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ट्रंप युद्ध लड़ रहे, मुनीर-शहबाज आतंक फैला रहे... लेकिन चाहिए सबको 'शांति का नोबेल'!

अमेरिका और इजरायल के बीच ईरान के खिलाफ युद्ध के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान को तबाह करने की धमकी दी. पाकिस्तान में ट्रंप के 15 दिन के सीजफायर के फैसले के बाद शहबाज शरीफ और आसिम मुनीर के लिए नोबेल शांति पुरस्कार की मांग जोर पकड़ गई है.

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ईंरान से जंग में सीजफायर का ऐलान होने के बाद पाकिस्तान में शाहबाज-मुनीर के लिए नोबेल प्राइज की मांग होने लगी है
ईंरान से जंग में सीजफायर का ऐलान होने के बाद पाकिस्तान में शाहबाज-मुनीर के लिए नोबेल प्राइज की मांग होने लगी है

जंग, सीजफायर, तबाही और शांति... ये चार शब्द दुनिया में ट्रेंडिंग टॉपिक बने हुए हैं. अमेरिका-इजरायल का ईरान के साथ युद्ध हुआ. इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान को पूरा तबाह करने की धमकी दी. डेडलाइन भी तय कर दी और कयामत का वक्त आते-आते सीजफायर पर बात होने लगी.

ट्रंप ने लिया था पाकिस्तान का नाम
इधर सीजफायर की बात उठी, उधर पाकिस्तान में 'मिठाइयां बटने' लगीं. क्योंकि सीजफायर का ऐलान करते हुए ट्रंप ने कहा था कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की अपील पर हमने 15 दिन के लिए सीजफायर का फैसला लिया है.

सीजफायर का भरोसा नहीं लेकिन पाकिस्तान में अलग ही माहौल
सीजफायर कितनी देर टिकेगा कुछ अता-पता नहीं है, लेकिन पाकिस्तानी मीडिया में सीधे नोबेल की डिमांड होने लगी है. पीएम शहबाज शरीफ और आर्मी चीफ आसिम मुनीर के लिए शेखी बघारने का आलम ये है कि टीवी चैनलों पर ये डिमांड दोहरायी जाने लगी. 

shehbaz sharif

सीजफायर को पाकिस्तान की डिप्लोमैटिक जीत बताया
पाकिस्तानी टीवी चैनल एआरवाई पर डिबेट के दौरान पैनल में शामिल लोगों ने इस सीजफायर को पाकिस्तान की डिप्लोमैटिक जीत बताया. इस डिबेट के दौरान एक पैनलिस्ट ने कहा कि जो कुछ किया हमारी लीडरशिप  ने किया कि उसके बाद मैं ये कहूंगा कि हमारे प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और आसिम मुनीर नोबेल शांति पुरस्कार के लिए सबसे उपयुक्त कैंडिडेट हैं. बल्कि दुनिया में ये दो ही लोग ऐसे हैं जिनको शांति का नोबेल पुरस्कार मिलना चाहिए. पैनलिस्ट को इस पुरस्कार के लिए ट्रंप को नॉमिनेट किए जाने की भी याद दिलाई.

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नोबेल शांति पुरस्कार की करने लगे मांग
कुल मिलाकर नोबेल शांति पुरस्कार न हुआ हलुवा हो गया कि जब मर्जी हुई मंगा लिया और खा लिया. अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने से पहले पाकिस्तान को ये याद नहीं है कि उसने 'शांति' बनाए रखने के लिए क्या-क्या किया है?

भारत के साथ उसके इतिहास की बात करें तो जमीन पर अपना अक्स उभरने के साथ ही पाकिस्तान ने सीमा पार से गन-टैंक के साथ 'शांति का प्रयास' शुरू कर दिया था. 1947 की काबायली जंग, 1965 की लड़ाई. 1973 में पाकिस्तान की ओर से भारत के खिलाफ किया गया ऑपरेशन चंगेज खां, 1999 का कारिगल युद्ध ये सभी 'शांति के प्रयास' के लिए ही तो उठाए गए कदम थे. 

