लखनऊ अग्निकांड में बड़ा एक्शन हुआ है. पुलिस ने जांच के बाद बिल्डिंग मालिक समेत तीन लोगों को गिरफ्तार कर लिया है. इस मामले में 3 लोगों पर FIR दर्ज की गई है. जिनकी गिरफ्तारी हुई है उनमें बिल्डिंग मालिक वीरेंद्र शुक्ला और एनिमेशन ट्रेनिंग स्टूडियो का मालिक तुषांत जैसवाल शामिल हैं. इसके अलावा एक और आरोपी रामकृष्ण उपाध्याय (एनिमेशन स्टूडियो मैनेजर) की भी गिरफ्तारी हुई है.
इस मामले में चार अफसर भी सस्पेंड कर दिए गए हैं. इस हादसे के बाद सीएम योगी ने अपने सभी कार्यक्रम रद्द कर दिए हैं और इसकी सख्त जांच के आदेश दिए हैं. उन्होंने सोमवार देर शाम हादसे को लेकर हाईलेवल मीटिंग की थी.
अग्निकांड की जांच के लिए दो सदस्यीय विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया है. यह फैसला हादसे को लेकर की गई हाई लेवल रीव्यू मीटिंग के बाद लिया गया है. एसआईटी में अमृत अभिजात, अपर मुख्य सचिव (पर्यटन, धर्मार्थ कार्य एवं संस्कृति विभाग) और प्रवीण कुमार, अपर पुलिस महानिदेशक (एडीजी), लखनऊ जोन को सदस्य बनाया गया है. जांच दल को घटना के सभी पहलुओं की गहन जांच कर जिम्मेदार व्यक्तियों और संस्थाओं की भूमिका तय करने का निर्देश दिया गया है.
सरकार ने एसआईटी को सात दिनों के भीतर अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपने के लिए कहा है. जांच के दौरान आग लगने के कारणों, भवन में सुरक्षा मानकों के पालन, वैधानिक स्वीकृतियों और किसी भी प्रकार की संभावित लापरवाही की पड़ताल की जाएगी. राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि हादसे के लिए जिम्मेदार किसी भी व्यक्ति या संस्था को बख्शा नहीं जाएगा और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी.
विवादों में भी रही है बिल्डिंग
जिस इमारत में आग लगी थी, उसे लेकर एक नया खुलासा सामने आया है. अलीगंज योजना के सेक्टर-डी स्थित भवन संख्या एमएस/102/डी का कुल क्षेत्रफल 1992 वर्गफुट है और इसके लिए 20 अगस्त 2014 को आवासीय मानचित्र स्वीकृत किया गया था. हालांकि, साल 2016 में लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) ने भवन में कथित अवैध निर्माण को लेकर मुकदमा दर्ज कराया था.
अवैध निर्माण को लेकर मिले थे कार्रवाई के निर्देश
मामले की सुनवाई के बाद 10 मई 2016 को भवन को ध्वस्त करने का आदेश भी जारी किया गया था. बाद में भवन मालिकों ने यह कहते हुए आपत्ति दर्ज कराई कि उन्हें सुनवाई का सही मौका नहीं मिला और निर्माण स्वीकृत मानचित्र के अनुसार ही है. इसके बाद 5 जुलाई 2016 को ध्वस्तीकरण का आदेश निरस्त कर दिया गया था.
दस्तावेजों के अनुसार, यह भवन वर्ष 1980 में लॉटरी के जरिये आवंटित किया गया था. साल 2005 में इसकी सेल डीड (विक्रय विलेख) विजय कुमार और उषा के नाम हुई, जबकि 2013 में इसे वीरेन्द्र प्रताप शुक्ला और सुरेन्द्र प्रताप शुक्ला को बेच दिया गया. इसके बाद 7 अगस्त 2014 को एलडीए ने नए मालिकों के नाम भवन का नामांतरण कर दिया था. अब अग्निकांड के बाद प्रशासन भवन की स्वीकृतियों, निर्माण की वास्तविक स्थिति, सुरक्षा मानकों के पालन और अनियमितताओं की भी जांच कर रहा है.