अमेरिकी वायुसेना ने अपनी स्क्रैमजेट से चलने वाली हाइपरसोनिक अटैक क्रूज मिसाइल (HACM) का पहला फ्लाइट टेस्ट ऑस्ट्रेलियाई रेंज पर पूरा कर लिया है. यह परीक्षण लंबे इंतजार के बाद हुआ है. HACM कार्यक्रम में कई सालों से देरी चल रही थी.
वायुसेना ने समयसीमा बचाने के लिए परीक्षणों की संख्या भी घटा दी है. लक्ष्य यह है कि 2027 में इस मिसाइल को तेजी से खरीदने का फैसला लिया जा सके. यह खबर अमेरिकी सैन्य तकनीक और ऑस्ट्रेलिया के साथ साझेदारी दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण है.
HACM एक हवा में सांस लेने वाली यानी एयर-ब्रीदिंग हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल है. इसे रयथियॉन (अब आरटीएक्स) और नॉर्थ्रॉप ग्रमैन ने मिलकर विकसित किया है. 2022 में इन कंपनियों को ठेका मिला था. अमेरिकी सैन्य नामकरण प्रणाली में इसे एएचएम-4ए नाम दिया गया है.
यह भी पढ़ें: वायु सेना दिवस 8 को, हिंडन एयरबेस में हुआ फुल ड्रेस रिहर्सल
यह मिसाइल दो स्टेजों वाली है. पहला स्टेज रॉकेट बूस्टर का है जो इसे ऊंचाई और रफ्तार देता है. दूसरा स्टेज स्क्रैमजेट इंजन वाला है जो बूस्टर से अलग होकर लक्ष्य की ओर बढ़ता है. स्क्रैमजेट कम गति पर काम नहीं करता इसलिए शुरू में बूस्टर जरूरी है. हाइपरसोनिक गति का मतलब आमतौर पर मैक 5 से ऊपर की रफ्तार होता है लेकिन HACM की अधिकतम गति अभी सार्वजनिक नहीं की गई.
अमेरिकी वायुसेना के प्रवक्ता ने द वार जोन को बताया कि अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया की साझेदारी में HACM का फ्लाइट टेस्ट किया गया. यह सदर्न क्रॉस इंटीग्रेटेड फ्लाइट रिसर्च एक्सपेरिमेंट (साइफायर) कार्यक्रम का हिस्सा है. दोनों देशों के बीच 15 साल से ज्यादा पुरानी साझेदारी है.
रॉयल ऑस्ट्रेलियन एयर फोर्स ने ऑस्ट्रेलियाई टेस्ट रेंज पर HACM यूनिट को रिलीज किया. इससे मिसाइल के प्रदर्शन के बारे में महत्वपूर्ण आंकड़े मिले. यह भी साफ नहीं कि रिलीज के बाद मिसाइल ने खुद अपनी शक्ति से उड़ान भरी या नहीं. किस विमान से इसे छोड़ा गया यह भी अज्ञात है.
पहले से अनुमान था कि परीक्षण वूमरा टेस्ट रेंज पर होगा. यह ऑस्ट्रेलिया का विशाल और दूरदराज़ इलाका है जहां लंबी दूरी के परीक्षण आसानी से हो सकते हैं. अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया पहले भी यहां हाइपरसोनिक परीक्षण कर चुके हैं. जीएओ की रिपोर्ट के अनुसार कुछ परीक्षण रॉयल ऑस्ट्रेलियन एयर फोर्स के एफ/ए-18एफ सुपर हॉर्नेट से किए जाने थे. अमेरिकी वायुसेना का शुरुआती लॉन्च प्लेटफॉर्म एफ-15ई स्ट्राइक ईगल है. आगे और विमान भी शामिल हो सकते हैं.
देरी से हुआ परीक्षण
HACM कार्यक्रम में काफी देरी हुई है. मूल योजना 2024 में उड़ान परीक्षण शुरू करने की थी. फिर यह 2025 और उसके बाद 2026 में खिसक गई. जीएओ की जुलाई रिपोर्ट के अनुसार कार्यक्रम अब वित्तीय वर्ष 2026 की दूसरी तिमाही में पहला फ्लाइट टेस्ट करने के रास्ते पर था लेकिन समयसीमा में कोई गुंजाइश नहीं बची थी. तेजी से प्रोटोटाइप बनाने के प्रयास में परीक्षणों की संख्या सात से घटाकर पांच कर दी गई.
यह भी पढ़ें: ब्रह्मांड के सबसे मायावी कण 'न्यूट्रिनो' की खोज करने वाले साइंटिस्ट को फिजिक्स को नोबेल
वायुसेना इस दौरान कुल 13 मिसाइलें बनाएगी जिनमें परीक्षण वाले, अतिरिक्त और परिचालन वाले शामिल हैं. रिपोर्ट में चेतावनी दी गई थी कि अगर कोई बड़ा परीक्षण असफल होता है तो पांच साल की समयसीमा में सभी परीक्षण पूरे नहीं हो पाएंगे. कम से कम पहले तीन परीक्षण पूरे होना जरूरी है ताकि 2027 में तेजी से खरीदने का फैसला लिया जा सके.
