साल, 2020, महीना अक्टूबर... विधानसभा चुनाव सिर्फ कुछ महीने दूर थे. तृणमूल कांग्रेस में सब कुछ ठीक-ठाक लग रहा था. ममता बनर्जी पूरे दम पर थीं. लेकिन पार्टी के अंदर एक चुपके-चुपके तूफान उठ रहा था. टीएमसी के सबसे मजबूत चेहरे और पूर्वी मेदिनीपुर के किंगमेकर, नंदीग्राम में टीएमसी के स्तंभ शुभेंदु अधिकारी अब ममता के खेमे में बेचैन थे.
शुभेंदु वो नेता थे जिन्होंने 2007 के नंदीग्राम आंदोलन की अगुवाई की थी. उसी आंदोलन ने ममता बनर्जी को सत्ता के सिंहासन तक पहुंचाया और 34 साल पुराने वाम मोर्चा शासन का अंत किया था. ममता के लिए शुभेंदु सिर्फ एक नेता नहीं, परिवार का सदस्य थे. परिवहन, सिंचाई, जलमार्ग जैसे अहम मंत्रालय संभालने के साथ-साथ हुगली नदी पुल आयोग के अध्यक्ष भी थे.
लेकिन 2020 आते-आते चीजें बदलनी शुरू हो गईं. ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी ने पार्टी संगठन की कमान संभाली थी. शुभेंदु को ये बिल्कुल पसंद नहीं आया. वो अभिषेक को अपना नेता मानने को तैयार नहीं थे. दोनों के बीच तनातनी शुरू हो गई. अक्टूबर 2020 में अखबारों में खूब सुर्खियां बनीं कि 'शुभेंदु-अभिषेक में ठन गई'.
अभिषेक पर सीधा निशाना
अब शुभेंदु ने खुलकर हमला बोलना शुरू कर दिया. स्वामी विवेकानंद का हवाला देते हुए उन्होंने कहा था- "कोई भी 'मैं', 'मुझे' और 'मेरा' के सिद्धांत से दुनिया नहीं बदल सकता. जो लोग ऐसा प्रचार करते हैं, वे मूर्खों की दुनिया में जी रहे हैं." यह सीधा हमला अभिषेक बनर्जी पर था. शुभेंदु की रैलियों से ममता की तस्वीरें गायब होने लगी थीं और नारों से 'तृणमूल' शब्द सिमटने लगा था. 25 नवंबर 2020- वो दिन जब दरार बहुत चौड़ी हो गई.
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टीएमसी नंदीग्राम में 2007 के हमले की 13वीं वर्षगांठ मना रही थी. लेकिन शुभेंदु अब पार्टी के बैनर तले सभाएं करना बंद कर चुके थे. 26 नवंबर, 2020 को शुभेंदु ने हुगली नदी पुल आयोग के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया और 27 नवंबर को ममता बनर्जी के मंत्रिमंडल से पूर्ण इस्तीफा.
जब ममता ने मनाने भेजे अपने दूत
इस बीच ममता ने पूरा जोर लगा दिया. प्रशांत किशोर, सौगत राय जैसे दूत भेजे गए. लेकिन शुभेंदु टस से मस नहीं हुए. खुद तत्कालीन टीएमसी सांसद सौगत राय और पार्टी के तब के रणनीतिकार प्रशांत किशोर शुभेंदु को मनाने गए थे, लेकिन शुभेंदु माने नहीं. सौगत राय उन्हें खुद मनाने गए.
तब सौगत राय ने कहा, 'उनका इस्तीफा ठीक नहीं था, उन्हें सही से इस्तीफा देना चाहिए था, स्पीकर को देना था.वो पार्टी छोड़ गए.उनके साथ हमारा, 1 दिसंबर को बातचीत हुई थी, हमें लगा था कि शायद बातचीत से बात सुधर सकती है. लेकिन 2 दिसंबर को उन्होंने हमें व्हाट्स एप पर बताया कि हम एकसाथ काम नहीं कर सकते हैं. उस दिन हमने अनाउंस कर दिया कि हम शुभेंदु से और बातचीत नहीं करेंगे.'
17 दिसंबर , 2020 को शुभेंदु ने टीएमसी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया और इस तरह टीएमसी के लिए उनकी राहें जुदा हो गई. इसी दिन टीएमसी को गहरी जड़ों वाला बरगद का पेड़ बताते हुए ममता बनर्जी ने कहा कि अगर दो या तीन असंतुष्ट सदस्य पार्टी छोड़ देते हैं तो इससे उनकी पार्टी पर कोई असर नहीं पड़ेगा.
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ममता बनर्जी ने एक रैली को संबोधित करते हुए कहा था, 'चंबल के कुछ डाकू और बाहर से आए गुंडे बंगाल में घुस आए हैं. कभी वे पुलिस को धमकाते हैं तो कभी टीएमसी को. आज टीएमसी बरगद के पेड़ की तरह मजबूत है. दो-तीन लोग जो जानते हैं कि उन्हें पार्टी से टिकट नहीं मिलेगा, वे पार्टी छोड़कर जा रहे हैं.'
बन गए बीजेपी के सारथी
19 दिसंबर 2020 की दोपहर कई मायनों में ऐतिहासिक थी.मिदनापुर के कॉलेज ग्राउंड में भगवा लहर उमड़ पड़ी थी. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह मंच पर थे. शुभेंदु अधिकारी मंच पर आए, अमित शाह के पैर छुए और झंडा लहराते हुए ऐलान किया कि बंगाल अब 'अन्याय' नहीं सहेगा.
यहीं से शुभेंदु भाजपा के वह 'सारथी' बन गए, जिन्हें बंगाल के भूगोल और वोटर्स की नब्ज का पता था. 6 साल की अथक मेहनत, रणनीति, जनसंपर्क और संगठन विस्तार का नतीजा है कि आज वो शुभेंदु अधिकारी, जिन्हें ममता अपना सबसे भरोसेमंद मानती थीं वह उसी बंगाल के मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं.