रक्षा मंत्रालय ने भारतीय नौसेना के लिए जहाज से लॉन्च होने वाले लॉइटरिंग म्यूनिशन यानी कामीकाजे ड्रोन जैसे सिस्टम की मांग को मान लिया है. मंत्रालय ने इसके लिए रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन यानी RFI जारी की है. अनुमानित डील की कीमत 15 हजार से 18 हजार करोड़ रुपये के बीच बताई जा रही है हालांकि मंत्रालय ने आधिकारिक तौर पर लागत का खुलासा नहीं किया है.
यह प्रणाली नौसेना के युद्धपोतों से लॉन्च की जा सकेगी और समुद्री तथा जमीनी दोनों तरह के लक्ष्यों पर सटीक हमला करने में सक्षम होगी. सिस्टम की न्यूनतम रेंज 1000 किलोमीटर होनी चाहिए. यह नौसेना की लंबी दूरी की स्ट्राइक क्षमता को नया आयाम देगा.
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आरएफआई में साफ मापदंड तय किए गए हैं. लॉइटरिंग यानी लक्ष्य क्षेत्र के ऊपर मंडराने की क्षमता नौ घंटे तक होनी चाहिए. क्रूजिंग स्पीड 75 नॉट यानी 138.9 किलोमीटर से ज्यादा और टर्मिनल अटैक स्पीड यानी अंतिम हमले की गति 200 नॉट यानी 370 किलोमीटर प्रति घंटा से ऊपर रखी गई है.
सिस्टम इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इन्फ्रारेड यानी ईओ/आईआर सीकर से लैस होगा जिससे दिन और रात दोनों समय निगरानी और सटीक हमला संभव होगा. यह समुद्री जहाजों के साथ जमीनी ठिकानों को भी निशाना बना सकेगा. ऊंचाई 15 हजार फीट तक और सटीकता एक मीटर से कम सर्कुलर एरर प्रोबेबल की मांग की गई है. ये मापदंड इसे मौजूदा छोटी रेंज वाले लॉइटरिंग म्यूनिशन से काफी आगे रखते हैं.
स्वदेशी उद्योग को प्राथमिकता
खरीद प्रक्रिया में भारतीय उद्योग और स्वदेशी विनिर्माण को प्राथमिकता दी जाएगी. बाय इंडियन-आईडीडीएम या बाय इंडियन श्रेणी के तहत प्रक्रिया आगे बढ़ने की संभावना है. संभावित प्रतिभागियों में सोलर इंडस्ट्रीज, नीब लिमिटेड, भारत फोर्ज, टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स और वीईएम टेक्नोलॉजीज का नाम लिया है.
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ये कंपनियां पहले से ही ड्रोन और लॉइटरिंग म्यूनिशन क्षेत्र में सक्रिय हैं. कई कंपनियां 500 से 1000 KM रेंज वाले सिस्टम पर काम कर रही हैं. आरएफआई का मकसद उद्योग से जानकारी जुटाना और तकनीकी समाधान समझना है ताकि बाद में औपचारिक निविदा जारी की जा सके.
जहाज से लॉन्च होने वाले लॉइटरिंग म्यूनिशन नौसेना को नई ताकत देंगे. युद्धपोत दूर से ही दुश्मन के जहाजों या तटीय ठिकानों पर नजर रख सकेंगे. जरूरत पड़ने पर हमला कर सकेंगे. यह पारंपरिक क्रूज मिसाइलों से सस्ता विकल्प हो सकता है. मोबाइल या समय-संवेदनशील लक्ष्यों के खिलाफ ज्यादा अच्छा साबित होगा.
