
क्या आप किसी ऐसे शहर की कल्पना कर सकते हैं जहां मोबाइल, चाबी और बटुए की तरह 'गैस मास्क' इंसान के शरीर का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका हो? जहां जिंदगी घड़ियों की टिक-टिक से नहीं, बल्कि जहरीली हवा के सायरन के इशारे पर चलती हो? एक ऐसी दुनिया जहां बाजार में खरीदारी करता नागरिक हो, सड़क पर साइकिल दौड़ाता बच्चा हो, बाजार में सब्जियां चुनती महिला हो या समुद्र किनारे जाल समेटता मछुआरा- हर किसी के गले में काले रंग का मास्क हमेशा झूलता रहता है.
जब भी हवा में लाउडस्पीकर का एक तीखा सायरन गूंजता है, सड़कें अचानक थम जाती हैं. कोई भागता नहीं, कोई चीखता नहीं. गाड़ियां जहां होती हैं वहीं रुक जाती हैं, बाजार की चहल-पहल थम जाती है, और कुछ ही सेकंड के भीतर हर शख्स बिना किसी हड़बड़ी के अपने गले में लटके मास्क को चेहरे पर चढ़ा लेता है.
यह दृश्य किसी हॉलीवुड हॉरर फिल्म या काल्पनिक थ्रिलर का नहीं है. यह प्रशांत महासागर में बसे जापान के मियाके-जिमा द्वीप की रोजमर्रा की हकीकत है. दुनिया भर में 'गैस मास्क आइलैंड' के नाम से मशहूर इस शहर में जिंदगी सायरन के इशारे पर चलती है और हवा में बहता जहर यहां के इंसानों की किस्मत तय करता है.

जापान की राजधानी टोक्यो से लगभग 180 किलोमीटर दक्षिण में स्थित मियाके-जिमा टोक्यो महानगर प्रशासन के अधिकार क्षेत्र में आता है. दूर से देखने पर यह द्वीप हरी-भरी पहाड़ियों और पारदर्शी नीले समुद्र से घिरा बेहद खूबसूरत पर्यटन स्थल लगता है. लेकिन इसके ठीक बीचों-बीच खड़ा है 'माउंट ओयामा' नाम का अति-सक्रिय ज्वालामुखी. यह ज्वालामुखी सिर्फ आग और लावा नहीं उगलता, बल्कि इससे लगातार अत्यधिक जहरीली सल्फर डाइऑक्साइड गैस निकलती रहती है.
सल्फर डाइऑक्साइड एक ऐसी अदृश्य और बेहद चुभने वाली गैस है, जो फेफड़ों को तुरंत झुलसा सकती है. यदि हवा में इसका घनत्व बढ़ जाए, तो इंसान को एक सांस लेने में भी घुटन महसूस होने लगती है और कुछ ही मिनटों में मौत हो सकती है. मियाके-जिमा का इतिहास ज्वालामुखी विस्फोटों से भरा रहा है. साल 2000 के मध्य में जो हुआ उसने इस द्वीप को इतिहास के पन्नों में दर्ज कर दिया. माउंट ओयामा में एक के बाद एक कई शक्तिशाली विस्फोट हुए और जमीन के फटने से लाखों टन सल्फर डाइऑक्साइड गैस वातावरण में फैल गई.
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हवा में जहर का स्तर इतना खतरनाक हो गया कि सितंबर 2000 में जापानी सरकार ने आपातकालीन कदम उठाते हुए पूरे द्वीप को रातोरात खाली कराने का आदेश दिया. द्वीप के सभी 3,600 नागरिकों को जहाजों और सेना के हेलिकॉप्टरों से टोक्यो के मुख्य भूभाग पर शिफ्ट किया गया. अगले कई साल तक यह खूबसूरत द्वीप पूरी तरह से एक भूतिया शहर बना रहा. यहां सिर्फ वैज्ञानिकों और रिसर्च टीमों को ही विशेष केमिकल सूट पहनकर जाने की अनुमति थी.
