पश्चिम बंगाल में पिछले महीने आए ऐतिहासिक चुनावी नतीजों और सत्ता परिवर्तन के बाद पहली बार राज्य सरकार 20 जून को 'पश्चिम बंग दिवस' मनाने जा रही है. बंगाल के दो दिवसीय दौरे पर आए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार को इस भव्य उत्सव में शामिल होंगे.
हाल के सालों में, बीजेपी की बंगाल इकाई लगातार 20 जून को पश्चिम बंगाल के स्थापना दिवस के रूप में मनाती रही है. बीजेपी के सत्ता में आने के बाद ये पहला मौका है जब राज्य सरकार इस दिन को आधिकारिक रूप से मना रही है.
डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की इस जन्मभूमि पर ये दिन पार्टी के लिए बेहद अहम माना जाता है.
दरअसल, 14 अगस्त 1947 को भारत की आजादी से पहले, 20 जून 1947 को कोलकाता में बंगाल प्रांतीय विधानसभा की बैठक बुलाई गई थी. इस बैठक में बंगाल प्रांत के भविष्य को लेकर फैसला होना था. विधायकों ने प्रांत के बंटवारे के पक्ष में मतदान किया था, ताकि हिंदू-बहुल क्षेत्र भारतीय संघ का हिस्सा बने रह सकें.
इसी ऐतिहासिक फैसले ने सीमा पार पूर्वी पाकिस्तान के मुकाबले 'पश्चिम बंगाल' राज्य के गठन का फैसला हुआ था. उस दिन पारित हुए प्रस्ताव के आधार पर ही 15 अगस्त 1947 को रैडक्लिफ लाइन लागू की गई, जिसने बंगाल प्रांत को दो हिस्सों में बांट दिया.
तारकेश्वर में शानदार आयोजन
पिछली ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी सरकार ने इस दिन के ऐतिहासिक महत्व को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था. पिछली सरकार ने बंगाली कैलेंडर के पहले दिन यानी 'पोइला बैशाख' को राज्य स्थापना दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया था. लेकिन अब बीजेपी सरकार के आने के बाद ये पूरी तरह बदलने जा रहा है.
शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने हुगली के तारकेश्वर में एक भव्य कार्यक्रम की योजना बनाई है. इस आयोजन स्थल का अपना एक अलग ऐतिहासिक महत्व है. अप्रैल 1947 में हिंदू महासभा ने तारकेश्वर में एक अहम सम्मेलन आयोजित किया था. डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की अध्यक्षता में हुए उस सम्मेलन में हिंदू महासभा ने बंगाल प्रांत के हिंदू-बहुल क्षेत्रों के बंटवारे की मांग का प्रस्ताव अपनाया था, जिसकी वजह से भारतीय संघ के हिस्से के रूप में पश्चिम बंगाल राज्य का जन्म हुआ.
अविभाजित बंगाल योजना का विरोध
साल 1946 के बंगाल विधानसभा चुनावों में मुस्लिम लीग को मिली बड़ी जीत के बाद, श्यामाप्रसाद मुखर्जी 'यूनाइटेड बंगाल' (अविभाजित बंगाल) की योजना को लेकर लगातार आशंकित थे. इस योजना को हुसैन शहीद सुहरावर्दी और शरद चंद्र बोस का समर्थन हासिल था.
अखिल भारतीय हिंदू महासभा के अध्यक्ष मुखर्जी को डर था कि भारत और पाकिस्तान दोनों से अलग एक अविभाजित बंगाल बनने की स्थिति में, हिंदू बंगाली राजनीतिक रूप से हाशिए पर चले जाएंगे और उन्हें मुस्लिम-बहुल प्रशासन के अधीन रहने का बड़ा खतरा रहेगा.
राजनीतिक दलों की भूमिका और तीखे बयान
राज्य बीजेपी अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य ने इस मौके पर कहा, 'अब बीजेपी की सरकार गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक है. श्यामाप्रसाद की भूमि पर 74 साल बाद हमारी सरकार बनी है. भारतीय जनसंघ भी सांगठनात्मक स्तर पर 20 जून को मनाता था और फिर बीजेपी ने इसे जारी रखा. लेकिन पहली बार, ये स्थापना दिवस सरकारी सहयोग से इतने बड़े पैमाने पर मनाया जा रहा है. प्रधानमंत्री खुद आ रहे हैं.'
भट्टाचार्य ने इतिहास का जिक्र करते हुए आगे कहा, '20 जून को हुई प्रांतीय संयुक्त बैठक में कांग्रेस के सभी हिंदू विधायकों ने मतदान किया था. पाकिस्तान की मांग के समर्थक होने के बावजूद, कम्युनिस्ट नेता ज्योति बसु और रतन लाल ब्राह्मण ने भी अपनी पार्टी के रुख के खिलाफ जाकर पश्चिम बंगाल के गठन के पक्ष में वोट दिया था. इसलिए पश्चिम बंगाल की आधारशिला उसी दिन रखी गई थी और राज्य का औपचारिक अभिषेक हुआ था.'
उन्होंने आगे कहा कि ये असल स्थापना दिवस है जिसे कांग्रेस और बाद में ममता बनर्जी ने मिटाने की कोशिश की. उनका एजेंडा पश्चिम बंगाल को पश्चिम बांग्लादेश में बदलना था, लेकिन जनता ने विभाजन और तुष्टिकरण की इस राजनीति को पूरी तरह खारिज कर दिया.
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विकास योजनाओं की सौगात
इस साल के पश्चिम बंग दिवस की थीम 'पश्चिम बंगाल: विरासत, सद्भाव और विकास' रखी गई है. ये थीम राज्य की सांस्कृतिक समृद्धि, सामाजिक एकजुटता और विकास की आकांक्षाओं को दिखाती है.
इस ऐतिहासिक कार्यक्रम के दौरान, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राज्य को कई विकास परियोजनाओं की सौगात देंगे. वो कई परियोजनाओं का शुभारंभ करेंगे, उन्हें राष्ट्र को समर्पित करेंगे और कुछ की आधारशिला रखेंगे. ये परियोजनाएं रेलवे, कृषि, ग्रामीण विकास, मत्स्य पालन और पशुपालन जैसे क्षेत्रों से जुड़ी हैं.