जीएओ की रिपोर्ट जनवरी तक की जानकारी पर आधारित थी. वित्तीय वर्ष 2027 की पहली तिमाही का लक्ष्य पहले से तय था जो हाल ही में शुरू हुआ. अब इस लक्ष्य को पूरा करना बेहद मुश्किल लगता है. कार्यक्रम ने समयसीमा बचाने के लिए जोखिम उठाया है. अधिकारियों ने कहा कि गतिविधियों को फिर से व्यवस्थित किया गया ताकि सिर्फ पहले परीक्षण पर ध्यान रहे. कुछ मामलों में डिजाइन पूरा होने से पहले ही पुर्जों की जांच शुरू कर दी गई. अगर जांच में खामी निकली तो डिजाइन फिर से बदलना पड़ सकता है.
तकनीकी चुनौतियां
स्क्रैमजेट संचालित डिजाइन ऐतिहासिक रूप से कठिन साबित हुए हैं. बोइंग के एक्स-51 वेवराइडर और हाईफ्लाई 2 जैसे परीक्षण वाहनों का अनुभव रहा है. ये वेवराइडर कॉन्फिगरेशन का इस्तेमाल करते थे जिसमें शॉकवेव पर सवारी करके अतिरिक्त लिफ्ट मिलती है.
HACM में यह सिद्धांत है या नहीं यह स्पष्ट नहीं. कैस्टेलियन की ब्लैकबीयर्ड मिसाइल भी दो स्टेज वाली है लेकिन वह एयर-ब्रीदिंग नहीं लगती. अमेरिकी नौसेना के लिए एयर-लॉन्च्ड और आर्मी के लिए ग्राउंड-लॉन्च्ड वर्जन विकसित हो रहे हैं. अमेरिका के हाइपरसोनिक कार्यक्रमों में चुनौतियां सिर्फ स्क्रैमजेट तक सीमित नहीं.
वायुसेना, नौसेना और आर्मी के कई कार्यक्रमों में पिछली एक दशक में असफलताएं आईं. नौसेना ने अपना हाइपरसोनिक एयर-लॉन्च्ड प्रोग्राम हैलो पिछले साल रद्द कर दिया और ब्लैकबीयर्ड पर ध्यान केंद्रित किया. इससे चीन जैसे प्रतिद्वंद्वियों के मुकाबले अमेरिका में अंतर बढ़ने की चिंता पैदा हुई है.
लागत का सवाल भी महत्वपूर्ण है. पहले हाइपरसोनिक मिसाइलों को महंगी और कम संख्या वाली माना जाता था. अब ब्लैकबीयर्ड जैसे किफायती और बड़ी संख्या में बनाए जा सकने वाले डिजाइन पर जोर है. ईरान संघर्ष और अन्य वैश्विक संकटों से अमेरिकी गोला-बारूद के भंडार कम हुए हैं इसलिए सस्ती और अधिक मात्रा वाली मिसाइलों की मांग बढ़ी है. फिर भी विशेष हाइपरसोनिक हथियार भविष्य के शस्त्रागार का हिस्सा रहेंगे.
यह भी पढ़ें: एक लैब हादसे से एक्टिवेट हुए दो तरह के वायरस... दो लोगों को कोविड, दो राइनोवायरस पॉजिटिव
रणनीतिक महत्व
अमेरिकी सैन्य और ऑस्ट्रेलियाई साझेदार हाइपरसोनिक हथियारों को भविष्य के संघर्षों खासकर प्रशांत क्षेत्र में चीन जैसे उच्च स्तरीय युद्ध के लिए जरूरी मानते हैं. एयर-ब्रीदिंग हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइलें समय संवेदनशील लक्ष्यों पर तेज और लंबी दूरी से हमला करने की लचीली क्षमता देती हैं. ऊंची रफ्तार और गतिशीलता दुश्मन की वायु रक्षा को भेदने और प्रतिक्रिया समय कम करने में मदद करती है.
अब सवाल यह है कि वायुसेना और देरी से बच पाएगी या नहीं. 2027 के अंत तक सीमित उत्पादन शुरू करने का लक्ष्य पहले से ही महत्वाकांक्षी था और अब और मुश्किल हो गया है. परीक्षण योजना कम होने से शुरुआती तैनाती का रूप क्या होगा यह भी स्पष्ट नहीं. फिर भी HACM ने उड़ान परीक्षण का महत्वपूर्ण पड़ाव पार कर लिया है. यह उपलब्धि अमेरिका-ऑस्ट्रेलिया सहयोग और लंबी दूरी की स्ट्राइक क्षमता बढ़ाने की दिशा में एक कदम है.
यह कार्यक्रम दिखाता है कि आधुनिक हथियार विकास कितना जटिल और समय लेने वाला होता है. तकनीकी चुनौतियों, लागत दबाव और भू-राजनीतिक जरूरतों के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं. आगे के परीक्षणों के नतीजे तय करेंगे कि HACM समय पर मैदान में उतर पाएगी या नहीं. अमेरिकी वायुसेना और उसके सहयोगी अब डेटा का विश्लेषण कर अगले स्टेज की तैयारी कर रहे होंगे.
ऋचीक मिश्रा