यमन में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने रेड सी के किनारे एक अहम इलाके की ओर तेजी से बढ़त बनाई है, जिसकी वजह से अब तक एक लाख 25 हजार से ज्यादा लोग अपने घर छोड़कर भाग चुके हैं. इस लड़ाई का सीधा असर सऊदी अरब के तेल निर्यात पर पड़ा है, जिससे दुनिया भर में ईंधन के दाम बढ़ गए हैं और बाजारों में हलचल मच गई है. लेकिन इस पूरे संकट की सबसे भारी कीमत यमन के आम लोग चुका रहे हैं, जो सिर्फ जो कुछ हाथ में उठा सके, उसी के साथ अपने घरों से निकल पड़े हैं.
इशराक अब्देल गेलिल और उनके पति मोहम्मद थाबेत भी इन्हीं में से हैं. जब हूती विद्रोही उनके घर के करीब पहुंचने लगे, तो दोनों पहाड़ों से पैदल चलकर एक शहर तक गए, जहां से उन्हें गाड़ी मिली. इशराक चार महीने की गर्भवती हैं और उन्हें डर था कि पहले जैसा गर्भपात फिर हो सकता है. मोहम्मद ने बताया कि इस बार लड़ाई बहुत तेज थी, 2017 में हुई लड़ाई से भी ज्यादा भयानक, जब उन्हें पहली बार घर छोड़ना पड़ा था. उनके घर के पास गोले गिरे और छर्रे भी आए. वे पांच किलोमीटर पैदल चले, फिर पहाड़ी रास्तों पर करीब साठ किलोमीटर गाड़ी से सफर किया.
अब वे दक्षिण पश्चिमी शहर तईज में अपने परिवार के साथ शरण लिए हुए हैं. तईज पहुंचने पर डॉक्टर ने बताया कि बच्चा गर्भ में नीचे की ओर खिसक गया है, ठीक वैसे ही जैसे पिछली बार हुआ था और तब उनका गर्भपात हो गया था. इशराक यह सुनकर बहुत डर गईं और रो पड़ीं. अब पूरा परिवार एक ही घर में रह रहा है और दिन में सिर्फ दो बार खाना खा पाता है. उन्हें चिंता है कि इशराक और उनके होने वाले बच्चे को पूरा पोषण नहीं मिल पा रहा. मोहम्मद की बहन को भी परेशानी है, वह एक महीने से ज्यादा समय से डायबिटीज की दवा नहीं ले पा रही और उसकी आठ और तेरह साल की दोनों बेटियों को खून की एक ऐसी बीमारी है, जिसमें एनीमिया होने का खतरा रहता है.
यह भी पढ़ें: हूतियों के खिलाफ यमन सरकार के समर्थन में US, ट्रंप देंगे सऊदी का साथ- जानें लेटेस्ट अपडेट
यमन में गृह युद्ध साल 2014 से चल रहा है, जब हूती विद्रोहियों ने राजधानी सना समेत उत्तरी यमन के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया था. इसके एक साल बाद सऊदी अरब ने यमन की मान्यता प्राप्त सरकार के समर्थन में सैन्य दखल दिया था. 2022 में हुए समझौते के बाद लड़ाई काफी हद तक थम गई थी. लेकिन जुलाई में हूती विद्रोहियों ने फिर सऊदी अरब पर हमले शुरू कर दिए. विद्रोहियों का कहना है कि वे सऊदी नाकेबंदी हटवाना चाहते हैं. यह हमला उस वक्त हुआ जब अमेरिका होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने में कुछ कामयाबी हासिल कर रहा था.
संयुक्त राष्ट्र के मानवीय सहायता कार्यालय के मुताबिक इस लड़ाई में आठ आम नागरिकों की मौत हुई है और बत्तीस लोग घायल हुए हैं. करीब एक लाख 25 हजार लोग बेघर हो गए हैं. यूनिसेफ का कहना है कि इनमें 57 हजार से ज्यादा बच्चे शामिल हैं. यूनिसेफ की प्रतिनिधि ओबिया अचिएंग ने कहा कि यह यमन में पिछले कई सालों में देखी गई सबसे तेज और अस्थिर विस्थापन लहरों में से एक है. परिवार बिना किसी चेतावनी के, अक्सर रात में, जितना हाथ में आ सके उतना ही लेकर भाग रहे हैं. उनका कहना है कि यह हालात इसलिए भी ज्यादा गंभीर हैं क्योंकि यह पहले से ही एक बड़े मानवीय संकट के ऊपर आया है.
इस लड़ाई से पहले ही संयुक्त राष्ट्र चेतावनी दे चुका था कि करीब पांच करोड़ यमनी लोग गंभीर खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे हैं. प्रॉस्पर ग्लोबल संस्था की मिलेना मुर ने बताया कि तईज पहुंचने वाले कुछ लोग सोलह घंटे से ज्यादा पैदल चले हैं और थके हुए, प्यास से बेहाल हालत में पहुंचे हैं, कुछ बच्चों में कुपोषण के लक्षण भी दिखे. केयर संस्था के देश निदेशक इमान अब्दुल्लाही ने बताया कि लोगों को खाना, मां और नवजात बच्चों के लिए स्वास्थ्य सेवा, स्वच्छता का सामान, अलग शौचालय और मानसिक सहयोग की सख्त जरूरत है. उन्होंने बताया कि एक महिला के पास पहनने के लिए और कोई कपड़ा नहीं था, इसलिए उसे अपने इकलौते कपड़े धोकर तंबू के भीतर तब तक रुकना पड़ा जब तक वे सूख नहीं गए. एक और महिला को बच्चे को जन्म देने के सिर्फ दो हफ्ते बाद ही घर छोड़ना पड़ा.
नाश्वान अहमद सईद प्लास्टिक की गेहूं की बोरियों से तंबू बना रहे थे. उनका कहना है कि युद्ध शुरू होने के बाद यह तीसरी बार है जब उन्हें अपना घर छोड़ना पड़ा है. उन्होंने कहा कि उनके पास न घर है, न शौचालय, न खाना और न पानी. अरवा अहमद, जो अपने पांच बच्चों के साथ विस्थापित हुई हैं, ने बताया कि वे कई दिनों से सिर्फ चावल खा रहे हैं. उनका कहना है कि उन्हें तंबू, खाना और हर जरूरी चीज की जरूरत है, क्योंकि वे सब कुछ छोड़कर आए हैं.