जब ज्वालामुखी से गैस का उत्सर्जन थोड़ा कम हुआ, तो अपने घरों से दूर रह रहे लोगों ने वापस लौटने की गुहार लगाई. टोक्यो मेट्रोपॉलिटन सरकार और जापान मौसम विज्ञान एजेंसी ने समीक्षा के बाद नागरिकों को लौटने की अनुमति तो दे दी, लेकिन एक बहुत ही सख्त आधिकारिक गाइडलाइन के साथ. स्थानीय प्रशासन ने स्पष्ट आदेश जारी किया- द्वीप की सीमा में प्रवेश करने वाले हर नागरिक और पर्यटक के पास हर समय एक फंक्शनल गैस मास्क होना अनिवार्य है.
प्रशासन ने पूरे द्वीप पर 19 से ज्यादा हाई-टेक गैस-मॉनिटरिंग स्टेशन बिछाए, जो हवा में सल्फर डाइऑक्साइड को हर सेकंड मापते हैं. ग्रीन अलर्ट, येलो अलर्ट और रेड अलर्ट के सायरन बजते हैं. रेड अलर्ट जारी होते ही लोगों को बताया जाता है कि गैस का स्तर जानलेवा सीमा को पार कर चुका है और तुरंत मास्क पहनें और शेल्टर की तरफ बढ़ें. इमरजेंसी सर्विसेज के मुताबिक, यह इस द्वीप पर जीवित रहने का एकमात्र कानूनी और व्यावहारिक पासपोर्ट है.
आज इस द्वीप पर लगभग 2,200 लोग रहते हैं. बाहरी दुनिया के लिए जो दृश्य खौफनाक लगता है, वह यहां के निवासियों के लिए एक सामान्य दिनचर्या बन चुका है. यहां के प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में बच्चों को गणित और विज्ञान के साथ-साथ सबसे पहले यह सिखाया जाता है कि सायरन बजने के 3 सेकंड के भीतर गैस मास्क कैसे पहना जाता है. बच्चे जब मैदान में फुटबॉल या वॉलीबॉल खेलते हैं, तब भी काले रंग का मास्क उनके गले में झूलता रहता है. मछली पकड़ने वाले मछुआरे जब समुद्र में नाव उतारते हैं, तो उनके लाइफ जैकेट के साथ गैस मास्क का डिब्बा बंधा होता है.
यहां के घरों, दफ्तरों और सार्वजनिक इमारतों में विशेष एयर-फिल्टरिंग सिस्टम लगे हैं. अगर किसी इलाके में लंबे समय तक लाल सायरन बजता रहता है, तो लोग शांति से पास के अंडरग्राउंड एयर-टाइट शेल्टर में चले जाते हैं और स्थिति सामान्य होने का इंतजार करते हैं.
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आश्चर्य की बात यह है कि इस जानलेवा खतरे ने मियाके-जिमा में पर्यटन का एक बिल्कुल नया मॉडल पैदा कर दिया है, जिसे 'डैमेज टूरिज्म' कहा जाता है. दुनिया भर से हजारों एडवेंचर ट्रैवलर्स, भूवैज्ञानिक और पर्यावरण वैज्ञानिक इस अनोखे द्वीप को देखने आते हैं. जैसे ही कोई पैसेंजर शिप मियाके-जिमा के पोर्ट पर लंगर डालती है, पर्यटकों को उतरते ही सबसे पहले अपना गैस मास्क खरीदना या किराए पर लेना पड़ता है. पर्यटक यहां ज्वालामुखी की काली राख से ढकी सड़कें, मरे हुए पेड़ों के फैंटम फॉरेस्ट और इंसानों के सर्वाइवल के इस अनूठे जज्बे को देखने आते हैं.
मियाके-जिमा की जिंदगी हमें यह सिखाती है कि जब प्रकृति अपने सबसे आक्रामक रूप में होती है, तब इंसान के पास दो ही रास्ते होते हैं- या तो वह उस जगह को हमेशा के लिए छोड़ दे, या फिर अनुशासन और तकनीक के बल पर उस खतरे के साथ तालमेल बिठा ले. मियाके-जिमा के लोगों ने दूसरा रास्ता चुना. गले में लटकता हुआ गैस मास्क उनकी लाचारी का नहीं, बल्कि प्रकृति के जहर पर उनकी अडिग इच्छाशक्ति और अनुशासित जीवन की जीत का प्रतीक है.