अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा सोमवार को दी गई कड़ी कूटनीतिक चुनौती के बाद पाकिस्तान ने अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होने और इजरायल को औपचारिक मान्यता देने के अमेरिकी दबाव को पूरी तरह ठुकरा दिया है. ट्रंप के बयान पर पलटवार कर पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने इसे अपनी बुनियादी विचारधाराओं के खिलाफ बताया है, जो कि अस्वीकार्य है.
दरअसल, सोमवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान समेत मुस्लिम बहुल देशों से अब्राहम समझौते में शामिल होने और इजराइल को औपचारिक रूप से मान्यता देने, रिश्ते सामान्य करने की मांग की थी. ट्रंप ने इसे ईरान के साथ किसी भी औपचारिक शांति समझौते से जोड़ दिया. ट्रंप की इस मांग के बाद पाकिस्तान के सामने पेचीदा स्थिति पैदा हो गई, क्योंकि पाकिस्तान ने अपने 78 साल के इतिहास में कभी-भी इजरायल को मान्यता नहीं दी है. इस वजह से उसके नागरिक पाकिस्तानी पासपोर्ट पर इजरायल की यात्रा नहीं कर सकते. ट्रंप के इसी प्रस्ताव को पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने खारिज कर दिया है.
'हमें ऐसे किसी समझौते में नहीं होना चाहिए शामिल'
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने 'समा टीवी' को दिए एक इंटरव्यू में इजरायल पर तीखा तंज कसते हुए ट्रंप के प्रस्ताव को खारिज कर दिया. रक्षा मंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा, 'मेरा मानना है कि हमें किसी भी ऐसे समझौते (अकॉर्ड) में बिल्कुल शामिल नहीं होना चाहिए जो हमारी बुनियादी विचारधाराओं के खिलाफ जाता हो. आप भला उन लोगों के साथ बातचीत की मेज पर कैसे बैठ सकते हैं, जिनके वादों पर एक दिन के लिए भी भरोसा नहीं किया जा सकता?'
पासपोर्ट नीति का दिया हवाला
ख्वाजा आसिफ ने इजरायल के प्रति पाकिस्तान के दृष्टिकोण में किसी भी तरह के बदलाव की संभावना को सिरे से खारिज करने के लिए देश की पासपोर्ट नीति का विशेष रूप से हवाला दिया. उन्होंने गर्व से कहा कि हमारा इकलौता ऐसा देश है, जिसके पासपोर्ट पर इजरायल का नाम तक शामिल नहीं किया गया है. हमारा ये बहुत ही स्पष्ट रुख है कि इजरायल को स्वीकार करना हमारे लिए पूरी तरह असंभव है.
अपने अप्रत्याशित स्वभाव के अनुरूप राष्ट्रपति ट्रंप ने सोमवार को पाकिस्तान, सऊदी अरब, कतर और तुर्की जैसे कई मुस्लिम बहुल और अरब देशों के सामने इजरायल के साथ संबंध सामान्य करने की अनिवार्य मांग रखी. उन्होंने इसे ईरान संघर्ष को समाप्त करने की वार्ता से जोड़ दिया. अब्राहम अकॉर्ड्स मूल रूप से साल 2020 में ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान अमेरिका की मध्यस्थता में इजरायल, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और बहरीन के बीच शुरू हुआ एक समझौता था, जिसमें बाद में मोरक्को, सूडान और कजाकिस्तान भी शामिल हुए थे.
ट्रंप की ये मांग पाकिस्तान के लिए निगलने में बेहद मुश्किल साबित हो रही थी, क्योंकि एक तरफ ट्रंप ने खुद पाकिस्तान को अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता करने के लिए चुना था, जिससे पीछे हटना अमेरिकी राष्ट्रपति को नाराज कर सकता था. दूसरी तरफ यदि पाकिस्तान इजरायल को मान्यता देता तो उसे अपने देश के अंदर भारी घरेलू विरोध और कट्टरपंथी धार्मिक संगठनों के जबरदस्त गुस्से का सामना करना पड़ता.
पाकिस्तान का हमेशा से ये पुराना और अडिग रुख रहा है कि इजरायल के साथ संबंधों को सामान्य करने का कोई भी कदम केवल तभी उठाया जा सकता है, जब इजरायल वर्ष 1967 से पहले की सीमाओं के आधार पर एक पूरी तरह स्वतंत्र फिलिस्तीन राज्य के निर्माण की अनुमति दे. इस कड़े रुख के कारण पाकिस्तान अब खाड़ी देशों के बीच भी अलग-थलग पड़ने के संकट में है जो अमेरिकी दबाव में इजरायल के साथ लगातार जुड़ रहे हैं.