लखनऊ के अलीगंज में हुए दर्दनाक अग्निकांड में एक बड़ा और चौंकाने वाला खुलासा हुआ है. जिस कमर्शियल बिल्डिंग में आग लगने से 15 लोगों की जान गई, वहां बिजली का लोड तय सीमा से काफी ज्यादा चल रहा था. शुरुआती जांच के मुताबिक, इस तीन मंजिला इमारत को सिर्फ 20 किलोवाट लोड की मंजूरी मिली थी. इसके बावजूद जून के महीने तक यहां का लोड बढ़कर 34 केवीए से ऊपर पहुंच चुका था. महीनों से चल रही इस लापरवाही की वजह से पूरी बिल्डिंग का बिजली सिस्टम पूरी तरह दबाव में था. अब जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि क्या इस लापरवाही ने हादसे की गंभीरता बढ़ाने में कोई भूमिका निभाई थी.
जांच टीमों को पता चला है कि यह लापरवाही अचानक नहीं हुई. सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि अप्रैल के महीने में ही यहां का लोड बढ़कर 24 केवीए से ज्यादा हो गया था. इसके बाद के महीनों में यह लगातार बढ़ता चला गया. विशेषज्ञों का मानना है कि तय सीमा से अधिक बिजली का इस्तेमाल लंबे समय तक होने पर वायरिंग, ट्रांसफॉर्मर और अन्य उपकरणों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है. इसी वजह से अब बिजली व्यवस्था भी जांच के दायरे में आ गई है.
कई महीनों से मिल रहे थे संकेत
इस मामले में सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि खतरे के संकेत महीनों पहले से मिल रहे थे. आसपास के लोगों का कहना है कि बिल्डिंग में रहने वाले किराएदार बार-बार MCB गिरने की शिकायत कर रहे थे. इन चेतावनियों को बिल्कुल भी गंभीरता से नहीं लिया गया. ऐसे में बिजली विभाग और जांच टीमें अब इस बात का पता लगा रही हैं कि जब महीनों से मीटर पर ओवरलोड रिकॉर्ड हो रहा था, तो समय रहते कोई एक्शन क्यों नहीं लिया गया.
तकनीकी जांच का एक अहम हिस्सा यह भी है कि बढ़े हुए लोड के बावजूद बिजली सप्लाई अपने आप बंद क्यों नहीं हुई. अधिकारी यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि सुरक्षा व्यवस्था में कहीं कोई कमी तो नहीं थी. जांच के दौरान बिजली कनेक्शन के रिकॉर्ड में भी एक असामान्य जानकारी सामने आई है. दस्तावेजों में साल 2000 की जगह 1 जनवरी 1911 दर्ज होने का मामला सामने आया है, जिसकी भी पड़ताल की जा रही है.
फिलहाल आग लगने की सटीक वजह सामने नहीं आई है. बिजली सुरक्षा विभाग और बिजली आपूर्ति प्रशासन की टीम तकनीकी जांच कर रही है. रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई तय की जाएगी.