यमन में हालिया लड़ाई के दौरान OSINT विश्लेषकों ने मारीब प्रांत के राघवान जिले में एक मिसाइल के अवशेष खोजे हैं. इन अवशेषों को चीन निर्मित DF-15A शॉर्ट-रेंज बैलिस्टिक मिसाइल का बूस्टर स्टेज बताया जा रहा है. कई रक्षा विशेषज्ञों का दावा है कि यह मिसाइल सऊदी अरब की रॉयल सऊदी स्ट्रैटेजिक मिसाइल फोर्स ने हूती ठिकानों पर दागी थी.
रिपोर्ट्स के मुताबिक मिसाइल लक्ष्य से चूक गई और यमन के रेगिस्तान में गिर पड़ी. यह घटना अगर पुष्टि हो जाती है तो सऊदी अरब द्वारा चीनी बैलिस्टिक मिसाइल का युद्ध में पहला ज्ञात इस्तेमाल माना जाएगा. सऊदी अरब ने आधिकारिक तौर पर इस बात की पुष्टि नहीं की है. चीन या यमनी पक्ष से भी कोई बयान नहीं आया है.
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विश्लेषक इस निष्कर्ष पर इसलिए पहुंचे क्योंकि हूतियों के पास DF-15A जैसी मिसाइल होने के कोई प्रमाण नहीं हैं. उनके शस्त्रागार में मुख्य रूप से ईरानी तकनीक वाली मिसाइलें और ड्रोन हैं. सऊदी अरब के पास पहले से चीन से खरीदी गई DF-3A और DF-21 जैसी मिसाइलें होने की रिपोर्ट्स लंबे समय से चल रही हैं. इसलिए कई विशेषज्ञों ने इसे सऊदी की गुप्त मिसाइल क्षमता का हिस्सा माना है.
DF-15A मिसाइल की पूरी तकनीकी विशेषताएं
DF-15A चीन की डोंग फेंग सीरीज की एक शॉर्ट-रेंज बैलिस्टिक मिसाइल है. इसे नाटो कोड नाम सीएसएस-6 भी कहा जाता है. यह सड़क पर मोबाइल ट्रांसपोर्टर-इरेक्टर-लॉन्चर (TEL) से दागी जाती है और ठोस ईंधन पर चलती है. इसकी मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं...
लंबाई लगभग 9.1 से 10 मीटर और व्यास करीब एक मीटर है. लॉन्च वजन लगभग 6,200 से 6,500 किलोग्राम के आसपास रहता है. यह 500 से 750 किलोग्राम तक का पेलोड ले जा सकती है जिसमें हाई एक्सप्लोसिव, बंकर-बस्टिंग या रनवे पर हमला करने वाले वॉरहेड शामिल हो सकते हैं.
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इसकी अधिकतम रेंज 600 से 900 किलोमीटर बताई जाती है जो पेलोड और संस्करण पर निर्भर करती है. गाइडेंस सिस्टम में इनर्शियल नेविगेशन के साथ जीपीएस अपडेट और टर्मिनल रडार गाइडेंस का इस्तेमाल होता है. आधुनिक संस्करणों में सटीकता 30 से 45 मीटर या उससे बेहतर मानी जाती है. तैयार करने में करीब 15 से 30 मिनट लगते हैं. यह सिंगल-स्टेज मिसाइल है. तेजी से स्थान बदल सकती है.
युद्ध में विफलता का मतलब क्या है
यह मिसाइल उड़ान के दौरान खराब हो गई या निशाना चूक गई और रेगिस्तान में गिर पड़ी. कुछ वीडियो और तस्वीरों में इसके अवशेष दिख रहे हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि ब्रोशर में बताई गई क्षमताएं और वास्तविक युद्ध क्षेत्र का प्रदर्शन अक्सर अलग होता है. रेगिस्तानी गर्मी, रेत और कठिन हालात में मिसाइलें कभी-कभी अपेक्षा के मुताबिक काम नहीं करतीं.
अगर यह सऊदी की मिसाइल थी तो इसका लक्ष्य चूकना सऊदी की गुप्त मिसाइल क्षमता पर सवाल खड़े करता है. साथ ही चीनी हथियारों की विश्वसनीयता पर भी चर्चा छिड़ गई है. सऊदी अरब लंबे समय से यमन में हूतियों के खिलाफ हवाई हमले करता रहा है. बैलिस्टिक मिसाइल का इस्तेमाल युद्ध की तीव्रता बढ़ाने का संकेत माना जा रहा है. मारीब क्षेत्र में हाल ही में लड़ाई तेज हुई है और दोनों पक्ष एक-दूसरे पर हमले बढ़ा रहे हैं.
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इस घटना से मध्य पूर्व में हथियारों की होड़ का नया पहलू सामने आया है. सऊदी अरब ने 1980 के दशक में चीन से DF-3A मिसाइलें खरीदी थीं और बाद में DF-21 की भी खबरें आईं. DF-15A का कथित इस्तेमाल बताता है कि सऊदी की मिसाइल क्षमता पहले सोची गई से ज्यादा विविध हो सकती है.
चीन के लिए यह उसके हथियार निर्यात की विश्वसनीयता का परीक्षा का क्षण है. कई देश चीनी मिसाइलें खरीदते हैं लेकिन युद्ध में उनका प्रदर्शन अभी सीमित प्रमाणों पर आधारित है. विश्लेषक चेतावनी देते हैं कि ऐसी घटनाओं से संघर्ष और बढ़ सकता है. हूती पक्ष अगर इसे सऊदी हमला मानता है तो जवाबी कार्रवाई कर सकता है.
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हथियार निर्यात के नियमों और पारदर्शिता पर भी सवाल उठ सकते हैं क्योंकि सऊदी ने कभी आधिकारिक तौर पर DF-15A रखने की बात नहीं कही. कुल मिलाकर यह घटना यमन संघर्ष में नई तकनीक के प्रवेश और उसकी संभावित विफलता दोनों को उजागर करती है.
OSINT रिपोर्ट्स महत्वपूर्ण हैं लेकिन आधिकारिक पुष्टि के बिना इन्हें पूर्ण सत्य नहीं माना जा सकता. युद्धक्षेत्र में मिसाइलों की सफलता न सिर्फ तकनीक बल्कि प्रशिक्षण, रखरखाव और हालात पर भी निर्भर करती है. आने वाले दिनों में और सबूत सामने आने पर तस्वीर साफ हो सकती है.
ऋचीक मिश्रा