रेड सी जैसे क्षेत्रों में ड्रोन हमलों ने वैश्विक नौसेनाओं को सोचने पर मजबूर किया है. भारतीय नौसेना भी अपनी सतह बेड़े को ऐसी क्षमता से लैस करना चाहती है ताकि दुश्मन की तटीय मिसाइलों की रेंज से बाहर रहकर हमला किया जा सके. नियंत्रण एक जहाज से दूसरे जहाज या जमीनी स्टेशन पर स्थानांतरित करने की सुविधा भी मांगी गई है जिससे ऑपरेशन ज्यादा प्रभावी बनेगा.
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लॉइटरिंग म्यूनिशन की अवधारणा और विकास
लॉइटरिंग म्यूनिशन पारंपरिक ड्रोन और मिसाइल के बीच का मिश्रण है. यह लक्ष्य क्षेत्र तक पहुंचकर मंडराता है. निगरानी करता है. फिर चुने हुए टारगेट पर गोता लगाकर हमला करता है. इसे कामीकाजे ड्रोन भी कहा जाता है क्योंकि यह खुद को नष्ट कर देता है.
भारत में थलसेना पहले से छोटी रेंज वाले ऐसे सिस्टम खरीद रही है. नौसेना के लिए जहाज आधारित वर्जन नई चुनौती है क्योंकि इसे समुद्री वातावरण, जहाज के लॉन्च सिस्टम और लंबी दूरी के अनुकूल बनाना होगा. स्वदेशी कंपनियां प्रोपल्शन, वॉरहेड, सीकर और नेविगेशन तकनीक पर काम कर रही हैं. जीएनएसएस जैमिंग या स्पूफिंग के बावजूद काम करने की क्षमता भी जरूरी होगी.
15 से 18 हजार करोड़ रुपये की संभावित डील रक्षा उद्योग के लिए बड़ा मौका है. इससे रोजगार पैदा होंगे. उत्पादन क्षमता बढ़ेगी. निर्यात की संभावनाएं खुलेंगी. कई स्टार्टअप और बड़ी कंपनियां इस क्षेत्र में निवेश कर रही हैं. सोलर इंडस्ट्रीज जैसे खिलाड़ी विस्फोटक और प्रोपल्शन में मजबूत हैं जबकि टाटा और भारत फोर्ज सिस्टम इंटीग्रेशन में अनुभव रखते हैं. नीब और VEM भी सक्रिय रूप से प्लेटफॉर्म विकसित कर रहे हैं.
चुनौतियां और आगे की प्रक्रिया
इतनी लंबी रेंज और एंड्योरेंस वाले सिस्टम का विकास तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण है. वजन, ईंधन दक्षता, कम रडार क्रॉस सेक्शन और समुद्री लॉन्च के अनुकूल डिजाइन बनाना होगा. RFI के जवाब मिलने के बाद तकनीकी मूल्यांकन, ट्रायल और फिर आरएफपी जारी होने की प्रक्रिया चलेगी.
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समय सीमा और लागत नियंत्रण महत्वपूर्ण होंगे. नौसेना को यह सुनिश्चित करना होगा कि सिस्टम मौजूदा युद्धपोतों के साथ आसानी से एकीकृत हो सके. रखरखाव, प्रशिक्षण और लॉजिस्टिक्स का नेटवर्क भी तैयार करना पड़ेगा.
हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच ऐसी क्षमता नौसेना को रणनीतिक बढ़त देगी. दुश्मन के बेड़े या तटीय बुनियादी ढांचे पर दूर से दबाव बनाने में मदद मिलेगी. यह ब्रह्मोस जैसी मिसाइलों के पूरक के रूप में काम कर सकता है.
सस्ते और बड़ी संख्या में तैनात किए जा सकने वाले सिस्टम सैचुरेशन अटैक की संभावना बढ़ाएंगे. कुल मिलाकर यह कदम आधुनिक नौसैनिक युद्ध की जरूरतों को पूरा करने की दिशा में महत्वपूर्ण है. स्वदेशी क्षमता मजबूत होने से आयात पर निर्भरता घटेगी और दीर्घकालिक सुरक्षा मजबूत होगी.
शिवानी शर्मा