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₹10 लाख सालाना कमाई, अब भारत की बेटी को UN देगा अवॉर्ड, करती हैं इस चीज की खेती

सरकारी नौकरी की कोशिश की, प्राइवेट स्कूल में पढ़ाया, लेकिन आत्मनिर्भर बनने की चाह ने मिजोरम की जेड टी लालरिथांगी को खेती की राह दिखा दी. उनकी कहानी छोटे स्तर से बड़ी कामयाबी की मिसाल है. अब उनकी मेहनत को रोम में अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिलने जा रहा है.

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मिजोरम के लॉन्गतलाई जिले के सांगाउ गांव की जेटी लालरिथांगी स्ट्रॉबेरी की खेती करती हैं. (Photo: Instagram)
मिजोरम के लॉन्गतलाई जिले के सांगाउ गांव की जेटी लालरिथांगी स्ट्रॉबेरी की खेती करती हैं. (Photo: Instagram)

कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हो सकता... बस पत्थर तबीयत से उछालना पड़ता है. भारत के एक छोटे से गांव की इस बेटी की कहानी इसी जिद और हौसले की मिसाल है. सरकारी नौकरी की कोशिश की लेकिन नहीं मिली. फिर, प्राइवेट स्कूल में पढ़ाया, लेकिन मन में आत्मनिर्भर बनने की चाह थी. आखिरकार उन्होंने खेती को अपना रास्ता बनाया. शुरुआत सिर्फ 1,000 स्ट्रॉबेरी पौधों से की.

कमाई हुई तो खेती का दायरा बढ़ाया और देखते ही देखते यही काम उनकी पहचान बन गया. 2025 में स्ट्रॉबेरी की खेती से उन्होंने ₹10 लाख से ज्यादा की कमाई की थी. यह कहानी है मिजोरम के लॉन्गतलाई जिले के सांगाउ गांव की रहने वाली जेड टी लालरिथांगी (35) की. अब उनकी इसी मेहनत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर सम्मान मिलने जा रहा है. संयुक्त राष्ट्र (United Nations) का फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन (FAO) लालरिथांगी को '100 Women Heroes in Agrifood Systems and Rural Development' अवॉर्ड के लिए चुना है.

जेड टी लालरिथांगी को स्थानीय स्तर पर पी मारी-आई नाम से भी जाना जाता है. उन्होंने पहले निजी स्कूल में पढ़ाने का काम किया और सरकारी नौकरी के लिए कई परीक्षाएं भी दीं. लेकिन नौकरी नहीं मिली तो उन्होंने कमाई के लिए खेती का रास्ता चुना. लालरिथांगी ने 2024 में स्ट्रॉबेरी की खेती शुरू की. पड़ोसी सियाहा जिले के किसानों को इस फसल से अच्छी कमाई करते देखकर उन्होंने भी इसे आजमाने का फैसला किया. उनका मानना था कि आत्मनिर्भर बनने और कमाई करने का रास्ता सिर्फ सरकारी नौकरी तक सीमित नहीं है.

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1,000 पौधों से शुरू किया था सफर

लालरिथांगी ने शुरुआत करीब 1,000 स्ट्रॉबेरी पौधों से की थी. सांगाउ गांव से लगभग 5 किलोमीटर दूर स्थित खेत में पहले ही साल उन्हें करीब ₹1.5 लाख की कमाई हुई. पहली कमाई ने उन्हें आगे बढ़ने का हौसला दिया. इसके बाद उन्होंने खेती का आकार बढ़ाना शुरू किया. अब वह करीब 2 हेक्टेयर जमीन पर 10 हजार से ज्यादा स्ट्रॉबेरी पौधे लगा रही हैं. स्ट्रॉबेरी के साथ वह एवोकाडो, केला और दूसरी फल-सब्जियों की भी खेती करती हैं.

2025 में ₹10 लाख से ज्यादा कमाई

लालरिथांगी की मेहनत का असर कमाई में भी दिखाई दिया. साल 2025 में उन्होंने स्ट्रॉबेरी की खेती से ₹10 लाख से ज्यादा कमाए. उनकी कमाई का तरीका सिर्फ खेत से ताजा स्ट्रॉबेरी बेचने तक सीमित नहीं है. वह स्ट्रॉबेरी के एक हिस्से को प्रोसेस करके वाइन भी तैयार करती हैं, जिसे स्थानीय बाजार में बेचा जाता है. यानी खेती के साथ उन्होंने फसल की प्रोसेसिंग और स्थानीय बाजार को भी अपने कमाई के मॉडल का हिस्सा बनाया.

इंटरनेट और YouTube से सीखी खेती

लालरिथांगी के लिए स्ट्रॉबेरी की खेती का रास्ता भी आसान नहीं था. उन्होंने शुरुआत में सरकारी मदद लेने की कोशिश की थी, लेकिन उस समय स्ट्रॉबेरी की खेती कृषि विभाग की संबंधित योजना में शामिल नहीं थी. इसके बाद उन्होंने खुद सीखने का फैसला किया. इंटरनेट और YouTube वीडियो देखकर खेती की तकनीक समझी और दूसरे किसानों से भी जानकारी ली. खेती से जुड़ी जानकारी हासिल करने के लिए वह कई बार रात में भी पढ़ाई करती थीं. तीन बच्चों की मां होने के बावजूद उन्होंने खेती को आगे बढ़ाने की कोशिश जारी रखी. सरकारी प्राथमिक स्कूल में काम करने वाले उनके पति और सास-ससुर ने भी इस काम में उनका साथ दिया.

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अब रोम में मिलेगा अंतरराष्ट्रीय सम्मान

लालरिथांगी को संयुक्त राष्ट्र के फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन (FAO) की ओर से दिए जाने वाले '100 Women Heroes in Agrifood Systems and Rural Development' सम्मान के लिए चुना गया है. यह सम्मान International Year of Women Farmers 2026 के तहत दिया जा रहा है. लालरिथांगी के मुताबिक, 131 देशों की 600 से ज्यादा महिलाओं को इसके लिए नामित किया गया था, जिनमें से 100 महिलाओं का चयन हुआ है. भारत से दो महिलाओं को इस सम्मान के लिए चुना गया है. उन्हें 21 सितंबर को ईमेल के जरिए अपने चयन की जानकारी मिली.

12 से 16 अक्टूबर तक रोम में है इवेंट

सम्मान लेने के लिए लालरिथांगी को इटली की राजधानी रोम बुलाया गया है. यह सम्मान 12 से 16 अक्टूबर के बीच FAO हेडक्वार्टर में होने वाले 'वर्ल्ड फूड फोरम' के दौरान दिया जाएगा. फिलहाल वह रोम जाने से जुड़े जरूरी दस्तावेज तैयार कर रही हैं. इससे पहले मिजोरम के बागवानी विभाग ने भी उन्हें उनके चयन की जानकारी दी थी. इस कहानी की असली सीख यह है कि लालरिथांगी ने कमाई का रास्ता तलाशते हुए छोटे स्तर से शुरुआत की और समय के साथ खेती का आकार बढ़ाती चली गईं. 1,000 पौधों से शुरू हुआ सफर 10 हजार से ज्यादा पौधों तक पहुंचा और अब यही मेहनत उन्हें रोम के अंतरराष्ट्रीय मंच तक ले जा रही है.

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