पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (POJK) में हाल में हुई हिंसा का मामला अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी गूंजने लगा है. ब्रिटेन के बर्मिंघम में रहने वाले ब्रिटिश कश्मीरियों ने पाकिस्तान के खिलाफ अनोखा प्रदर्शन किया. प्रदर्शनकारियों ने पाकिस्तान के वाणिज्य दूतावास के बाहर अपने जूते रखकर विरोध जताया और आरोप लगाया कि रावलाकोट में प्रदर्शन कर रहे लोगों पर सुरक्षा बलों ने गोली चलाई. उनका कहना था कि आम नागरिकों पर हो रही कार्रवाई तुरंत रोकी जाए और मानवाधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जाए.
प्रदर्शन के दौरान लोगों ने पाकिस्तान सेना के खिलाफ नारे लगाए और रावलाकोट में हुई फायरिंग के लिए जवाबदेही तय करने की मांग की. उनका कहना था कि POK में विरोध की आवाज को बल प्रयोग से दबाया जा रहा है. प्रदर्शनकारियों ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से भी इस मामले का संज्ञान लेने और इलाके की स्थिति पर निष्पक्ष जांच कराने की अपील की.
प्रदर्शन की वजह हाल के दिनों में रावलाकोट और मीरपुर में हुई हिंसा बताई जा रही है. आंदोलन से जुड़े लोगों का दावा है कि अपनी बुनियादी मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे नागरिकों पर पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने फायरिंग की. न्यूज एजेंसी ANI के मुताबिक, प्रत्यक्षदर्शियों ने दावा किया कि सुरक्षा बलों की कार्रवाई में कई लोगों की मौत हुई, जबकि कई अन्य घायल हुए. हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है.
52 दिन से चल रहा है आंदोलन
रिपोर्ट के अनुसार, संयुक्त अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) की अगुवाई में यह प्रदर्शन लगातार जारी है. आंदोलनकारी गिरफ्तार साथियों की तुरंत रिहाई, मुकदमों की वापसी समेत अपनी तमाम बुनियादी शर्तों पर कायम हैं. प्रशासन के साथ बातचीत पूरी तरह बेनतीजा रहने पर प्रदर्शनकारियों ने रावलाकोट से मुजफ्फराबाद तक लंबे मार्च का ऐलान कर दिया, जिसके बाद पूरे इलाके में स्थिति बेहद नाजुक हो गई.
ब्रैडफोर्ड में भी उठा विरोध का स्वर
बर्मिंघम के अलावा ब्रिटेन के ब्रैडफोर्ड में भी कश्मीरी समुदाय ने पाकिस्तान के खिलाफ प्रदर्शन किया. प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा है. उनका कहना था कि विरोध करने वालों को गिरफ्तार किया जा रहा है, राजनीतिक असहमति को दबाया जा रहा है और सुरक्षा बलों के जरिए लोगों पर दबाव बनाया जा रहा है.
क्यों भड़का पीओके में जनआक्रोश?
इस भारी असंतोष के पीछे बिजली के बढ़ते दाम, कमरतोड़ महंगाई, स्थानीय अधिकारों की अनदेखी और विधानसभा में शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटों का विवाद मुख्य वजह है. आंदोलन से जुड़े नेताओं ने पाकिस्तान-अधिकृत जम्मू-कश्मीर की चुनावी प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए हैं. उनका आरोप है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर किया जा रहा है और लोगों की राय को दबाने की कोशिश हो रही है. JAAC का दावा है कि 5 जून से 28 जुलाई के बीच हुई घटनाओं में मरने वालों की संख्या 67 तक पहुंच गई है. हालांकि, इस आंकड़े की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है.