भारत ने अपनी सेना के लिए खास ऑल-टेरेन वाहनों के घरेलू उत्पादन की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाया है. लार्सन एंड टुब्रो (L&T) और ब्रिटिश कंपनी बीएई सिस्टम्स ने 28 अक्टूबर को सूरत स्थित एलएंडटी के आर्मर्ड सिस्टम्स कॉम्प्लेक्स में 18 बीवीएस10 सिंधु आर्टिकुलेटेड ऑल-टेरेन वाहनों का उत्पादन शुरू कर दिया.
ये वाहन बर्फ, कीचड़ और पानी जैसे कठिन इलाकों में आसानी से चल सकते हैं. इनकी खासियत यह है कि ये लद्दाख जैसे ऊंचाई वाले क्षेत्रों में 18,000 फीट तक और माइनस 55 डिग्री सेल्सियस की ठंड में काम कर सकते हैं. वहीं कच्छ के दलदली और रेतीले इलाकों में 55 डिग्री सेल्सियस की गर्मी भी झेल सकते हैं.
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दोनों कंपनियों के अधिकारियों ने 2023 में हुए समझौते का स्वागत किया है. यह कदम मेक इन इंडिया अभियान को मजबूत करेगा और सीमा क्षेत्रों में सेना की तैयारियों को बढ़ाएगा. बीवीएस10 सिंधु एक आर्टिकुलेटेड यानी जोड़दार डिजाइन वाला वाहन है. इसमें दो हिस्से होते हैं जो एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं.
इससे यह बर्फ, कीचड़, पानी और ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर आसानी से आगे बढ़ सकता है. भारतीय सेना इसे खासकर उत्तर और पश्चिम की सीमाओं पर इस्तेमाल करेगी जहां मौसम और भूगोल दोनों चुनौतीपूर्ण हैं. लद्दाख की बर्फीली चोटियों से लेकर कच्छ के दलदल तक ये वाहन सैनिकों, सामान और हथियारों को ले जाने में मदद करेंगे.
इसकी डिजाइन इन्हें विभिन्न परिस्थितियों में स्थिर रखता है. उत्पादन सूरत के आधुनिक प्लांट में हो रहा है जहां तकनीक का लोकलाइजेशन भी किया जा रहा है.
मेक इन इंडिया और साझेदारी का महत्व
2023 में एलएंडटी और बीएई सिस्टम्स के बीच हुए समझौते के तहत यह उत्पादन शुरू हुआ है. इसमें तकनीक हस्तांतरण पर जोर दिया गया है ताकि भारत धीरे-धीरे आत्मनिर्भर बन सके. अधिकारियों का कहना है कि इससे सीमा क्षेत्रों में सेना की गतिशीलता बढ़ेगी. मेक इन इंडिया के तहत विदेशी तकनीक को घरेलू उत्पादन से जोड़ना देश की रक्षा क्षमता को मजबूत करता है.
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कुछ लोग पाकिस्तान के पास भी मिलते-जुलते वाहनों का जिक्र करते हैं. स्थानीय डिजाइन के स्तर पर सवाल उठाते हैं. लेकिन अधिकारी स्पष्ट करते हैं कि तकनीक हस्तांतरण और स्थानीय निर्माण से भारत को बड़ा फायदा हो रहा है. इससे रोजगार भी बढ़ेगा और आपूर्ति श्रृंखला मजबूत होगी.
शुरुआत में 18 वाहनों का उत्पादन हो रहा है. सफल परीक्षण के बाद और अधिक संख्या में बनाने की योजना बन सकती है. सेना की जरूरत के हिसाब से इनमें बदलाव भी संभव हैं. चुनौतियां लागत नियंत्रण, समय पर डिलीवरी और पूर्ण स्वदेशीकरण की हो सकती हैं. फिर भी यह परियोजना भारतीय सेना को कठिन इलाकों में बेहतर लचीलापन देगी. कुल मिलाकर यह कदम सीमा सुरक्षा और आत्मनिर्भरता दोनों को आगे बढ़ाएगा.
ऋचीक मिश्रा