ़ाती रहती है कि शायद अगली बार सब ठीक हो जाए.

लाठी से डर नहीं लगता ... 

हम पढ़ाई छोड़कर आंदोलन करने नहीं आए हैं, बल्कि अपने हक़ की आवाज़ उठाने आए हैं. जाहिद का कहना है कि अगर हम सिर्फ पढ़ते रहें और सिस्टम में कोई सुधार ही न हो, तो आने वाले सालों में भी यही हाल रहेगा. इसलिए हमें लगा कि शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखना ज़रूरी है. हमारा मकसद किसी से टकराव नहीं, बल्कि एक साफ़ और भरोसेमंद परीक्षा व्यवस्था की मांग करना है.

जाहि‍द आगे कहते हैं कि रही बात लाठी चलने आद‍ि का डर तो वो डर तो हर इंसान को लगता है और मुझे भी लगता है. लेकिन जब इंसान अपने हक़ और इंसाफ़ के लिए शांतिपूर्ण तरीके से खड़ा होता है, तो हिम्मत डर से बड़ी हो जाती है. लाठी का दर्द कुछ दिन का होता है, लेकिन सालों की मेहनत बर्बाद होने का दर्द बहुत गहरा होता है. अगर हम कानून के दायरे में रहकर अपनी बात रख रहे हैं, तो हमें उम्मीद रहती है कि आख़िर में इंसाफ़ ज़रूर मिलेगा. मेरी अम्मी ने भी कहा कि अगर आज आवाज नहीं उठाओगे तो कल हालात और मुश्किल हो जाएंगे. उनके हौसले की वजह से ही मैं आज भी डटा हुआ हूं. 

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