फिर मंडरा रहा तेल-गैस संकट? सऊदी अरब पर हमले के बाद क्रूड में उबाल, होर्मुज से सप्लाई रुकी तो बढ़ेगी टेंशन

पश्चिम एशिया में बढ़ते हमलों का असर अब कच्चे तेल के बाजार पर दिखने लगा है. सऊदी अरब के ऊर्जा ठिकानों पर हमलों की आशंका और होर्मुज से तेल की ढुलाई को लेकर बढ़ती चिंता ने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा में हलचल बढ़ा दी है. 14 अक्टूबर को ब्रेंट क्रूड 106.58 डॉलर प्रति बैरल और अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट क्रूड 94.94 डॉलर पर कारोबार कर रहा था.

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सऊदी अरब के ऊर्जा ठिकानों पर हमलों और होर्मुज से तेल की ढुलाई को लेकर चिंता ने कच्चे तेल की कीमतें बढ़ाईं. (File Photo) सऊदी अरब के ऊर्जा ठिकानों पर हमलों और होर्मुज से तेल की ढुलाई को लेकर चिंता ने कच्चे तेल की कीमतें बढ़ाईं. (File Photo)

आजतक बिजनेस डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 14 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 2:45 PM IST

पश्चिम एशिया में बढ़ते हमलों ने एक बार फिर इंटरनेशनल एनर्जी मार्केट की चिंता बढ़ा दी है. सऊदी अरब के ऊर्जा ढांचों पर हूती विद्रोहियों के हमलों और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते तेल की ढुलाई को लेकर अनिश्चितता ने बाजार को सतर्क कर दिया है. तेल के कुओं से लेकर उसे दुनिया भर में पहुंचाने वाले समुद्री रास्तों तक, सप्लाई से जुड़ा कोई भी जोखिम कीमतों को ऊपर धकेल सकता है. 14 अक्टूबर को ब्रेंट क्रूड और अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) की कीमतों पर भी इसका असर दिखा. ब्रेंट क्रूड $106.58 प्रति बैरल पर ट्रेड कर रहा था, जबकि US वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट क्रूड $94.94 पर था.

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यमन के हूती विद्रोहियों की ओर से सऊदी अरब के तेल ठिकानों पर हमले तेज होने की खबरों ने ऊर्जा बाजार की चिंता बढ़ाई है. 13 अक्टूबर को सऊदी अरब के ढहरान (Dhahran) में सरकारी स्वामित्व वाली पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस कंपनी सऊदी अरामको (Saudi Aramco) की एक प्रशासनिक इमारत पर संदिग्ध हूती हमले की खबर सामने आई. इससे सीमित आग लगने की सूचना मिली.

सऊदी अरब दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादकों में शामिल है. ऐसे में उसके ऊर्जा ढांचे पर किसी भी हमले का खतरा बाजार के लिए अहम हो जाता है. आशंका है कि संघर्ष बढ़ने पर तेल उत्पादन, भंडारण या निर्यात की व्यवस्था प्रभावित हो सकती है. ध्यान देने वाली बात यह है कि कीमतें बढ़ने के लिए तेल की वास्तविक सप्लाई में कमी आना जरूरी नहीं है. अगर कारोबारियों को लगता है कि आने वाले दिनों में उत्पादन या निर्यात बाधित हो सकता है, तो वे पहले ही कीमतों में इस जोखिम को शामिल करने लगते हैं.

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स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर क्यों टिकी हैं नजरें?

कच्चे तेल की कीमतों के लिए सिर्फ उत्पादन ही नहीं, बल्कि उसकी ढुलाई भी बेहद अहम है. होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है. यहां जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने पर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की सप्लाई पर दबाव बढ़ सकता है. जहाजों पर हमलों और टैंकरों की आवाजाही को लेकर अनिश्चितता ने इस चिंता को और बढ़ाया है. न्यूज एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इस महीने की शुरुआत में टैंकरों पर हमलों के बाद इस मार्ग से तेल की ढुलाई प्रभावित हुई थी. अगर समुद्री रास्तों पर खतरा बढ़ता है, तो अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार तेल पहुंचने में देरी के साथ माल ढुलाई और बीमा की लागत भी बढ़ सकती है. इससे तेल खरीदने वाली कंपनियों का खर्च बढ़ता है और बाजार में कीमतों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है.

दूसरे देशों से आने वाली सप्लाई देगी राहत?

तेल बाजार में कीमतों का रुख इस बात पर भी निर्भर करेगा कि दूसरे उत्पादक देश कितनी अतिरिक्त सप्लाई उपलब्ध करा पाते हैं. रूस से डीजल का निर्यात बढ़ने की संभावना ईंधन बाजार को कुछ राहत दे सकती है. हालांकि, इससे पश्चिम एशिया में कच्चे तेल की सप्लाई को लेकर पैदा हुई चिंताओं की पूरी भरपाई हो पाएगी या नहीं, यह अभी साफ नहीं है. अगर उत्पादन जारी रहता है, लेकिन सुरक्षा जोखिमों के कारण रिफाइनरियों तक तेल पहुंचने में देरी होती है, तो भी बाजार में उपलब्ध सप्लाई कम पड़ सकती है. यही वजह है कि कारोबारियों की नजर उत्पादन के आंकड़ों के साथ-साथ समुद्री मार्गों की स्थिति और संभावित निर्यात रुकावटों पर भी है.

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भारत में पेट्रोल-डीजल पर क्या होगा असर?

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से कच्चा तेल खरीदकर पूरा करता है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो देश की तेल आयात लागत बढ़ सकती है. हालांकि, कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि पेट्रोल और डीजल के दाम तुरंत बढ़ जाएंगे. घरेलू कीमतों पर सरकार की कर नीति, तेल कंपनियों के फैसलों और लागत में होने वाले बदलावों का भी असर पड़ता है. महंगा कच्चा तेल सिर्फ ईंधन तक सीमित असर नहीं डालता. परिवहन और माल ढुलाई महंगी होने से विनिर्माण और दूसरी आर्थिक गतिविधियों की लागत भी बढ़ सकती है. इसका असर समय के साथ वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर पड़ने की आशंका रहती है.

रुपये और महंगाई पर बढ़ सकता है दबाव

कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी भारत के व्यापार संतुलन पर दबाव बढ़ा सकती है. तेल आयात के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ने से डॉलर की मांग बढ़ सकती है, जिससे रुपये पर दबाव आने की आशंका रहती है. महंगे तेल का असर ऑयल मार्केटिंग कंपनियों की लागत और देश में महंगाई के रुख पर भी पड़ सकता है. हालांकि, इसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि अंतरराष्ट्रीय कीमतें कितनी बढ़ती हैं और कितने समय तक ऊंची बनी रहती हैं. फिलहाल, अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार की नजर पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, सऊदी अरब के ऊर्जा ढांचे की सुरक्षा, होर्मुज से टैंकरों की आवाजाही और दूसरे उत्पादकों से मिलने वाली अतिरिक्त सप्लाई पर है. आने वाले दिनों में यही कारक तय करेंगे कि कच्चे तेल की कीमतों में तेजी बनी रहती है या बाजार को कुछ राहत मिलती है.

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