आतंक को समर्थन देते रहे हैं शहबाज-मुनीर
ये तो पुरानी बातें हुईं. पाकिस्तान की मौजूदा लीडरशिप को ही देख लेते हैं. पाक आर्मी चीफ आसिम मुनीर लगातार कहते रहे हैं कि, मुसलमान और हिंदू अलग-अलग हैं. उन्होंने कई मौकों पर टू नेशन थ्योरी को भी सही ठहराया है. यहां तक की कश्मीर को लेकर भी कई बार बात कर चुके हैं कि, 'पाकिस्तानी सेना भारतीय कब्जे के खिलाफ लड़ रही है.'

आसिम मुनीर ने कश्मीर में पाकिस्तानी आतंकवाद को कश्मीरियों की लड़ाई का नाम देते हुए कहा था कि 'अभी हमें कश्मीरी भाइयों की 'कुर्बानी' को याद करना चाहिए जो भारत के खिलाफ लड़ रहे हैं.'पाकिस्तान के पीएम शाहबाज शरीफ भी पहलगाम अटैक, ऑपरेशन सिंदूर और भारत-पाक युद्ध को लेकर ऐसे ही बयान देते रहे हैं. लेकिन इसके बावजूद आसिम मुनीर और शाहबाज शरीफ के लिए नोबेल की मांग की जा रही है. 

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लगातार जंग की बात कर रहे हैं अमेरिकी राष्ट्रपति
इसी तरह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी कई बार नोबेल पीस प्राइज की मांग कर चुके हैं. उन्हें याद करना चाहिए साल 2021 की 7 जनवरी का वो दिन जब उनके समर्थकों ने कैपिटल हिल में घुस कर वो तबाही मचाई थी कि इसमें चार लोगों की मौत हो गई थी, और ये अमेरिकी इतिहास का काला दिन बन गया था. वजह सिर्फ इतनी थी कि ट्रंप चुनाव हार गए थे और जो बाइडेन अमेरिकी राष्ट्रपति बन गए थे.

इसके अलावा अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप पर कई अन्य मामले भी हैं. वेनेजुएला में सैन्य कार्रवाई, ईरान के साथ युद्ध के बीच ट्रंप क्यूबा को लगातार धमकी दे रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद ट्रंप भी नोबेल पीस प्राइज के लिए मांग करते रहे हैं.

Donald Trump

कैसे मिलता है नोबेल शांति पुरस्कार?

इन सब बातों और विवादों के बीच ये जानना भी जरूरी है कि आखिर नोबेल शांति पुरस्कार मिलता कैसे है. नोबेल पीस प्राइज के लिए प्रक्रिया बहुत जटिल होती है. इसके लिए नामांकन की प्रक्रिया बेहद गोपनीय होती है. आखिरी तारीख हर साल 31 जनवरी होती है.

नामांकन करने के अधिकार कुछ चुनिंदा लोगों को होते हैं, जिनमें विश्‍व के कुछ विशिष्‍ट विश्‍वविद्यालयों के प्रोफेसर, पूर्व नोबेल विजेता
संसद सदस्य और सरकारों के प्रमुखस अंतरराष्ट्रीय न्यायालयों के सदस्य, कुछ विशिष्ट अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रमुख शामिल होते हैं.

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चयन प्रक्रिया कैसी होती है?
नोबेल शांति पुरस्कार की चयन प्रक्रिया की ज़िम्मेदारी नॉर्वेजियन नोबेल कमेटी की होती है, जो नॉर्वे की संसद द्वारा नियुक्त पांच सदस्यों वाली एक समिति होती है. यह समिति सभी नामांकनों की समीक्षा करती है. संबंधित व्यक्तियों या संस्थाओं के कार्यों का गहन मूल्यांकन करती है और बाहरी विशेषज्ञों से सलाह लेती है.

यह पूरी प्रक्रिया बेहद गोपनीय रखी जाती है. मार्च से अगस्त तक समिति नामितों की पृष्ठभूमि की जांच करती है और सितंबर में निर्णायक बैठकें शुरू होती हैं. अंतिम निर्णय अक्टूबर के पहले सप्ताह में लिया जाता है और विजेता की घोषणा ओस्लो (नॉर्वे) में की जाती है.

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